
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक बेहद अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि अगर किसी महिला को संकट के समय उसके माता-पिता से आर्थिक सहायता मिल रही है, तो इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पति उसे गुजारा भत्ता देने के अपने कानूनी दायित्व से मुक्त हो गया है। अदालत ने बुलंदशहर परिवार न्यायालय के दिसंबर 2023 के उस आदेश को पलट दिया, जिसमें पत्नी को भरण-पोषण देने से पूरी तरह इनकार कर दिया गया था।
पत्नी और बच्चों के हक में बड़ा फैसला
न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की पीठ ने पत्नी रीनू और उनके दो नाबालिग बच्चों द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार कर लिया। 17 जून को दिए गए अपने फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि पत्नी के माता-पिता की आय को किसी भी सूरत में महिला की अपनी आय नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही कोर्ट ने पत्नी के भरण-पोषण के अधिकार को बहाल किया और बच्चों को मिलने वाली राशि में भी वाजिब इजाफा किया।
भरण-पोषण की राशि में हुई वृद्धि
इस बड़े फैसले के बाद अब पति को अपनी पत्नी को हर महीने 5,000 रुपये का गुजारा भत्ता देना होगा। वहीं, हाई कोर्ट ने दोनों बच्चों के भरण-पोषण की राशि को भी 3,000 रुपये से बढ़ाकर 4,000 रुपये प्रति माह कर दिया है। अदालत ने बच्चों को पहले मिल रही 3,000 रुपये की राशि को आज के समय में स्कूल, भोजन, कपड़े, किताबें और चिकित्सा जैसी बुनियादी जरूरतों के हिसाब से पूरी तरह से अपर्याप्त और अवास्तविक करार दिया।
पेंशन से होगी सीधी वसूली
महिला का पति एक सेवानिवृत्त सैन्यकर्मी है। हाई कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि यदि वह गुजारा भत्ता चुकाने में कोई चूक करता है, तो पत्नी और बच्चों को यह अधिकार होगा कि वे सक्षम न्यायालय का दरवाजा खटखटाएं। ऐसी स्थिति में पति की मिलिट्री पेंशन और अन्य कानूनी प्राप्तियों से सीधे भरण-पोषण की राशि काटी और वसूली जा सकेगी।
प्रताड़ना और घर से निकाले जाने का आरोप
पीड़िता ने सीआरपीसी (CrPC) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग करते हुए अदालत को बताया था कि शादी के बाद से ही उसे ससुराल वालों और पति के तानों, प्रताड़ना और क्रूरता का शिकार होना पड़ा। महिला के मुताबिक, पति ने उसके साथ वैवाहिक संबंध खत्म कर लिए और दूसरी शादी करने की बात कही। जनवरी 2020 में उसे और उसके बच्चों को घर से निकाल दिया गया, जिसके बाद से वह मायके में बिना किसी स्वतंत्र आय के जीवन यापन कर रही है।
पति की दलीलें और आय का ब्यौरा
दूसरी तरफ, पति ने पत्नी के दावों का विरोध करते हुए उस पर बिना किसी ठोस कारण के घर छोड़ने और गैर-पुरुषों के साथ अवैध संबंध रखने का आरोप लगाया। उसने कोर्ट को बताया कि सेना में नौकरी के दौरान नवंबर 2020 में रिटायरमेंट तक उसकी सैलरी से हर महीने 11,303 रुपये कटकर पत्नी और बच्चों को मिलते थे। उसने यह भी कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद उसे केवल 21,025 रुपये मासिक पेंशन मिल रही है और कमाई का कोई अन्य जरिया नहीं है।
निचली अदालत की खामियां उजागर
बुलंदशहर की फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद पत्नी की याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि महिला दहेज मांग, मारपीट या पति की दूसरी शादी के आरोपों को साबित करने में नाकाम रही है। हालांकि, हाई कोर्ट में महिला ने जोरदार दलील दी कि धारा 125 सीआरपीसी की कार्यवाही का मुख्य उद्देश्य आश्रितों को बेसहारा होने से बचाना है, न कि इसे क्रूरता या व्यभिचार के पूर्ण वैवाहिक मुकदमे की तरह देखा जाना चाहिए।
यह भी तर्क दिया गया कि जब पति ने नवंबर 2020 के बाद कोई गुजारा भत्ता नहीं दिया, तो निचली अदालत का यह मानना गलत था कि पत्नी की उपेक्षा नहीं हुई है।
कानूनी बारीकियों पर हाई कोर्ट की टिप्पणी
हाई कोर्ट ने माना कि भरण-पोषण से इनकार करने का फैमिली कोर्ट का तर्क कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं था। अदालत ने साफ किया कि धारा 125 सीआरपीसी की कार्यवाही में क्रूरता के सख्त सबूतों की वैसी जरूरत नहीं होती, जैसी किसी आपराधिक मुकदमे में होती है। पीठ ने कहा कि जब पति ने खुद तलाक की कार्यवाही शुरू की है, दोनों के बीच गंभीर वैवाहिक कलह है और पत्नी के पास दो बच्चों की कस्टडी है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि वह बिना किसी कारण के अलग रह रही है।
चरित्र हनन से छिनता नहीं अधिकार
व्यभिचार के आरोपों पर पीठ ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि पत्नी के चरित्र पर केवल शक करने या आरोप लगाने भर से उसे गुजारा भत्ता से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 125(4) का प्रतिबंध तभी लागू होता है जब व्यभिचार ठोस और स्वतंत्र सबूतों के साथ साबित हो। अंत में अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि कोई भी शारीरिक रूप से सक्षम पति अपनी आय छिपाकर या पत्नी के माता-पिता की आर्थिक मदद का बहाना बनाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करने के वैधानिक दायित्व से बच नहीं सकता।
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