बंगाल में ममता सरकार का OBC कानून बदला, आरक्षण कोटा 17% से घटकर 7% बचा

पश्चिम बंगाल विधानसभा में ओबीसी आरक्षण संशोधन बिल पास होने से कोटा 17% से घटकर 7% रह गया है। वहीं, इस बिल पर वोटिंग के दौरान टीएमसी के बागी गुट की अंदरूनी कलह भी पूरी तरह से खुलकर सामने आ गई।
West Bengal OBC Quota
पश्चिम बंगाल में ममता सरकार का OBC आरक्षण कानून बदला। कोटा अब 17% से 7% हुआ। विधानसभा में बिल पास होने पर टीएमसी के बागी गुट में भारी फूट।
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नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा में सोमवार को एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला। राज्य की मौजूदा बीजेपी सरकार ने पिछली टीएमसी सरकार द्वारा बनाए गए ओबीसी आरक्षण कानूनों में संशोधन करने वाले दो महत्वपूर्ण बिल पास कर दिए हैं।

इन बदलावों के साथ ही अब राज्य में ओबीसी कोटे को 17 प्रतिशत से घटाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया है। यह बड़ा कदम कलकत्ता हाईकोर्ट के हालिया निर्देशों के पालन में उठाया गया है।

विधानसभा में 'द वेस्ट बंगाल बैकवर्ड क्लासेज (शेड्यूल्ड कास्ट और शेड्यूल्ड ट्राइब्स को छोड़कर) (रिजर्वेशन ऑफ वेकेंसीज इन सर्विसेज एंड पोस्ट्स) (अमेंडमेंट) बिल, 2026' और 'द वेस्ट बंगाल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लासेज (अमेंडमेंट) बिल, 2026' को ध्वनि मत और मत विभाजन के बाद मंजूरी दी गई। इन दोनों विधेयकों के कानून बनने के बाद अब केवल 66 वर्गों को ही ओबीसी श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ मिलेगा।

सदन में बिल पेश करते हुए पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री गौरीशंकर घोष ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार पूरी तरह से हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार काम कर रही है। उन्होंने इस बात पर विशेष जोर दिया कि इन संशोधनों के पीछे सरकार की कोई राजनीतिक मंशा नहीं है।

मंत्री घोष ने सदन को बताया कि सरकार ने बिना किसी जमीनी सर्वेक्षण के पहले शामिल किए गए 113 वर्गों को सूची से हटा दिया है। उनकी जगह केवल उन्हीं 66 उप-वर्गों को बरकरार रखा गया है, जिन्हें बाकायदा विभिन्न सर्वेक्षणों के आधार पर शामिल किया गया था।

उन्होंने आगे बताया कि पिछड़ा वर्ग आयोग अब स्वतंत्र रूप से जांच करेगा और यदि उसे लगता है कि किसी नए समुदाय को सूची में शामिल किया जाना चाहिए, तो वह राज्य सरकार को अपनी सिफारिशें दे सकता है। मंत्री ने आरोप लगाया कि पिछली टीएमसी सरकार ने आयोग को पूरी तरह दरकिनार कर दिया था, और इसी वजह से हाईकोर्ट ने उनकी प्रक्रिया को असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया।

विधेयकों का समर्थन करते हुए दमदम से बीजेपी विधायक अरिजीत बख्शी ने पिछली ममता सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व सरकार ने केवल अल्पसंख्यक समुदाय को खुश करने और अपना वोट बैंक सुरक्षित करने के लिए ओबीसी सूची तैयार की थी। बख्शी के अनुसार, इस तुष्टिकरण की राजनीति के कारण समाज के वास्तविक पिछड़े वर्गों को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया।

इन विधेयकों के पास होने के दौरान विधानसभा में टीएमसी के दोनों गुटों के बीच एक दुर्लभ ध्रुवीकरण देखने को मिला। पूर्व सीएम ममता बनर्जी के वफादारों और ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने अपना-अपना रुख साफ किया, लेकिन इस प्रक्रिया ने बागी गुट के भीतर की अंदरूनी कलह को भी पूरी तरह से उजागर कर दिया।

जैसे ही दोनों बिल पेश किए गए, आईएसएफ विधायक नौशाद सिद्दीकी ने ध्वनि मत का कड़ा विरोध किया और मत विभाजन की मांग की। टीएमसी विधायक जावेद खान और सबीना यास्मीन ने भी बिलों का विरोध करते हुए इस मांग का समर्थन किया। विपक्ष की आपत्तियों को स्वीकार करते हुए स्पीकर रथींद्र बसु ने मत विभाजन की अनुमति दे दी।

मत विभाजन की घोषणा के तुरंत बाद, टीएमसी के कई बागी विधायकों ने सदन से वॉकआउट कर दिया। हालांकि, गुट के सामूहिक फैसले की अनदेखी करते हुए बागी धड़े के काजल शेख, बहारुल इस्लाम, बायरन विश्वास, पन्नालाल हलदर और तौसीफुर रहमान सदन के भीतर ही अपनी सीटों पर बैठे रहे।

दूसरी ओर, ममता बनर्जी के वफादार माने जाने वाले शोभनदेव चट्टोपाध्याय, बिमान बनर्जी, कुणाल घोष, अलिफा अहमद और पुलक रॉय ने सदन में रुककर इन विधेयकों के खिलाफ अपना वोट डाला।

वोटिंग प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन दोनों विधेयकों के पक्ष में कुल 186 वोट पड़े। वहीं, इसके खिलाफ केवल 17 वोट डाले गए, जिनमें से एक वोट टीएमसी के बागी गुट के सदस्य का भी शामिल था।

2012 से 2024 और अब 2026: कैसे बदला ओबीसी कोटा

ओबीसी कोटे के इस पूरे विवाद की जड़ें पिछले एक दशक के कानूनी और प्रशासनिक फैसलों से जुड़ी हैं। मई 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2010 से 2012 के बीच मुख्य रूप से जोड़े गए 77 अतिरिक्त समुदायों के ओबीसी दर्जे और उन्हें जारी किए गए प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया था। अदालत ने इन शामिल किए गए नामों को पूरी तरह से अवैध और असंवैधानिक घोषित किया था।

हाईकोर्ट के उस फैसले के कारण 2010 के बाद जारी किए गए लगभग 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्र एक झटके में रद्द हो गए थे। हालांकि, अदालत ने उन व्यक्तियों की नौकरियों को सुरक्षित रखा था जो पहले ही इस कोटे के माध्यम से रोजगार प्राप्त कर चुके थे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया था कि 2010 से पहले जारी किए गए प्रमाणपत्र पूरी तरह से मान्य रहेंगे।

मौजूदा नियमितीकरण ने राज्य की उस पुरानी आरक्षण व्यवस्था को खत्म कर दिया है, जिसके तहत 'श्रेणी ए' (अधिक पिछड़े) को 10 प्रतिशत और 'श्रेणी बी' (पिछड़े) को 7 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता था।

19 मई को नवनिर्वाचित बीजेपी सरकार ने धर्म-आधारित वर्गीकरण योजनाओं को पूरी तरह से बंद करने का ऐलान किया। इसके तहत 2010 से पहले राज्य की ओबीसी आरक्षण सूची में शामिल 66 समुदायों को नियमित करते हुए, उनके लिए सात प्रतिशत कोटे की पात्रता को कानूनी रूप से फिर से बहाल कर दिया गया है।

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