
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक साल के मासूम बच्चे की कस्टडी उसकी मां को सौंपने का महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने पति के उस दावे को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें उसने अपनी पत्नी को शराबी और बच्चे की देखभाल के लिए अयोग्य बताया था। बता दें कि यह दंपति वर्तमान में एक-दूसरे से अलग रह रहा है।
न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकल पीठ ने 30 अप्रैल को पारित अपने आदेश में कहा कि बच्चे के शुरुआती वर्षों में उसकी पोषण, भावनात्मक और विकास संबंधी जरूरतों को एक मां ही सबसे अच्छे तरीके से पूरा कर सकती है।
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी स्पष्ट किया कि बच्चे के पालन-पोषण में पिता की भूमिका बेहद अहम होती है। लेकिन जैविक और स्वाभाविक लगाव के कारण नाबालिग के शारीरिक व भावनात्मक कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए मां ही हमेशा सबसे सही स्थिति में होती है।
अदालत ने इस कानूनी सिद्धांत को भी दोहराया कि पांच साल से कम उम्र के नाबालिग बच्चे की कस्टडी आमतौर पर हमेशा मां को ही सौंपी जाती है।
यह याचिका महिला ने अपने बेटे की कस्टडी वापस पाने के लिए दायर की थी। महिला का पति जौनपुर में पुलिस कांस्टेबल के पद पर तैनात है। याचिका में आरोप लगाया गया था कि पिछले साल अगस्त में पति ने जबरन बच्चे को मां से छीन लिया था।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को यह भी बताया कि बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) ने सितंबर 2025 में बच्चे को मां को सौंपने का स्पष्ट आदेश जारी किया था। इसके बावजूद उसके कांस्टेबल पति ने इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए जौनपुर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) ने इसी साल मार्च में उक्त कांस्टेबल को निलंबित कर दिया था। उस पर यह कड़ी कार्रवाई जबरन बच्चे की कस्टडी लेने और सीडब्ल्यूसी के आदेश की अवहेलना करने के आरोप में की गई थी।
सुनवाई के दौरान महिला के वकील ने अदालत को बताया कि दोनों की शादी दिसंबर 2023 में हुई थी। लेकिन दहेज उत्पीड़न के कथित आरोपों के कारण कुछ समय बाद ही उनके रिश्ते में खटास आ गई। महिला ने अगस्त 2024 में इस बच्चे को जन्म दिया था।
पति की प्रताड़ना से परेशान होकर पत्नी ने उसके खिलाफ एक पुलिस शिकायत भी दर्ज कराई थी। इसी शिकायत के आधार पर मार्च में जुवेनाइल जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन) एक्ट की धारा 75 के तहत पति पर एफआईआर दर्ज की गई थी, जो बच्चों के प्रति क्रूरता के लिए सजा का प्रावधान करती है।
महिला पक्ष के वकील ने हिंदू अल्पसंख्यक और अभिभावक अधिनियम के प्रावधानों का हवाला दिया। उन्होंने मजबूती से यह तर्क रखा कि पांच साल तक की उम्र के नाबालिग बच्चे के लिए मां को ही सबसे बेहतरीन और स्वाभाविक अभिभावक माना जाता है।
दूसरी तरफ, पति के वकील ने इन सभी दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि महिला केवल 12वीं कक्षा तक पढ़ी है और उसकी अपनी कोई स्वतंत्र आय नहीं है। वकील के मुताबिक वह पूरी तरह से अपने माता-पिता पर निर्भर है, इसलिए वह बच्चे के हितों की देखभाल करने में कतई सक्षम नहीं है।
अपने दावों को पुख्ता करने के लिए पति के वकील ने महिला के कुछ मेडिकल पर्चे भी अदालत के सामने पेश किए। इन पर्चों के आधार पर यह साबित करने की कोशिश की गई कि महिला की मानसिक स्थिति स्थिर नहीं है।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह पाया कि अब उनके बीच सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है। कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि पति कानूनी रूप से बाध्य होने के बावजूद अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता नहीं दे रहा है।
याचिकाकर्ता महिला ने अदालत को पूरा भरोसा दिलाया कि वह अपने माता-पिता की मदद से अपने बेटे की अच्छी परवरिश करेगी। उसने अदालत को जानकारी दी कि उसकी मां एक सरकारी कर्मचारी हैं और पिता एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी हैं जिन्हें नियमित पेंशन मिलती है।
मेडिकल पर्चों के आधार पर पत्नी को शराबी बताने वाली पति की दलील को कोर्ट ने पूरी तरह ठुकरा दिया। अदालत ने जांच में पाया कि उन पर्चों में केवल यह लिखा था कि महिला पेट दर्द से पीड़ित थी और डॉक्टर ने उसे मसालेदार खाना खाने से बचने की सलाह दी थी।
अदालत ने अपने फैसले में साफ कहा कि किसी भी मेडिकल पर्चे में ऐसा कोई स्पष्ट जिक्र नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता की मानसिक स्थिति खराब है या वह शराब की आदी है।
पीठ ने यह भी कहा कि पति का निलंबन उसके खराब आचरण को दर्शाता है। उसका व्यवहार यह बताता है कि उसे अदालत और कानून के आदेशों की कोई परवाह नहीं है।
न्यायमूर्ति जैन की पीठ ने अपने अंतिम आदेश में कहा कि बच्चे की कम उम्र को देखते हुए यही उसके सबसे अच्छे हित में है कि उसकी कस्टडी याचिकाकर्ता मां को सौंप दी जाए। अपनी पोषण संबंधी सभी जरूरतों के लिए वह मासूम पूरी तरह से अपनी मां पर निर्भर है और उसे मां से दूर रखना उसके साथ घोर अन्याय होगा।
अदालत ने पति को सख्त निर्देश दिया है कि वह तीन दिन के भीतर नाबालिग की कस्टडी अपनी पत्नी को सौंप दे।
हालांकि, नाबालिग और उसके पिता के बीच भावनात्मक जुड़ाव को बनाए रखने के लिए अदालत ने पिता को बच्चे से मिलने का अधिकार (विजिटेशन राइट्स) भी प्रदान किया है।
पति ने अदालत से गुहार लगाई थी कि उसे महीने में दो बार अपने बच्चे से मिलने की अनुमति दी जाए। कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया, लेकिन यह शर्त लगाई कि उसे इसके लिए पहले अपनी पत्नी को सूचित करना होगा और यह मुलाकात नजदीकी पुलिस स्टेशन में ही होगी।
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