
— ✍️ ईप्सा शताक्षी
पिछले चार साल से अधिक समय से जेल में बंद पत्रकार रूपेश कुमार सिंह को इन चार वर्षों में झारखंड और बिहार की चार जेलों में पांच बार ट्रांसफर किया गया है। इसी क्रम में पिछले 9 अप्रैल को आधारहीन प्रशासनिक कारण बताकर उन्हें भागलपुर के शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारा में स्थानांतरित कर दिया गया।
ट्रांसफर के समय जेल प्रशासन आमतौर पर “जेल की शांति-व्यवस्था भंग होने” जैसे कारण बताकर सीनियर प्रशासनिक अधिकारियों के पास अर्जी लगा देता है। इस आरोप की न तो कोई निष्पक्ष जांच होती है और न ही ट्रांसफर किए जाने वाले बंदी को अपना पक्ष रखने का कोई अवसर दिया जाता है। बिना सुने, प्रशासन जहाँ चाहे, वहाँ भेज देता है। रूपेश कुमार सिंह का ट्रांसफर भी इसी तरह किया गया और उन्हें भागलपुर भेज दिया गया, जबकि उनके केस का ट्रायल पटना में चल रहा है।
इस ट्रांसफर का मूल कारण जेल में हो रही अनियमितताओं पर उनकी आवाज उठाना प्रतीत होता है। इस बार उन्होंने बेऊर जेल में अनियमितताओं को लेकर पटना के जिलाधिकारी को आवेदन लिखा था। उसके बाद ही उन्हें भागलपुर के शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारा भेज दिया गया। इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री, बिहार को हाल ही में एक पत्र लिखा गया है, जिसमें उन्हें ट्रायल वाले स्थान पर रखने की गुजारिश की गई है।
पत्र में लिखा गया है:
“मेरे पति रूपेश कुमार सिंह को पिछले 9 अप्रैल 2026 को प्रशासनिक आधार बताकर पुनः शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारा ट्रांसफर कर दिया गया है, जबकि उनके केस का ट्रायल एनआईए पटना सिविल कोर्ट में चल रहा है। इससे पहले भी मेरे पति को छह महीने के लिए स्थानांतरित किया गया था, पर 20 महीने बाद हमारे द्वारा याचिका लगाने और कोर्ट के आदेश पर उन्हें वापस आदर्श केंद्रीय कारा, बेऊर, पटना लाया गया था। इन पूरे 20 महीनों में उन्हें सेल में ही रखा गया था।
मेरे पति पेशे से पत्रकार हैं। एनआईए, पटना के केस नंबर 19/22 में विचाराधीन बंदी हैं, जिनका विचारण व्यवहार न्यायालय, पटना के एनआईए कोर्ट में चल रहा है।
माननीय, मेरे पति पेशे से पत्रकार और एक किताब के लेखक भी हैं। उन्होंने स्वतंत्र पत्रकार के रूप में कार्य किया है और उनकी रिपोर्ट देश के जाने-माने वेब पोर्टल्स सहित कई प्रिंट मीडिया में प्रकाशित होती रही है। उनकी अधिकांश रिपोर्टिंग समाज में हाशिए पर पड़े लोगों पर केंद्रित रही है।
मेरे पति रूपेश कुमार सिंह मानवाधिकारों के उल्लंघन और आदिवासी लोगों के उत्पीड़न पर अपनी रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। रूपेश कविताएँ भी लिखते हैं और उनकी कविताएँ भी समाज के लिए होती हैं। वे बौद्धिक वर्ग से संबंध रखते हैं। जेल में रहते हुए उन्होंने इतिहास से अपना मास्टर्स पूरा किया है तथा ‘जर्नलिज्म इन मास कम्युनिकेशन’ की सारी लिखित परीक्षाएँ पास कर चुके हैं, पर प्रैक्टिकल के लिए जेल प्रशासन से सहयोग चाहिए, जो भागलपुर जेल में नहीं मिल पाया। अगर आदर्श केंद्रीय कारा में मिले तो यह कोर्स भी पूरा हो जाएगा। इस वर्ष उन्होंने जेल से ही यूजीसी-नेट की परीक्षा भी दी।
मेरे पति का स्वास्थ्य भी जेल में ठीक नहीं रह रहा है। उनका हाई लिपिड प्रोफाइल, स्लीप डिस्क, एंग्जायटी, साइनस, पीठ व कमर दर्द तथा पैरों में तीखे दर्द की समस्या चार साल के जेल जीवन में हो गई है। डिप्रेशन या एंग्जायटी में संगीत एक साधन है जो इसमें सुधार ला सकता है। जेल के नॉर्मल वार्ड में तो इसकी सुविधा दी जाती है, पर सेल बंदियों को नहीं। ऐसे में लगातार सेल में रखे गए बंदी की मानसिक स्थिति क्या होगी?
