
नई दिल्ली: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक और दलित आइकन कांशीराम को मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यह सर्वोच्च सम्मान राष्ट्र के निर्माण में उनके असीम योगदान की एक सच्ची पहचान होगी।
कांशीराम की जयंती के अवसर पर रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखते हुए राहुल गांधी ने अपनी यह मांग रखी। उन्होंने लिखा कि बहुजन नायक ने गरीबों और शोषितों के बीच राजनीतिक जागरूकता बढ़ाकर भारतीय राजनीति की पूरी दिशा ही बदल दी थी।
अपने पत्र में कांग्रेस नेता ने लिखा कि आज जब हम कांशीराम जी की जयंती मना रहे हैं और उनके योगदान को याद कर रहे हैं, तो मैं एक विशेष अनुरोध के साथ यह पत्र लिख रहा हूं कि उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न दिया जाए।
प्रधानमंत्री को लिखा गया यह पत्र लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम के ठीक दो दिन बाद सामने आया है। दरअसल, शुक्रवार को राहुल गांधी की मौजूदगी में ही बहुजन नेता को यह सम्मान दिलाने की मांग वाला एक प्रस्ताव पारित किया गया था।
गांधी ने प्रधानमंत्री को बताया कि कांशीराम ने अपने आंदोलनों के जरिए बहुजनों और गरीब तबके को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। उन्होंने आम लोगों को यह अहसास दिलाया कि उनका वोट और उनकी आवाज बहुत मायने रखती है और इस देश पर सभी का समान अधिकार है।
पत्र के अनुसार, कांशीराम के इन्हीं अथक प्रयासों के कारण ऐसे कई लोग सार्वजनिक जीवन में आए, जिन्होंने कभी राजनीति में आने का सोचा भी नहीं था। उन्होंने राजनीति को न्याय और समानता हासिल करने का एक मजबूत माध्यम बना दिया।
राहुल गांधी ने इस बात का भी जिक्र किया कि भारतीय संविधान हर नागरिक को समानता, सम्मान और भागीदारी का वादा करता है। कांशीराम ने अपना पूरा जीवन समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के लिए इन आदर्शों को सार्थक बनाने में समर्पित कर दिया।
कांग्रेस नेता ने आगे लिखा कि ऐसा करके उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की नींव को मजबूत किया और हमारी राजनीतिक व्यवस्था को अधिक समावेशी और न्यायपूर्ण बनाया। उन्होंने बताया कि दलित बुद्धिजीवी, नेता और सामाजिक कार्यकर्ता पिछले कई वर्षों से कांशीराम को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने की मांग करते आ रहे हैं।
शुक्रवार को लखनऊ के 'संविधान सम्मेलन' में बोलते हुए राहुल गांधी ने यहां तक कहा था कि अगर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू जीवित होते, तो वे कांशीराम को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री जरूर बनाते।
उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे अपने पत्र में बताया कि लखनऊ के उस कार्यक्रम में मौजूद सभी नेताओं और लोगों ने इस मांग को पूरी मजबूती से दोहराया है, जो एक व्यापक जनभावना को दर्शाता है।
गांधी ने उम्मीद जताई कि सरकार इस अनुरोध पर गंभीरता से विचार करेगी। उन्होंने लिखा कि यह सम्मान उन लाखों लोगों की आकांक्षाओं का भी सम्मान होगा जो आज भी कांशीराम को सशक्तिकरण और उम्मीद का सबसे बड़ा प्रतीक मानते हैं।
इस पूरी कवायद के पीछे एक बड़ा सियासी संदेश भी छिपा है। हाल के दिनों में कांशीराम की जयंती के आसपास कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के चंद्रशेखर आजाद समेत कई दलों ने उनकी विरासत को अपनाने की कोशिश की है। इन सभी दलों की नज़र उत्तर भारत की उस दलित राजनीति पर है जिसे कांशीराम ने नया आकार दिया था।
अगले साल उत्तर प्रदेश और पंजाब में चुनाव होने हैं और इन दोनों राज्यों में कांशीराम के अनुयायियों की एक बहुत बड़ी संख्या मौजूद है। कांग्रेस नेताओं का मानना है कि पार्टी की यह कवायद अपने उसी पुराने दलित वोट बैंक से फिर से जुड़ने का एक व्यापक प्रयास है, जो कभी बसपा के उभार से पहले कांग्रेस के पास हुआ करता था।
उत्तर प्रदेश में दलित समुदाय तक पहुंचने का यह बढ़ा हुआ प्रयास 2027 के चुनावों से पहले समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस की सौदेबाजी की ताकत को बढ़ाने की भी एक कोशिश है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी के हाशिए पर जाने के बाद कांग्रेस को एक बड़ा मौका नजर आ रहा है। राज्य के कुल मतदाताओं में दलितों की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत है।
पार्टी की यह रणनीति राहुल गांधी के उस देशव्यापी अभियान के भी अनुरूप है, जिसके तहत वे दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं तक पहुंचने का लगातार प्रयास कर रहे हैं। वे देशव्यापी जातिगत जनगणना की भी जोरदार वकालत कर रहे हैं।
जातिगत जनगणना की यह मांग सीधे तौर पर कांशीराम के उस राजनीतिक दर्शन से जुड़ती है, जिसका मूल नारा था - 'जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी'।
इससे पहले 2024 के लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस ने 'संविधान पर खतरे' का नैरेटिव सेट किया था। इस मुद्दे ने उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में दलित समुदाय के वोट हासिल करने में पार्टी की काफी मदद की थी।
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