MP बीना विधायक दल-बदल विवाद: HC की सुनवाई में बोली निर्मला सप्रे- "में कांग्रेस की MLA", कोर्ट ने पार्टी छोड़ने के ठोस प्रमाण मांगे

कोर्ट ने कहा- सिर्फ सोशल मीडिया पोस्ट से तय नहीं होगी सदस्यता, ठोस प्रमाण जरूरी
MP बीना विधायक दल-बदल विवाद: HC की सुनवाई में बोली निर्मला सप्रे- "में कांग्रेस की MLA", कोर्ट ने पार्टी छोड़ने के ठोस प्रमाण मांगे
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भोपाल। मध्यप्रदेश के सागर जिले की बीना विधानसभा अनुसूचित जाति आरक्षित सीट से विधायक के खिलाफ दायर दल-बदल याचिका पर मंगलवार को में अहम सुनवाई हुई। मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति की डिवीजन बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। सुनवाई के दौरान सप्रे की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि वे अभी भी कांग्रेस पार्टी में ही हैं, जिसे कोर्ट ने रिकॉर्ड में दर्ज कर लिया। वहीं, याचिकाकर्ता और नेता प्रतिपक्ष को अदालत ने निर्देश दिए कि वे सप्रे के भाजपा में शामिल होने के ठोस और प्रमाणिक साक्ष्य पेश करें।

9 अप्रैल तक सबूत पेश करने का समय, अगली सुनवाई 20 अप्रैल को

सुनवाई के दौरान उमंग सिंघार की ओर से पेश अधिवक्ता विभोर खंडेलवाल ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कोर्ट को बताया कि वे 9 अप्रैल तक पार्टी व्हिप से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करेंगे। इस पर कोर्ट ने उन्हें समय देते हुए अगली सुनवाई की तारीख 20 अप्रैल तय की है। उल्लेखनीय है कि इसी दिन विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष भी इस मामले की सुनवाई प्रस्तावित है। इससे यह मामला न्यायपालिका और विधानसभा, दोनों स्तरों पर समानांतर रूप से विचाराधीन बना हुआ है।

सप्रे का दावा- मैं अब भी कांग्रेस में हूं, सदस्यता खत्म करने का सवाल नहीं

सप्रे की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय अग्रवाल ने कोर्ट में दलील दी कि उनकी मुवक्किल ने कांग्रेस पार्टी नहीं छोड़ी है, इसलिए उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त करने का कोई आधार ही नहीं बनता। उन्होंने कहा कि केवल राजनीतिक गतिविधियों में उपस्थिति या मंच साझा करना दल-बदल का प्रमाण नहीं हो सकता। इस दलील को कोर्ट ने गंभीरता से लेते हुए रिकॉर्ड में शामिल किया।

सरकार का पक्ष- स्पीकर के समक्ष प्रक्रिया जारी

राज्य शासन की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने अदालत को अवगत कराया कि विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष इस पूरे मामले की सुनवाई जारी है और संबंधित पक्षों के बयान भी दर्ज किए जा चुके हैं। इसका मतलब है कि संवैधानिक प्रक्रिया अपने स्तर पर चल रही है और अंतिम निर्णय स्पीकर के अधिकार क्षेत्र में भी आता है।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी- सोशल मीडिया पोस्ट पर्याप्त साक्ष्य नहीं

सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता की ओर से यह कहा गया कि विधायक सप्रे के भाजपा में शामिल होने के प्रमाण सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं, जैसे मुख्यमंत्री के साथ उनकी तस्वीरें और पोस्ट तो कोर्ट ने इस पर स्पष्ट टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि केवल सोशल मीडिया पोस्ट या तस्वीरों के आधार पर किसी जनप्रतिनिधि की राजनीतिक स्थिति तय नहीं की जा सकती। कोर्ट ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता ठोस, प्रमाणिक और कानूनी रूप से मान्य साक्ष्य प्रस्तुत करें, जिससे यह सिद्ध हो सके कि वास्तव में दल-बदल हुआ है।

क्या है पूरा मामला?

पूरा विवाद 2023 के विधानसभा चुनाव से शुरू होता है, जब निर्मला सप्रे ने कांग्रेस के टिकट पर बीना सीट से चुनाव लड़ा और भाजपा प्रत्याशी महेश राय को 6,155 वोटों से हराया। इसके बाद 5 मई 2024 को राहतगढ़ में आयोजित एक कार्यक्रम में वे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ मंच साझा करती नजर आईं। इसके अगले दिन 6 मई को उनके भाजपा में शामिल होने के दावे सामने आए, जिससे राजनीतिक हलचल तेज हो गई।

इसी क्रम में 5 जुलाई 2024 को नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के समक्ष याचिका दायर कर सप्रे की सदस्यता समाप्त करने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि संविधान की के तहत यदि कोई विधायक स्वेच्छा से अपनी पार्टी छोड़ देता है, तो उसकी सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाती है। हालांकि, जब इस पर लंबे समय तक कोई निर्णय नहीं हुआ, तो सिंघार ने नवंबर 2024 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

दल-बदल कानून की कसौटी पर मामला

यह मामला सीधे तौर पर संविधान की दसवीं अनुसूची, यानी दल-बदल विरोधी कानून से जुड़ा है। इस कानून का उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों को पार्टी बदलने से रोकना और लोकतांत्रिक स्थिरता बनाए रखना है। लेकिन किसी भी विधायक की सदस्यता समाप्त करने के लिए यह साबित करना आवश्यक होता है कि उसने स्वेच्छा से पार्टी छोड़ी है या पार्टी के निर्देशों के खिलाफ जाकर काम किया है। ऐसे में यह केस इस बात की परीक्षा बन गया है कि क्या सार्वजनिक मंचों पर उपस्थिति और सोशल मीडिया गतिविधियां दल-बदल के प्रमाण मानी जा सकती हैं या नहीं।

20 अप्रैल को तय हो सकती है दिशा

अब इस पूरे मामले की नजर 20 अप्रैल पर टिकी है, जब हाईकोर्ट में अगली सुनवाई होगी और संभवतः याचिकाकर्ता की ओर से प्रस्तुत किए जाने वाले साक्ष्यों पर बहस होगी। साथ ही, उसी दिन विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष भी सुनवाई होने से यह मामला और निर्णायक मोड़ पर पहुंच सकता है। यदि ठोस साक्ष्य सामने आते हैं, तो सप्रे की सदस्यता पर बड़ा फैसला हो सकता है, वहीं साक्ष्यों की कमी होने पर याचिका कमजोर भी पड़ सकती है।

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