मुक्ति का महास्वप्न: बुद्ध की प्रज्ञा और रविदास का 'बेगमपुरा'

निर्वाण से बेगमपुरा तक: बुद्ध की अंतर्दृष्टि और गुरु रविदास की सामाजिक क्रांति का अद्भुत संगम
बुद्ध की अंतर्दृष्टि और गुरु रविदास की सामाजिक क्रांति
बुद्ध का 'निर्वाण' या रविदास का 'बेगमपुरा'? जानिए कैसे ये दो महान दर्शन मिलकर बनाते हैं सुखी जीवन और न्यायपूर्ण समाज का पूर्ण मार्ग।
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भारतीय चिंतन परंपरा की यह विशेषता रही है कि यहाँ 'मुक्ति' को केवल पारलौकिक संदर्भों में नहीं, बल्कि इसी लोक में, इसी जीवन में दुःख से निवारण के रूप में देखा गया है। आगामी 1 फरवरी को माघ पूर्णिमा और गुरु रविदास जयंती का पावन अवसर है। यह तिथि हमें दो ऐसे महामानवों के दर्शन के मिलन बिंदु पर खड़ा करती है, जिन्होंने मानवता को भय, शोषण और दुःख से मुक्त करने के दो पूरक मार्ग दिखाए। तथागत बुद्ध जहाँ व्यक्ति के आंतरिक रूपांतरण और मानसिक दुःख के निरोध की बात करते हैं, वहीं गुरु रविदास 'बेगमपुरा' के माध्यम से एक ऐसी सामाजिक संरचना का खाका खींचते हैं, जहाँ दुःख का अस्तित्व ही न हो।

बुद्ध: दुःख का मनोवैज्ञानिक और अस्तित्वगत समाधान

तथागत बुद्ध का संपूर्ण दर्शन 'दुःख' की गहन मीमांसा से प्रारंभ होता है। उन्होंने इस बात को स्थापित किया कि संसार में दुःख है, लेकिन वह अकारण नहीं है। 'धम्मचक्कप्पवत्तन सुत्त' में बुद्ध चार आर्य सत्यों की उद्घोषणा करते हुए कहते हैं “इदं दुक्खं अरियसच्चं” अर्थात यह दुःख का आर्य सत्य है। बुद्ध की दृष्टि में दुःख केवल शारीरिक पीड़ा नहीं, बल्कि मानसिक अशांति और असंतोष है।

बुद्ध दुःख के मूल में 'तण्हा' (तृष्णा) को देखते हैं। वे कहते हैं “या अयं तण्हा पोनोभविका नन्दिरागसहगता तत्रतत्राभिनन्दिनी”। यह तृष्णा ही है जो मनुष्य को बार-बार बंधनों में बांधती है। बुद्ध का मार्ग 'आर्य अष्टांगिक मार्ग' (सम्यक दृष्टि से लेकर सम्यक समाधि तक) व्यक्ति को भीतर से गढ़ने की प्रक्रिया है। जब मनुष्य अपनी तृष्णा, द्वेष और मोह पर विजय पा लेता है, तब वह 'निर्वाण' को प्राप्त होता है। यहाँ मुक्ति का अर्थ चित्त की वह अवस्था है जहाँ कोई विकार शेष न रहे। बुद्ध की मुक्ति मुख्यतः व्यक्तिगत चेतना के स्तर पर घटित होती है, जो अंततः एक शांत समाज का निर्माण करती है।

रविदास: 'बेगमपुरा' और सामाजिक न्याय की उद्घोषणा

बुद्ध के शताब्दियों बाद, गुरु रविदास ने दुःख की परिभाषा को एक व्यापक सामाजिक धरातल प्रदान किया। रविदास उस समय के भारत में थे जहाँ जाति, वर्ण और ऊँच-नीच की बेड़ियाँ मनुष्य की गरिमा को कुचल रही थीं। उनके लिए दुःख केवल मानसिक नहीं, बल्कि 'संरचनात्मक' (Structural) था। उन्होंने एक ऐसे आदर्श समाज की कल्पना की जिसे उन्होंने 'बेगमपुरा' कहा अर्थात वह स्थान जहाँ कोई 'गम' (दुःख) न हो।

रविदास के शब्दों में:

 “बेगमपुरा सहर को नाऊँ, दुख अंधोह

नाही तिहि ठाऊँ।”

यह केवल एक आध्यात्मिक नगर नहीं है, बल्कि एक राजनैतिक और सामाजिक घोषणापत्र है। बेगमपुरा वह समाज है जहाँ न कोई कर (Tax) का दमन है, न संपत्ति का अभाव, न कोई दूसरे या तीसरे दर्जे का नागरिक है और न ही किसी को अपने अस्तित्व पर कोई भय है। रविदास का स्वप्न है “ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिले सबन को अन्न, छोट-बड़ो सब सम बसै, रविदास रहै प्रसन्न।” यहाँ मुक्ति का अर्थ सामाजिक न्याय, समानता और मानवीय गरिमा की प्राप्ति है।

