क्या ओबीसी आज भी राजनीतिक रूप से बेसहारा है?

हाउसलिस्टिंग जनगणना में OBC कॉलम की अनदेखी: क्या मोदी सरकार के इस फैसले से छिन रहा है सामाजिक न्याय का हक?
OBC politics in India,
जातिगत जनगणना के पहले चरण में OBC कॉलम क्यों नहीं? जानिए कैसे हाउसलिस्टिंग में अनदेखी से ओबीसी समुदाय के आर्थिक और आवासीय अधिकारों पर असर पड़ रहा है।(Ai इमेज)
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लेख- अमित मेहरा, सोशल एंड पोलिटिकल एक्टिविस्ट 

यदि जातिगत जनगणना के प्रथम चरण (हाउसलिस्टिंग एवं हाउसिंग जनगणना) में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को शामिल किया जाता है, तो ओबीसी परिवारों के मकान के प्रकार, निर्माण सामग्री, कमरों की संख्या तथा पेयजल, शौचालय, बिजली, स्वच्छ ईंधन जैसी मूलभूत सुविधाओं का सटीक एवं प्रमाणिक रिकॉर्ड तैयार होगा। इससे ओबीसी बहुल क्षेत्रों में आवासीय कमी, कच्चे मकानों और बुनियादी सुविधाओं के अभाव की वास्तविक स्थिति सामने आएगी, जिसके आधार पर सरकार उनकी वास्तविक आवासीय आवश्यकताओं का सही आकलन कर सकेगी।

इस प्रकार प्राप्त आंकड़ों के आधार पर सरकार ओबीसी समुदाय के लिए अधिक प्रभावी एवं लक्षित आवास कल्याण योजनाएँ तैयार कर सकेगी तथा यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंद परिवारों तक पहुँचे। साथ ही ग्राम पंचायतों, नगर निकायों और जिला प्रशासन को गाँव एवं वार्ड स्तर पर ओबीसी बस्तियों और उनकी जीवन परिस्थितियों का विश्वसनीय डेटा उपलब्ध होगा, जिससे स्थानीय विकास योजनाओं को अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी ढंग से बनाया जा सकेगा।

जातिवार आवासीय आंकड़े उपलब्ध होने से आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा आधारभूत ढाँचे जैसी विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के लिए संसाधनों का न्यायसंगत एवं साक्ष्य-आधारित आवंटन संभव होगा। आवास और मूलभूत सुविधाओं से संबंधित जानकारी ओबीसी समुदाय की सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़ेपन का महत्वपूर्ण संकेतक बनेगी और नीति निर्माताओं को वास्तविक परिस्थितियों को समझने में सहायता करेगी।

इससे समावेशी विकास को भी मजबूती मिलेगी और ओबीसी समुदाय को भी वही स्तर का विश्वसनीय डेटा उपलब्ध होगा, जो वर्तमान में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए उपलब्ध होता है।

यदि प्रथम चरण में ही जाति का विवरण दर्ज किया जाता है, तो जनगणना के दूसरे चरण के लिए अधिक सटीक एवं व्यवस्थित गणना ढाँचा तैयार होगा, जिससे संपूर्ण जनगणना की गुणवत्ता और विश्वसनीयता बढ़ेगी। ओबीसी की वास्तविक जनसंख्या एवं आवासीय स्थिति का प्रमाणिक डेटा राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर साक्ष्य आधारित नीति निर्माण और कल्याणकारी योजनाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। साथ ही, जनगणना अधिनियम, 1948 के अंतर्गत संकलित यह डेटा पूर्ण कानूनी मान्यता प्राप्त करेगा और सामाजिक न्याय से संबंधित नीतियों को मजबूत आधार प्रदान करेगा।

ओबीसी को प्रथम चरण में शामिल किए जाने से उन्हें भी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की भाँति विस्तृत आवासीय एवं बसावट संबंधी डेटा उपलब्ध होगा। इसके अतिरिक्त ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में ओबीसी समुदाय की बसावट, प्रवासन और शहरीकरण के रुझानों का भी स्पष्ट चित्र सामने आएगा। मकान की गुणवत्ता, निर्माण सामग्री तथा उपलब्ध सुविधाएँ परिवारों की आर्थिक स्थिति के प्रारंभिक संकेतक के रूप में कार्य करेंगी, जिससे ओबीसी समुदाय की वास्तविक आर्थिक स्थिति का बेहतर आकलन किया जा सकेगा।

