इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला: ग्राम न्यायालय को भी है भरण-पोषण के मामलों की सुनवाई का अधिकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: अब ग्राम न्यायालय भी सुनेंगे भरण-पोषण के मामले, करहल कोर्ट को 6 महीने में निपटारे का निर्देश।
इलाहाबाद हाईकोर्ट
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उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ग्राम न्यायालय (विलेज कोर्ट) के पीठासीन अधिकारी को एक महिला के भरण-पोषण भत्ते से जुड़ी निष्पादन याचिका (एग्जीक्यूशन पिटीशन) का निपटारा छह महीने के भीतर करने का निर्देश दिया है। यह आदेश गुरुवार को जारी किया गया।

इससे पहले, हाईकोर्ट की एक अन्य एकल पीठ ने धारा 125 सीआरपीसी के तहत ग्राम न्यायालय द्वारा इस याचिका की सुनवाई करने पर सवाल उठाए थे। यह कानूनी प्रावधान पत्नियों, बच्चों और माता-पिता को मासिक भरण-पोषण का दावा करने का अधिकार देता है।

पिछले साल नवंबर में इसी अर्जी पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अनिल कुमार-एक्स की पीठ ने अधिकार क्षेत्र की कमी का हवाला देते हुए संबंधित न्यायिक अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा था।

अब 9 अप्रैल को जस्टिस अब्दुल शाहिद की पीठ ने इस मामले की दोबारा सुनवाई की। अदालत ने ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 और पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की विभिन्न धाराओं का हवाला देते हुए मैनपुरी के करहल स्थित ग्राम न्यायालय के पीठासीन अधिकारी को इस मामले को जल्द से जल्द सुलझाने का निर्देश दिया।

पीठ ने कानूनी प्रावधानों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि ग्राम न्यायालय अधिनियम 2008 की धारा 12 और 14 के तहत प्रथम अनुसूची के भाग II में खंड (v) शामिल है। यह खंड आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) 1973 के अध्याय IX और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) 2023 के संबंधित प्रावधानों के तहत पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण के आदेशों से जुड़ा है।

अदालत ने आगे बताया कि पत्नी, बच्चों और माता-पिता के भरण-पोषण से जुड़े मामलों के लिए दो अलग-अलग कानून मौजूद हैं। इनमें पारिवारिक न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 7 और ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008 की धारा 12 शामिल हैं।

जस्टिस शाहिद की पीठ ने अपनी टिप्पणी में साफ किया कि ग्राम न्यायालय के पास सीआरपीसी की धारा 125 से 128 और बीएनएसएस 2023 की धारा 144 से 147 के तहत भरण-पोषण से जुड़े आवेदनों व मामलों की सुनवाई करने और फैसला सुनाने का पूरा अधिकार क्षेत्र है।

इस मामले में याचिकाकर्ता दामिनी ने मैनपुरी के करहल स्थित ग्राम न्यायालय को निर्देश देने की गुहार लगाई थी। वह अपने पति से भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए उसी न्यायालय द्वारा पूर्व में दिए गए फैसले के अनुपालन की मांग कर रही थीं।

याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि दामिनी ने पहले धारा 125 सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण के लिए याचिका दायर की थी, जिस पर न्यायाधिकारी ने 30 नवंबर 2024 को अपना फैसला सुनाया था। इसके बाद फैसले को लागू करवाने के लिए उसी अदालत में निष्पादन याचिका दायर की गई।

सभी दलीलों को सुनने और कानूनों का हवाला देने के बाद, हाईकोर्ट ने कहा कि कानूनी ढांचे और प्रावधानों को देखते हुए ग्राम न्यायालय के पास इस लंबित याचिका पर फैसला करने का आवश्यक अधिकार क्षेत्र है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि ग्राम न्यायालय के न्यायाधिकारी को बीएनएसएस, 2023 की धारा 147 के तहत लंबित निष्पादन याचिका संख्या 25/2024 (दामिनी बनाम पंकज शर्मा) का कानून के अनुसार जल्द से जल्द फैसला करना चाहिए। इसे प्राथमिकता के आधार पर छह महीने की अवधि के भीतर निपटाने का निर्देश दिया गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले इसी मामले की सुनवाई जस्टिस अनिल कुमार-एक्स की पीठ ने की थी। उस समय भी करहल के ग्राम न्यायालय को निष्पादन याचिका की कार्यवाही जल्द पूरी करने का निर्देश देने की प्रार्थना की गई थी।

उस दौरान 13 नवंबर 2025 को दिए गए अपने आदेश में पीठ ने हैरानी जताते हुए कहा था कि अधिकार क्षेत्र न होने के बावजूद ग्राम न्यायालय के पीठासीन अधिकारी ने धारा 125 सीआरपीसी के तहत याचिका को कैसे स्वीकार कर लिया।

उस समय पीठ ने मैनपुरी के जिला न्यायाधीश के माध्यम से संबंधित न्यायिक अधिकारी से जवाब तलब किया था। इसके बाद यह पूरा मामला 9 अप्रैल को जस्टिस अब्दुल शाहिद की पीठ के समक्ष पेश किया गया, जहां से यह नया और स्पष्ट आदेश पारित हुआ।

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