करुणा और समता: साझा वैचारिक धरातल

यद्यपि बुद्ध और रविदास के समय और अभिव्यक्ति की शैलियों में अंतर है, किंतु उनका मूल स्वर एक ही है मनुष्य की श्रेष्ठता उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म से है। बुद्ध 'वस्सेट्ठ सुत्त' में स्पष्ट कहते हैं:

“न जात्या ब्राह्मणो होति, न जात्या होति अब्राह्मणो; कम्मना ब्राह्मणो होति, कम्मना होति अब्राह्मणो।”

अर्थात जन्म से कोई श्रेष्ठ या नीच नहीं होता, व्यक्ति अपने कर्मों से ही श्रेष्ठ बनता है। गुरु रविदास इसी सत्य को अपनी सरल वाणी में दुहराते हैं “ऊँच-नीच सबहि समाई”।

दोनों महामानवों ने कर्मकांडों और पाखंडों के विरुद्ध एक मौन क्रांति का आह्वान किया। बुद्ध के लिए करुणा का अर्थ 'मैत्री' है, जो समस्त प्राणियों के प्रति अहिंसक होने का भाव है। रविदास के लिए वही करुणा 'प्रेम और श्रम' की प्रतिष्ठा है। रविदास स्वयं श्रम करते हुए ईश्वर की साधना करते हैं, जो इस बात का प्रमाण है कि श्रम ही मुक्ति का द्वार है।

आंतरिक बनाम सामाजिक मुक्ति: एक तुलनात्मक दृष्टि

यदि हम सूक्ष्मता से देखें, तो बुद्ध और रविदास की राहें अलग दिशाओं से आकर एक ही केंद्र पर मिलती हैं।

  • दुःख की प्रकृति: बुद्ध का ध्यान 'अस्तित्वगत' दुःख (Existential Suffering) पर अधिक है, जबकि रविदास का ध्यान 'व्यवस्थागत' दुःख (Systemic Suffering) पर।

  • मुक्ति का मार्ग: बुद्ध प्रज्ञा और समाधि के माध्यम से स्वयं को दीपक बनाने (अप्पो दीपो भव) की बात करते हैं। रविदास भक्ति, समर्पण और सामाजिक समानता के संघर्ष के माध्यम से मुक्ति की राह दिखाते हैं।

  • ईश्वर की अवधारणा: बुद्ध एक अनीश्वरवादी और तार्किक दृष्टिकोण रखते हैं, जबकि रविदास निर्गुण निराकार ब्रह्म की भक्ति के माध्यम से सामाजिक समरसता का सूत्र पिरोते हैं।

आज के दौर में प्रासंगिकता

आज का समय विचित्र विरोधाभासों से भरा है। एक ओर मनुष्य मानसिक तनाव, अवसाद और उपभोक्तावाद की तृष्णा में जल रहा है, जहाँ बुद्ध का 'अष्टांगिक मार्ग' शीतलता प्रदान कर सकता है। दूसरी ओर, समाज आज भी जातिगत भेदभाव, आर्थिक असमानता और सांप्रदायिकता की चपेट में है, जहाँ रविदास का 'बेगमपुरा' एक मार्गदर्शक सिद्धांत (Guiding Principle) बनकर उभरता है।

सच्ची मुक्ति खंडित नहीं हो सकती। मनुष्य तब तक वास्तव में मुक्त नहीं हो सकता जब तक उसके भीतर तृष्णा का वास है, और समाज तब तक मुक्त नहीं हो सकता जब तक उसमें भय और भेदभाव व्याप्त है।

निष्कर्ष

अंततः, बुद्ध और रविदास एक-दूसरे के पूरक हैं। बुद्ध कहते हैं कि अपने भीतर की बेड़ियाँ तोड़ो, ताकि तुम मुक्त होकर देख सको। रविदास कहते हैं कि समाज की बेड़ियाँ तोड़ो, ताकि हर मनुष्य अपनी गरिमा के साथ जी सके। जहाँ बुद्ध का 'निर्वाण' व्यक्ति को मानसिक शांति देता है, वहीं रविदास का 'बेगमपुरा' पूरी मानवता को एक सुरक्षित और न्यायपूर्ण घर देता है। इन दोनों महान दर्शनों के मेल से ही उस पूर्ण समाज का निर्माण संभव है, जिसका सपना सदियों से भारतीय मनीषा देखती आई है।

लेख- आचार्य भिक्खुनी विजया मैत्रेय
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