विस्तृत आवासीय आंकड़ों के आधार पर ओबीसी वर्ग के भीतर सबसे अधिक वंचित एवं पिछड़े उप वर्गों की पहचान भी अधिक सटीकता से की जा सकेगी, जिससे लक्षित हस्तक्षेप और उप वर्गीकरण जैसी नीतियों को बेहतर आधार मिलेगा। प्रथम चरण में जाति का समावेश हाउसलिस्टिंग की गुणवत्ता, पूर्णता और प्रतिनिधित्व को भी बेहतर बनाएगा तथा पूरी जनगणना को अधिक सटीक और व्यापक बनाएगा।

जनगणना नियमों के अनुसार ओबीसी सहित सभी संकलित आंकड़ों को पूर्ण कानूनी गोपनीयता प्राप्त होगी, जिससे परिवार बिना किसी भय या संकोच के सही जानकारी उपलब्ध करा सकेंगे। यह डेटा भविष्य के सरकारी सर्वेक्षणों, शैक्षणिक अनुसंधानों और नीति अध्ययनों के लिए भी एक विश्वसनीय आधार बनेगा। साथ ही, प्रथम चरण में ओबीसी डेटा संकलित करने से प्रगणकों और पर्यवेक्षकों के कार्य का राष्ट्रीय महत्व भी बढ़ेगा और जनगणना दिशानिर्देशों के अनुरूप उन्हें सम्मान, प्रोत्साहन एवं मान्यता मिलने की संभावनाएँ भी सुदृढ़ होंगी।

यदि भारत सरकार इन सभी तथ्यों पर सकारात्मक विचार करते हुए जनगणना के प्रथम चरण में ओबीसी समुदाय को शामिल करती है, तो यह निर्णय सामाजिक न्याय, समान अवसर, साक्ष्य आधारित नीति निर्माण तथा समावेशी विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी कदम सिद्ध हो सकता है।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ

वर्तमान में देश के अनेक राज्यों में जनगणना का प्रथम चरण, अर्थात हाउसलिस्टिंग एवं हाउसिंग जनगणना की प्रक्रिया चल रही है, किंतु मोदी सरकार ने प्रथम चरण में ओबीसी का अलग कॉलम शामिल नहीं किया। हमारे अनुसार इससे वह महत्वपूर्ण अवसर खो गया, जिसके माध्यम से ओबीसी परिवारों की आवासीय, सामाजिक और आर्थिक स्थिति का प्रमाणिक आधार तैयार किया जा सकता था।

अनेक ओबीसी संगठनों ने इस निर्णय का विरोध किया है और हमारा आरोप है कि मोदी सरकार ने हाउसलिस्टिंग में ओबीसी कॉलम शामिल न करके सामाजिक न्याय के एक महत्वपूर्ण पक्ष की अनदेखी की है। हमारा मानना है कि यदि वास्तव में साक्ष्य आधारित नीति निर्माण, समान अवसर और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व सरकार का उद्देश्य है, तो देश के सबसे बड़े सामाजिक वर्ग को जनगणना के प्रथम चरण में उचित स्थान मिलना चाहिए।

हम भारत सरकार और विशेष रूप से मोदी सरकार से आग्रह करते हैं कि देशभर में जारी हाउसलिस्टिंग एवं हाउसिंग जनगणना के प्रथम चरण में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) का अलग कॉलम तत्काल जोड़ा जाए, ताकि ओबीसी परिवारों की आवासीय, सामाजिक और आर्थिक स्थिति का सटीक एवं प्रमाणिक डेटा एकत्र किया जा सके।

इससे सरकार को साक्ष्य आधारित नीतियाँ बनाने, संसाधनों का न्यायसंगत आवंटन सुनिश्चित करने तथा सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व के उद्देश्य को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने में सहायता मिलेगी। प्रथम चरण में ओबीसी कॉलम को शामिल करना केवल एक प्रशासनिक संशोधन नहीं, बल्कि देश की बड़ी आबादी को नीति निर्माण में उचित पहचान और न्यायपूर्ण भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति The Mooknayak उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं. इस आलेख में दी गई कोई भी सूचना अथवा तथ्य अथवा व्यक्त किए गए विचार The Mooknayak के नहीं हैं, तथा The Mooknayak उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.
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