
राजस्थान। ऐसे समय में जब जाति और धर्म का हस्तक्षेप समाज में बढ़ती असहिष्णुता की जड़ मानी जा रही है, राजस्थान के उदयपुर में यह शैक्षणिक संस्थान जातीय आधार पर पहचान की रूढ़िवादिता को समाप्त करने की दिशा में एक आदर्श प्रस्तुत कर रहा है। डिप्लोमा, स्नातकोत्तर डिप्लोमा स्तर और विभिन्न कौशल विकास पाठ्यक्रम प्रदान करने वाले विद्या भवन पॉलिटेक्निक कॉलेज ने उपनाम के उपयोग की सदियों पुरानी प्रथा को समाप्त कर दिया है। अंतिम नाम केवल अत्यावश्यक दस्तावेजी रिकार्ड के लिए ही उल्लेखित किया जाता है जैसे सरकारी रिकॉर्ड के लिए प्रवेश पत्र, मार्कशीट और छात्रों के प्रमाण पत्र के रखरखाव में उपनाम का उल्लेख अनिवार्य है।
इस पॉलिटेक्निक कॉलेज में छात्रों से लेकर टीचिंग, नॉन टीचिंग स्टाफ और प्रिंसिपल तक की पहचान उनके पहले नाम से ही होती है. “हम इसे फर्स्ट नेम फर्स्ट इनिशिएटिव (FNFI) कहते हैं, जिसके तहत कॉलेज से जुड़े किसी भी व्यक्ति के लिए केवल पहले नाम का उपयोग किया जाएगा। एफएनएफआई के तहत उपस्थिति पंजिका से छात्रों के उपनाम हटा दिए गए हैं और इसी तरह नेम प्लेट से कर्मचारियों के उपनाम भी काट दिए गए हैं। हम सभी अपने पहले नाम से जाने जाते हैं।" प्रिंसीपल डॉ. अनिल ने द मूकनायक को बताया। (उन्होंने रिपोर्ट में किसी भी उपनाम का उल्लेख नहीं करने का आग्रह किया)
यह विचार 2015 में प्रिंसिपल अनिल को सूझा और कुछ शुरुआती झिझक के साथ, लोगों ने खुद को नए तौर-तरीकों के अनुकूल बनाना शुरू कर दिया। 2017 तक कॉलेज मामलों के दैनिक प्रबंधन में पहल पूरी तरह से लागू की गई। अंतिम/उपनाम को नोटिस बोर्ड से हटा दिया गया। कार्यालयों के बाहर नई नेम प्लेटें लगाई गईं, जिनमें संबंधित विभागों के बाहर केवल पदाधिकारियों और संकाय सदस्यों के पहले नाम दर्ज हैं। इस व्यवस्था को लागू हुए 5 साल हो चुके हैं और अब प्रत्येक स्टाफ और विद्यार्थी इस पहल के कायल हैं। विद्यार्थियों का मानना है कि जातीय नाम नहीं उल्लेखित होने से सभी मे समभाव की भावना घर करने लगी है और कोई किसी को हीन भाव से नहीं देखता है। इधर, स्टाफ का भी कहना है कि नई व्यवस्था से पक्षपात और फेवरेटिज्म की कोई गुंजाइश ही नहीं रह गई है।
"जातिवाद हमारी व्यवस्था में इतना अंतर्निहित और अनुकूलित है कि हम सभी कहीं न कहीं इसे अपना चुके हैं। हमारे जैसे विविध संस्कृतियों वाले समाज में, विविधता एक ताकत है, लेकिन जब पूर्वाग्रहों की वजह से सोच संकीर्ण हो जाती है और हम नहीं चाहते कि हमारे छात्र भी अपने भीतर इस तरह के पूर्वाग्रहों का पोषण करें," अनिल कहते हैं। कॉलेज में 500 छात्र-छात्राएं हैं जो मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक, आईटी और सिविल इंजीनियरिंग डिप्लोमा कोर्स और रबर टेक्नोलॉजी पोस्ट डिप्लोमा कोर्स में नामांकित हैं। शिक्षण, तकनीकी और सहायक कर्मचारियों की संख्या 65 है जिसमें 12 महिला कर्मचारी भी शामिल हैं। कॉलेज की चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी दुर्गा से जब द मूकनायक ने बात की तो उन्होंने उत्साहित लहज़े में कहा, "हर कोई समानता की बात करता है मगर वास्तव में हमारे समुदाय के साथ भेदभाव किया जाता रहा है। लेकिन इस कॉलेज में हम सब सही मायनों में बराबर हैं। हम सभी स्टाफ के साथ चाय और जलपान करते हैं, हमारे कप-प्लेट भी अलग नहीं, काश हर संस्था और कार्यालय में यही चलन हो।"
नए तौर को स्वीकार करना आसान नहीं था क्योंकि एक कक्षा में समान नाम वाले विद्यार्थियों के बीच उपनाम हटा देने से भ्रम की स्थिति बनती थी। अनिल कहते हैं, ''हमें रास्ता मिल गया और ऐसे मामलों में पहचान की पुष्टि के लिए अंतिम नाम के 'आद्याक्षर' का इस्तेमाल किया जाता है.'' FNF पहल ने 100% सफलता दर हासिल की है। कॉलेज प्रशासन ने संस्थान के मेरिट धारकों के डिस्प्ले बोर्ड से उपनाम भी हटा दिए। सतही स्तर पर, इस पहल ने विशेष रूप से युवा पीढ़ी की मानसिकता को बदलने और एकता की भावना पैदा करने में काफी हद तक मदद की है," प्रिंसिपल कहते हैं।
विद्या भवन सोसाइटी ने अपने द्वारा संचालित सभी 13 संस्थानों के लिए लागू किया गया एक और बड़ा बदलाव उपस्थिति रिकॉर्ड रखने के पदानुक्रमित तरीके को खत्म करना है। सोसायटी के अध्यक्ष अजय और सीईओ डॉ. अनुराग ने संबद्ध संस्थानों के लिए उपस्थिति रिकार्ड पदानुक्रम की बजाय वर्णानुक्रम में दर्ज करने की अनिवार्यता कर दी है। अजय कहते हैं कि “यह कदम सभी जातियों, लिंग, धर्म और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के लोगों के लिए समान सम्मान के आधार पर मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए उठाया गया है। जीवन पर एक व्यापक और खुले दिमाग का दृष्टिकोण विकसित करने के लिए, इस तरह के छोटे कदम वास्तव में महत्वपूर्ण साबित होते हैं।"
सभी फोटो साभार- विद्या भवन सोसायटी
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