MP: दलित-आदिवासी आरक्षित सीटों पर 'आम' चेहरे, जानिए किसके पक्ष में जीत का समीकरण?

मध्य प्रदेश में चौथे चरण का प्रचार थमा, 13 मई को इंदौर, देवास, उज्जैन, खंडवा, खरगोन, मंदसौर, रतलाम, धार सीट पर होगा मतदान।
MP: दलित-आदिवासी आरक्षित सीटों पर 'आम' चेहरे, जानिए किसके पक्ष में जीत का समीकरण?
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भोपाल। मध्य प्रदेश में लोकसभा चुनाव के चौथे और अंतिम चरण में आठ सीटों पर प्रचार का शोर आज शनिवार शाम छह बजे थम चुका है। अब प्रत्याशी घर-घर जाकर संपर्क कर सकेंगे। 13 मई को प्रदेश की इंदौर, देवास, उज्जैन, खंडवा, खरगोन, मंदसौर, रतलाम, धार सीट पर सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक मतदान होगा। इन आठ सीटों में पांच सीट एससी/ एसटी के लिए आरक्षित हैं।

चुनाव आयोग ने मतदान की तैयारी पूरी कर ली है। चुनाव का प्रचार थमने के बाद प्रत्याशी घर-घर जाकर प्रचार कर सकेंगे। इन आठ सीटों में इंदौर को छोड़कर बाकी सीटों पर कांग्रेस और भाजपा में सीधी टक्कर है। इन सीटों के 74 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला मतदाता ईवीएम का बटन दबा कर करेंगे। आठ लोकसभा संसदीय क्षेत्रों में देवास, उज्जैन अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित हैं। और रतलाम, धार, खरगोन यह तीन सीट अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित है। द मूकनायक की विश्लेषण करती इस रिपोर्ट से समझिए क्या हैं इन सीटों के राजनीतिक समीकरण?

रतलाम में होगा त्रिकोणीय मुकाबला!

मध्य प्रदेश की रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित है। आदिवासी बहुल इस क्षेत्र पर आजादी के बाद के ज्यादातर वर्षों में कांग्रेस ने इस सीट पर राज किया, लेकिन अब भाजपा की जमीन भी यहां तैयार हो चुकी है। इस बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को अपने परंपरागत वोटबैंक पर भरोसा है, लेकिन भाजपा ने इस सीट से सांसद गुमान सिंह डामोर का टिकट काट कर 40 साल बाद भाजपा ने आलीराजपुर क्षेत्र से टिकट देकर क्षेत्रीय समीकरणों को साधने की कोशिश की है और महिला उम्मीदवार अनीता नागर को टिकट देने का प्रयोग भी किया है, लेकिन भारत आदिवासी पार्टी और जयस का संयुक्त उम्मीदवार चुनावी मैदान में होने से यहां मुकाबला त्रिकोणीय है।

कांग्रेस ने पूर्व की तरह इस सीट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया को प्रत्याशी बनाया है। भूरिया मध्य प्रदेश आदिवासी राजनीति में बड़े फेस है। विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने दावेदारी नहीं की और बेटे को चुनाव लड़ाया। तभी से माना जा रहा था कि लोकसभा सीट पर कांग्रेस कांतिलाल भूरिया को उतारेगी। भूरिया को झाबुआ व आस-पास के क्षेत्रों और भील समाज के वोटबैंक पर भरोसा है। यहां से कांग्रेस को हमेशा ज्यादा वोट मिले है।

भाजपा से आलीराजपुर क्षेत्र की अनिता नागर सिंह चौहान मैदान में हैं। उनके पति नागर सिंह चौहान वर्तमान में डॉ. मोहन सरकार में वन मंत्री है। नागर सिंह की क्षेत्र में पकड़ को देखते हुए ही अनिता को भाजपा ने प्रत्याशी बनाया है।

रतलाम शहर और ग्रामीण विधानसभा सीट से भाजपा ने विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कराई है। वहां से लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को मदद की उम्मीद है। इस लोकसभा क्षेत्र में आठ विधानसभा सीटें आती है। उनमें से चार सीटें भाजपा के कब्जे में है,जबकि तीन सीट कांग्रेस के पास है। सैलाना सीट से भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) के कमलेश्वर डोडियार विधायक हैं। बीएपी और जयज़ कि ओर से बालुसिंह गामड़ चुनाव लड़ रहे हैं।

