मध्य प्रदेश: दलित-आदिवासियों को प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाती भाजपा, जानिए क्या है कारण ?

राज्य में वर्ष 2000 के बाद नहीं बना आदिवासी अध्यक्ष, नौ महीने ही अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठ सके दलित नेता डॉ. जटिया.
सांकेतिक फोटो।
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भोपाल। 'सबका साथ, सबका विकास' का नारा देने वाली सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने पिछले 24 सालों से किसी दलित आदिवासी को मध्य प्रदेश का निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनाया। सूबा जिसे आदिवासी स्टेट भी कहाँ जाता है। यहां 21 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की है, वहीं आबादी में 16 प्रतिशत की भागीदारी दलित समुदाय की है। इसके बावजूद दोनों ही समुदायों को भाजपा निर्वाचित अध्यक्ष की कुर्सी इन सालों में नहीं मिल पाई। 

राजनीति में सभी वर्गों को भागीदारी देने का दावा करने वाली भाजपा ने इन 24 वर्षों में ब्राह्मण, ठाकुर और ओबीसी वर्ग के नेताओं को ही प्रदेश अध्यक्ष का पद सौंपा। भाजपा के इस ट्रेंड से साफ है कि पार्टी की गाइडलाइन में सामाजिक न्याय के कोई मायने नहीं है।

वर्ष 2005 में मई के महीने में शिवराज सिंह चौहान को बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष निर्वाचित किया गया था। शिवराज ने 29 नवंबर, 2005 को मध्‍य प्रदेश के मुख्‍यमंत्री की शपथ ली थी। 27 फररी 2006 से 21 नवंबर 2006 तक की अवधि में मनोनय कर दलित नेता डॉ. सत्यनारायण जटिया को अध्यक्ष बनाया था। जटिया को अधिकृत रूप से निर्वाचित नहीं किया गया, इसलिए उन्हें यह पद सालभर के भीतर ही छोड़ना पड़ा था। 

20 नवंबर 2006 में नरेंद्र सिंह तोमर को मध्य प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष चुना गया। तोमर ठाकुर जाति के हैं। इसके बाद साल 2010 से 2014 तक प्रभात झा को निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया। पुनः वर्ष 2014 से 2016 तक नरेंद्र सिंह तोमर अध्यक्ष रहे। 

16 अगस्त 2016 को नंदकुमार सिंह चौहान प्रदेश के अध्यक्ष निर्वाचित हुए थे, जिनका कार्यकाल दो वर्ष का रहा और 2018 में राकेश सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। साल 2020 में पार्टी ने वीडी शर्मा को अध्यक्ष बनाया जो वर्तमान में भी अध्यक्ष पद पर बने हुए है, हालांकि शर्मा का कार्यकाल 2023 में ही समाप्त हो चुका है। 

आदिवासी अध्यक्ष नहीं हुए निर्वाचित !

मध्य प्रदेश के 16 जिलों को अलग कर 1 नवम्बर 2000 को छतीसगढ़ राज्य का गठन हुआ था। साल 1997 से 2000 तक नंदकुमार साय विभाजन के पहले तक भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रहे। यह इकलौते आदिवासी नेता थे जिन्हें भाजपा ने निर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया था, इसके बाद कभी भी मध्य प्रदेश भाजपा में आदिवासी अध्यक्ष निर्वचित नहीं हुआ। इसके पहले भी कभी कोई आदिवासी अध्यक्ष नहीं बनाया गया। मध्य प्रदेश से छतीसगढ़ राज्य अलग होने के बाद 2000 में विक्रम वर्मा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया, जो 2002 तक अध्यक्ष बने रहे। विक्रम वर्मा ओबीसी वर्ग से आते हैं। 