पटना में अच्छे अस्पताल हैं और यहाँ जेल चाहे तो समुचित इलाज भी मिल सकता है। जब रूपेश बेऊर जेल में थे तो उन्हें कोर्ट ऑर्डर पर आईजीआईसी (इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोलॉजी, पटना) में दिखाया गया था। पर नियमित इलाज की जगह उन्हें भागलपुर भेज दिया गया।
आधारहीन प्रशासनिक कारण लगाकर स्थानांतरित किया जाता है, जबकि इसका मूल कारण जेल में अनियमितता पर उनके द्वारा आवाज उठाना है। उन्होंने बेऊर जेल में अनियमितताओं को लेकर पटना के जिलाधिकारी को आवेदन लिखा था। उसके बाद उन्हें भागलपुर के शहीद जुब्बा सहनी केंद्रीय कारा भेज दिया गया।
माननीय, जब भी किसी जेल में बदतर स्थिति पर मेरे पति द्वारा आवाज उठाई जाती है और जानवरों को दिए जाने लायक खान-पान पर जेल प्रशासन से संबंधित जेल मैनुअल के हिसाब से खान-पान मांगा जाता है, तब उन्हें शांति-व्यवस्था भंग करने के नाम पर और मनगढ़ंत आरोप लगाकर बार-बार प्रशासनिक ट्रांसफर कर दिया जा रहा है। जो इस बार भी हुआ। इसकी आशंका मेरे पति ने पटना के जिलाधिकारी को लिखे पत्र में भी जताई थी और माननीय न्यायालय के समक्ष भी जताई थी।
जेल ट्रांसफर के लिए जेल प्रशासन द्वारा लगाए गए मनगढ़ंत आरोपों की न तो जांच होती है और न ही बंदी को अपना पक्ष रखने का मौका दिया जाता है। साथ ही न कभी परिवार को जानकारी दी जाती है-न ट्रांसफर के पहले, न बाद में।
माननीय, क्या कोई आरोप लगा देने मात्र से ही कोई दोषी सिद्ध हो जाता है? माननीय को बताना चाहती हूँ कि भागलपुर का जुब्बा सहनी केंद्रीय कारा मेरे निवास स्थान से लगभग 350 किलोमीटर दूर है। मेरा एक छोटा सा बच्चा है जो स्कूल जाता है। भागलपुर में केस नहीं है, अतः वहाँ हमारे वकील भी नहीं हैं। ऐसे में मेरे लिए वहाँ जाना और सब कुछ मैनेज करना बहुत ही परेशानी भरा और आर्थिक रूप से भी बोझिल हो जाता है।
पटना में रहने से ‘फेयर ट्रायल’ के साथ-साथ वकील से बातचीत और कोर्ट में पेशी के दौरान मेरा बेटा, जो चार सालों से अपने पिता से दूर है, दो बार अपने पिता से आमने-सामने मिल भी सका। कुछ देर ही सही, अपने मन की बात कह सका और पिता को छू भी सका। वरना जेल से मात्र पाँच मिनट की कॉल होती है, वह भी महीने में केवल छह बार। जिसमें हाल-चाल पूछते ही खत्म हो जाता है, तो कभी खराब नेटवर्क के कारण वह भी नहीं हो पाता।
माननीय, अगर ऐसा होगा तो कोई भी बंदी जेल के अनियमित और भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ कैसे बोलने की हिम्मत कर सकेगा? मेरे पति का इस प्रकार जेल ट्रांसफर करना मानवाधिकार का हनन है। इससे न सिर्फ उनका स्वास्थ्य प्रभावित हुआ है, बल्कि आगे उनका अपना ‘फेयर ट्रायल’ भी प्रभावित होगा। अपने अधिवक्ता से संपर्क मुश्किल होगा और हमें भी फिर से कई किलोमीटर दूर मुलाकात के लिए जाने की नई मानसिक, आर्थिक और शारीरिक परेशानियाँ झेलनी पड़ेंगी।
अतः माननीय से निवेदन है कि इस संवेदनशील मुद्दे पर न सिर्फ मेरे पति के लिए, बल्कि संपूर्ण बंदियों के लिए उनके बंदी अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए कोई उचित पहल की जाए। जेल ट्रांसफर की इस दंडात्मक प्रकृति से मानवाधिकार की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
जेल ट्रांसफर की यह कार्रवाई महज जेल प्रशासन द्वारा बंदियों को उनके हक-अधिकार की बात रखने के बदले दी जाने वाली सजा बनकर रह गई है। इसमें न तो कोई पारदर्शिता होती है, न कभी बंदी के पक्ष को सुना जाता है और न ही हर बार माननीय न्यायालय से आदेश लिया या बताया जाता है।
मुझे विश्वास है कि माननीय द्वारा इस पर यथोचित कदम उठाया जाएगा और मेरे पति को वापस उनके ट्रायल वाले स्थान पर ही रखा जाएगा।”