पलायन का मुद्दा खास

रतलाम सीट जिसमें अलीराजपुर, झाबुआ और रतलाम जिले की आठ सीटें शामिल हैं। इस क्षेत्र से वर्तमान में भाजपा के गुमान सिंह डामोर सांसद हैं। राज्य और केंद्र में भाजपा की सरकार होने के बावजूद भी इस क्षेत्र की गरीबी नहीं मिट सकी। यहां के लोग सालभर में लगभग आठ महीने सीमावर्ती राज्य गुजरात में मजदूरी करने के लिए पलायन करते है। पलायन करने वालों की संख्या हजारों में नहीं बल्कि लाखों में हैं। पश्चिमी मध्य प्रदेश के आदिवासी सर्वाधिक पिछड़े हैं। लगातार हो रहे पलायन और बेरोजगारी के मुद्दे से भाजपा को नुकसान हो सकता है।

त्रिकोणीय होगा मुकाबला!

रतलाम-झाबुआ संसदीय सीट प्रदेश की सबसे हॉट आदिवासी सीटों में से एक है, लेकिन इस बार यहां मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है। दरअसल, भारत आदिवासी पार्टी ने रतलाम झाबुआ लोकसभा सीट पर अपना उम्मीदवार मैदान में उतारा है। इस सीट से पेटलावद विधानसभा चुनाव में जयस समर्थित भारत आदिवासी पार्टी से उम्मीदवार रहे इंजीनियर बालुसिंह गामड़ मैदान में हैं।

रतलाम जिले की सैलाना विधानसभा सीट भारत आदिवासी पार्टी (बीएपी) के खाते में है। ऐसे में इस क्षेत्र में वर्चस्व रखने वाले जयस और बीएपी के प्रत्याशी के कारण त्रिकोणीय मुकाबला होगा। राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं, बीएपी के चुनाव लड़ने से खासकर भाजपा को नुकसान होने की ज्यादा संभावना दिख रही है।

झाबुआ के स्थानीय पत्रकार भूपेंद्र मंडोलियर द मूकनायक से बातचीत करते हुए बताते हैं कि इस बार लोकसभा क्षेत्र के मतदाता पूरी तरह से मौन हैं। जबकि पिछली बार यह माहौल भाजपा के पक्ष में खुलकर दिख रहा था। आदिवासियों के पलायन में कोई कमी नहीं आई, जबकि इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। इस चुनाव में पलायन का मुद्दा मुख्य है।

पिछले चुनाव में डामोर थे प्रत्याशी

पिछले लोकसभा चुनाव 2019 बीजेपी ने यहां से गुमान सिंह डामोर को टिकट दिया था। जबकि कांग्रेस ने पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया को प्रत्याशी बनाया था। गुमान सिंह डामोर को 696,103 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया को 6,05,467 वोट मिले थे। बीजेपी के डामोर ने भूरिया को 90,636 वोटों के भारी अंतर से हराया था।

सीट का इतिहास

17 लोकसभा चुनाव और एक उपचुनाव में चार बार ही रतलाम झाबुआ सीट से गैर कांग्रेसी उम्मीदवार जीते है। जनसंघ और भाजपा के लिए यह सीट हमेशा चुनौतीपूर्ण रही है। दिलीप सिंह भूरिया सबसे ज्यादा सात बार कांग्रेस के सांसद रहे। फिर वर्ष 2014 में दिलीप सिंह भूरिया भाजपा में आए और चुनाव जीते, लेकिन उनके निधन के कारण उपचुनाव हुआ और कांग्रेस ने उपचुनाव में जीत दर्ज कराई। 2019 में भाजपा के डामोर ने इस सीट से जीत हासिल की।

इस सीट पर अभी तक तीन बार महिला उम्मीदवार को राजनीतिक दलों ने टिकट दिया है। कांग्रेस ने 1962 में पहली बार महिला प्रत्याशी को मैदान में उतारा था। तब जमुनादेवी चुनाव जीती थी। तब यह सीट चर्चा में आई थी। इस सीट पर 1962 में टिकट बदलते हुए अमर सिंह के स्थान पर जमुना देवी को उम्मीदवार बनाया था। 2004 में दिलीप सिंह भूरिया के बजाए रेलम सिंह चौहान को टिकट दिया, लेकिन वे चुनाव नहीं जीत पाई। अब भाजपा ने फिर महिला को टिकट दिया है।

देवास सीट पर भाजपा-कांग्रेस में घमासान!

