
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी ने एक बेहद रणनीतिक और बड़ी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। बहुजन समाज पार्टी के कमजोर पड़ते जनाधार को अपने पाले में लाने के लिए अखिलेश यादव अब 'यादव-मुस्लिम' (MY) पार्टी के पारंपरिक ठप्पे से पूरी तरह बाहर निकलने की तैयारी में हैं। इसके तहत सपा ने आगामी चुनावों में कम से कम 100 दलित और आदिवासी उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारने का एक बड़ा खाका तैयार किया है।
सपा की इस नई रणनीति का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि पार्टी अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित 84 सीटों और अनुसूचित जनजाति (ST) की 2 सीटों के अलावा, 14 सामान्य यानी अनारक्षित सीटों पर भी दलित चेहरों को टिकट देने जा रही है। इस तरह कुल मिलाकर 100 दलित-आदिवासी प्रत्याशी सपा के सिंबल पर चुनाव लड़ेंगे। इस पूरी कवायद का मुख्य उद्देश्य पार्टी के 'पीडीए' यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठबंधन के एजेंडे को जमीन पर और मजबूत करना है।
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवारों को उतारने का फैसला बेहद सोच-समझकर लिया गया है। इसके जरिए सपा दलित समुदाय के बीच यह संदेश देना चाहती है कि वह उन्हें सिर्फ आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं रखना चाहती, बल्कि सत्ता में बड़ी हिस्सेदारी देने के लिए तैयार है। रणनीति के तहत मुख्य रूप से उन सामान्य सीटों को चुना जा रहा है, जहां पार्टी पारंपरिक रूप से बहुत ज्यादा मजबूत स्थिति में नहीं रही है।
यह प्रयोग समाजवादी पार्टी के लिए बिल्कुल नया नहीं है। साल 2024 के लोकसभा चुनाव में भी सपा ने दो सामान्य सीटों पर दलित प्रत्याशी उतारे थे, जिसके नतीजे काफी सकारात्मक रहे। पार्टी ने फैजाबाद (अयोध्या) सीट से अवधेश प्रसाद को चुनाव मैदान में उतारा, जिन्होंने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। वहीं मेरठ सीट पर सुनीता वर्मा ने बीजेपी के अरुण गोविल को कड़ी टक्कर दी और वे महज 10,585 वोटों के बेहद मामूली अंतर से चुनाव हारीं।
इस नई सोशल इंजीनियरिंग के जरिए अखिलेश यादव पार्टी की पुरानी छवि को पूरी तरह बदलना चाहते हैं। 2024 के आम चुनाव में भी इसका स्पष्ट असर दिखा था, जब सपा ने अपने कुल 62 उम्मीदवारों में से केवल 5 यादव और 4 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारे थे। ये सभी 5 यादव प्रत्याशी अखिलेश यादव के परिवार से ही ताल्लुक रखते थे। खास बात यह रही कि ये सभी 9 उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहे, जबकि इनके अलावा अवधेश प्रसाद समेत 7 अन्य दलित प्रत्याशी भी संसद पहुंचने में कामयाब रहे।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में फिलहाल दलित वोटों को हासिल करने की होड़ मची हुई है, क्योंकि 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में करीब 21 प्रतिशत आबादी दलितों की है। मायावती की अगुवाई वाली बसपा का कोर वोट बैंक लगातार खिसक रहा है। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में बसपा महज एक सीट पर सिमट गई थी और उसका वोट शेयर 2017 के 22.23 प्रतिशत से घटकर 12.88 प्रतिशत रह गया था। गिरावट का यह सिलसिला 2024 के लोकसभा चुनाव में भी जारी रहा, जहां बसपा का खाता भी नहीं खुला और उसका वोट शेयर गिरकर केवल 9.4 प्रतिशत रह गया, जो 2019 में 19.43 प्रतिशत था।
बसपा के कमजोर होने से पैदा हुए इस सियासी खालीपन को भरने के लिए सपा और कांग्रेस के साथ-साथ बीजेपी भी पूरी ताकत लगा रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली सरकार ने हाल ही में जो कैबिनेट विस्तार किया था, उसमें भी गैर-यादव ओबीसी और दलित समुदायों को तरजीह देकर एक सधा हुआ राजनीतिक संतुलन बनाने की कोशिश की गई थी ताकि इस बड़े वर्ग को साधा जा सके।
हालांकि, सपा नेता इस बात को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं कि सूबे का दलित समुदाय आगामी विधानसभा चुनाव में उनके और इंडिया (INDIA) गठबंधन के साथ मजबूती से खड़ा होगा। 2024 के लोकसभा चुनाव में इसी पीडीए फॉर्मूले ने गठबंधन को राज्य की 80 में से 43 सीटों पर बंपर जीत दिलाई थी।
अखिलेश यादव ने अपनी पार्टी के यादव और मुस्लिम नेताओं को स्पष्ट कर दिया है कि वे टिकट वितरण में इसी फॉर्मूले पर टिके रहेंगे, और सरकार बनने के बाद इन समुदायों के बड़े नेताओं को विधान परिषद (एमएलसी) के रास्ते समायोजित किया जाएगा।
सपा के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन का मानना है कि उत्तर प्रदेश की जनता अब यह समझ चुकी है कि बसपा परोक्ष रूप से बीजेपी की ही मदद कर रही है। उनका कहना है कि आज के दौर में कोई भी दल घर बैठकर वोटों की उम्मीद नहीं कर सकता, जैसा कि बसपा कर रही है। दलित समाज बीजेपी और आरएसएस की विचारधारा को अच्छी तरह समझ चुका है, और उनका भाजपा विरोधी वोट इस बार सीधे तौर पर समाजवादी पार्टी को मिलने जा रहा है।
यही वजह है कि अखिलेश यादव ने अब सीधे तौर पर मायावती और उनकी पार्टी पर हमला बोलना शुरू कर दिया है, जिससे वे पहले आम तौर पर बचते नजर आते थे। हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से उन्होंने दलितों से अपील करते हुए कहा था कि बसपा को वोट देने का सीधा मतलब अपना वोट बर्बाद करना है, क्योंकि वह चाहे सीधे तौर पर हो या पिछले दरवाजे से, बीजेपी के साथ ही खड़ी नजर आती है। अखिलेश का यह आक्रामक रुख साफ करता है कि वे दलित वोट बैंक को लेकर इस बार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते।
दूसरी तरफ, सपा की सहयोगी कांग्रेस भी अपने 'संविधान बचाओ' अभियान की सफलता को लेकर उत्साहित है और उसे उम्मीद है कि 2027 में भी यह नैरेटिव असरदार रहेगा। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल ही में अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के नायक 'वीरा पासी' की प्रतिमा का अनावरण किया था, जो दलितों को जोड़ने की उनकी रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस का दावा है कि राहुल गांधी के लगातार प्रयासों के कारण ही लोकसभा चुनाव में दलितों ने इंडिया गठबंधन के पक्ष में बढ़-चढ़कर मतदान किया था।
मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए यह साफ है कि आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का गठबंधन एकजुट होकर लड़ेगा। ऐसे में अगर राज्य का दलित वोट बैंक बड़े पैमाने पर इस गठबंधन की तरफ मुड़ता है, तो यह उत्तर प्रदेश की सत्ता के समीकरणों को पूरी तरह से बदलने वाला सबसे बड़ा और निर्णायक कारक साबित हो सकता है।
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