मालूम हो कि रूपेश कुमार सिंह की गिरफ्तारी उनकी औद्योगिक प्रदूषण पर झारखंड के गिरिडीह जिले के चतरो गाँव में फैले औद्योगिक प्रदूषण पर की गई ग्राउंड रिपोर्टिंग के तुरंत बाद की गई थी। यह रिपोर्ट “ग्राउंड रिपोर्ट: धुआँ और राख के बीच घुटती लाखों जिंदगियाँ” शीर्षक से वेबपोर्टल जनचौक में 15 जुलाई 2022 को प्रकाशित हुई थी। प्रकाशित होते ही यह एक्स (तब ट्विटर) पर भी वायरल हो गई थी।
इस ग्राउंड स्टोरी का केंद्र एक छोटी बच्ची के चेहरे पर फैला बड़ा सा ट्यूमर था, जिसे रूपेश ने हाईलाइट किया था ताकि बच्ची का इलाज हो सके। क्योंकि वह बच्ची उस ट्यूमर के कारण, जिसके पीछे का कारण वहाँ का प्रदूषण था, न तो कुछ बोल पा रही थी और न ही सामान्य तौर पर जी पा रही थी। खाना भी उसके लिए मुश्किल भरा काम था। परिवार भी गरीब था, इलाज करा पाना उनके बस की बात नहीं थी।
रूपेश ट्विटर पर लगातार संबंधित अधिकारियों व मंत्रियों को टैग कर इस बच्ची की नाजुक स्थिति पर ध्यान आकर्षित करना चाह रहे थे, ताकि जल्द से जल्द बच्ची का इलाज हो और वह सामान्य जीवन जी पाए। आखिरकार वे खुद भी एक छोटे बच्चे के पिता हैं। रूपेश की कोशिश रंग लाई और आरआईएमएस तथा मेडिका के डॉक्टरों ने उसके इलाज करने की बात कही। साथ ही बॉलीवुड अभिनेता सोनू सूद की टीम ने भी रूपेश से संपर्क किया। इसके अलावा जिला प्रशासन ने भी बच्ची को इलाज के लिए ले जाने का दावा किया। चूँकि रूपेश लगातार बच्ची के परिवार के संपर्क में थे, उन्हें पता चलते ही उन्होंने संबंधित अधिकारी को ट्वीट के माध्यम से स्पष्ट किया कि बच्ची को इलाज के लिए जिला प्रशासन द्वारा कहीं नहीं ले जाया गया है, ताकि अधिकारी को सही और स्पष्ट रूप से स्थिति का पता चले और बच्ची का इलाज सचमुच हो सके।
16 जुलाई 2022 को रूपेश से ट्विटर पर ही कई लोग इलाज को लेकर जुड़ चुके थे। देर रात तक उस छोटी बच्ची के इलाज को लेकर बात चली। आखिरकार डॉक्टरों तथा सोनू सूद की टीम से बातचीत के बाद रूपेश आश्वस्त हो गए कि अब अगले दिन से इस तरफ पहल शुरू हो जाएगी। रूपेश काफी थक भी चुके थे, पर खुश भी थे कि अगली सुबह राहत भरी सुबह होगी।
पर कहते हैं न कि सत्ता का चरित्र एक ही होता है।
शायद बच्ची के इलाज के दौरान औद्योगिक कचरे से बीमारी की बात आती, आरोप वहाँ चल रहे उद्योगों पर लगता और इसकी कई कड़ियाँ जुड़ती जातीं। मामला बढ़ता और लोग शायद प्रदूषण के खिलाफ आंदोलन पर उतर जाते। तो...
अगली सुबह तड़के लगभग पाँच बजे घर के गेट पर दस्तक दी गई। गेट खोलने पर सामने एक बड़ी फोर्स के साथ सरायकेला-खरसावाँ की जिला पुलिस खड़ी थी। घर सर्च करने के नाम पर आई और रूपेश को एक साल पुराने केस में आरोपी बनाकर (एफआईआर में नाम नहीं था) गिरफ्तार कर ले गई। मोबाइल, लैपटॉप भी जब्त कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद पूछताछ के दौरान मीठी धमकी दी गई कि “आपको जेल से निकलने नहीं देंगे।” और इसके बाद कुछ-कुछ समय लेकर कुल चार मामलों में फंसा दिया गया। इनमें से दो में जमानत मिल चुकी है, पर दो में अभी तक नहीं मिली।
एक ऐसा पत्रकार जो अपने पेशे से न्याय कर रहा था, अपने काम में मानवीय मूल्यों को संभाल रहा था--वो चार सालों से सलाखों में कैद है। बाहर परिवार मानसिक, आर्थिक और भावनात्मक तौर पर संघर्ष कर रहा है। जिस बच्ची के इलाज को लेकर इतना भावुक और संघर्षरत था, उसके बारे में भी कोई खबर नहीं मिली।
- इप्सा शताक्षी मानवाधिकारों और आदिवासी मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की जीवनसंगिनी हैं। जुलाई 2022 में पति की गिरफ्तारी के बाद से वह लगातार उनके न्याय के लिए संघर्ष कर रही हैं और खुलकर अपनी बात रखती आई हैं।
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