1980 से पद पर सवर्णों का कब्जा

6 अप्रैल, 1980 को भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ था, बीजेपी के प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष पूर्व प्रधनमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी निर्वाचित हुए थे। वहीं मध्य प्रदेश में भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष सुंदरलाल पटवा को बनाया गया था, जिनका कार्यकाल 1990 तक रहा, इसके बाद वर्ष 1990 से 1994 लख्खीराम अग्रवाल वैश्य समाज से अध्यक्ष बने। वर्ष 1994 से 1997 लक्ष्मीनारायण पांडेय अध्यक्ष निर्वचित हुए। वर्ष 1997 से 2000 तक नंद कुमार साय अध्यक्ष रहे। इसी तरह विक्रम वर्मा, शिवराज सिंह चौहान, सत्यनारायण जटिया, नरेंद्र सिंह तोमर, प्रभात झा, नंदकुमार सिंह चौहान, राकेश सिंह सहित वर्तमान में वीडी शर्मा प्रदेश के अध्यक्ष रहे। 

इन 44 सालों में यदि देखा जाए तो सिर्फ एक आदिवासी नेता नंदकुमार साय प्रदेश के अध्यक्ष निर्वाचित हुए और एक दलित नेता सत्यनारायण जटिया नौ महीने के लिए मनोनीत अध्यक्ष बनाए गए इसके पहले या बाद में भाजपा ने प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पर दलित या आदिवासी को नहीं बैठाया। ज्यादातर अध्यक्ष सवर्ण वर्ग के ही रहे हैं।

जनसंघ में भी रहा यही हाल

21 अक्टूबर 1951 में जनसंघ की स्थापना दिल्ली में हुई थी। इसके तीन संस्थापक सदस्य डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, प्रो. बलराज मधोक और पंडित दीन दयाल उपाध्याय थे। जनसंघ एक हिंदू राष्ट्रवादी स्वयंसेवी संगठन , राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की राजनीतिक शाखा थी। 1951 में मध्य प्रदेश के पहले प्रदेश अध्यक्ष बद्रीलाल दुबे को बनाया गया था। इसके बाद 1956 से 1957 राजकिशोर शुक्ल प्रदेश अध्यक्ष निर्वचित हुए, वर्ष 1957 से 1966 तक किशोरीलाल गोयल, 1958 से 1964 गिरिराज कपूर, 1996 से 1967 एनके शेजवलकर, 1967 - 1968 तक वीरेंद्र कुमार सखलेचा, 1968 से 1963 रामहित गुप्ता, 1973 से 1974 बीबी पाटनकर और 1974 से आपातकाल तक बृजलाल वर्मा जनसंघ के अध्यक्ष रहे। 

आपातकाल के बाद वाम , मध्य और दक्षिणपंथी दलों ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विरोध किया और इसी में 1977 में जनसंघ का 5 हजार प्रतिनिधियों के साथ विलय हुआ और जनता पार्टी का गठन हुआ। जनसंघ 1951 से 1977 के बीच ही अस्तित्व में रही। जनता पार्टी के गठन के बाद मध्य प्रदेश के पहले अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे 1980 तक रहे, इसके बाद जनता पार्टी से अलग होकर 6 अप्रैल 1980 में संघ (आरएसएस) की विचारधारा रखने वाले नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गठन कर लिया। जनसंघ और जनता पार्टी ने भी मध्य प्रदेश में अध्यक्ष पद के लिए किसी आदिवासी या दलित नेता का निर्वाचन या मनोनय नहीं किया।

संगठनात्मक ढांचा

भारतीय जनता पार्टी का पूरा संगठन राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर तक तकरीबन सात भागों में बंटा है। राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय परिषद और राष्ट्रीय कार्यकारिणी, प्रदेश स्तर पर प्रदेश परिषद और प्रदेश कार्यकारिणी होती हैं। इसके बाद क्षेत्रीय समितियां, जिला समितियां, मंडल समितियां होती हैं। फिर ग्राम और शहरी केंद्र होते हैं और स्थानीय समितियों का भी गठन होता है। स्थानीय समिति पांच हजार से कम की जनसंख्या पर गठित होती है। 

भाजपा के संविधान और नियम की धारा 21 के मुताबिक कोई भी व्यक्ति तीन-तीन वर्ष के दो कार्यकाल तक ही अध्यक्ष रह सकता है। प्रत्येक कार्यकारिणी, परिषद, समिति और उसके पदाधिकारियों तथा सदस्यों के लिए भी तीन वर्ष की अवधि तय की गई है।

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