मध्य प्रदेश की देवास-शाजापुर लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है। इस सीट पर वर्तमान में भाजपा का कब्जा है। भाजपा ने यहां सांसद महेंद्र सिंह सोलंकी को एक बार फिर मौका दिया है, वहीं कांग्रेस की ओर से राजेंद्र मालवीय मैदान में हैं।

देवास-शाजापुर लोकसभा सीट पर इस बार मुकाबला रोचक होने वाला है। बीजेपी और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर की उम्मीद मानी जा रही है। दोनों ही प्रत्याशी जोरशोर से प्रचार में लगे रहे। प्रचार थमते ही अब 13 मई मतदान के दिन का इंतजार है। बता दें 2008 में संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन के कार्यान्वयन के एक भाग के रूप में देवास लोकसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया। परिसीमन के बाद शाजापुर निर्वाचन क्षेत्र का अस्तित्व समाप्त हो गया और देवास निर्वाचन क्षेत्र अस्तित्व में आया। यह सीट अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है और इसमें सीहोर, शाजापुर, आगर मालवा और देवास जिलों के कुछ हिस्से शामिल हैं।

संसदीय क्षेत्र का इतिहास

साल 1951 से 2014 तक हुए चुनावों में कई बार बीजेपी रिकॉर्ड वोटों से जीती। इस सीट से कांग्रेस 1951, 1957, 2009 समेत चार बार ही जीत सकी है। वर्ष 1971 से 2004 तक भाजपा ने लगातार 10 चुनाव जीते। जनसंघ व बीजेपी के फूलचंद्र वर्मा के नाम सबसे ज्यादा बार चुनाव जीतने का रिकॉर्ड रहा है। इन्होंने लगातार 5 बार जीत हासिल की, जबकि मौजूदा केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत 1996 से 2004 तक चार चुनाव इस सीट से जीते।

2009 में कांग्रेस के सज्जन सिंह वर्मा ने गहलोत को चुनाव हरा दिया। 2014 में बीजेपी ने फिर इस सीट पर कब्जा कर मनोहर ऊंटवाल ने ढाई लाख वोटों से जीत हासिल की थी। शाजापुर, देवास, सीहोर और आगर जिले की आठ सीटें देवास संसदीय क्षेत्र में शामिल हैं। इनमें शाजापुर जिले की शाजापुर, शुजालपुर व कालापीपल, देवास जिले की देवास, सोनकच्छ व हाटपिपल्या, आगर जिले की आगर और सीहोर जिले की आष्टा विधानसभा शामिल हैं।

लोकसभा चुनाव 2024 में जातिगत समीकरण को साधने के लिए कांग्रेस ने भी बलाई समाज के नेता मालवीय को मैदान में उतारा है। वहीं बीजेपी ने भी महेंद्र सिंह सोलंकी को दूसरी बार मौका देते हुए बलाई समाज को प्रतिनिधित्व दिया है। कांग्रेस नेताओं के मुताबिक दो बार राजेंद्र मालवीय विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं।

उन्हें सबसे पहले टिकट इंदौर जिले के सांवेर से विधानसभा का मिला था। इसके बाद दूसरी बार उज्जैन जिले की तराना सीट से राजेंद्र मालवीय ने विधानसभा का चुनाव लड़ा। दोनों ही चुनाव में राजेंद्र मालवीय को हार का सामना करना पड़ा। इस बार पार्टी ने उन पर बड़ा दांव खेला है।

यह है क्षेत्र के मुद्दे

देवास संसदीय क्षेत्र में रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य का मुद्दा गहराया हुआ है। द मूकनायक प्रतिनिधि से बातचीत करते हुए देवास के स्थानीय पत्रकार अमित बागलिकर ने बताया कि क्षेत्र में रोजगार और स्वास्थ्य का मुद्दा महत्वपूर्ण है। रोजगार के लिए लोगों को इंदौर जाना पड़ता है। अस्पतालों में भी सुविधाएं नहीं हैं। उच्च शिक्षा के लिए भी छात्र इंदौर और भोपाल जाते हैं। अमित ने कहा- "चुनाव रोमांचक होगा, दोनों ही प्रत्याशियों के बीच काटें की टक्कर है।"

कौन कब रहा सांसद?

देवास लोकसभा सीट से 1962 में जनसंघ के हुकम चंद कछवाई ने जीत हसिल की थी। हालांकि, उसके बाद ये सीट 1967-2008 तक शाजापुर के नाम से जानी जाती रही। परिसीमन के बाद साल 2009 में देवास सीट से कांग्रेस के सज्जन सिंह वर्मा चुनाव जीते। फिर 2014 में मनोहर ऊंटवाल, बीजेपी से सांसद बने, साल 2019 में भाजपा के महेंद्र सोलंकी निर्वचित हुए। यह सीट भाजपा का गढ़ मानी जाती रही है।

खरगोन में रेल का मुद्दा गहराया

मध्य प्रदेश की खरगोन लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित है। इस सीट पर विगत 15 वर्षों से लगातार भाजपा ही काबिज है। संसदीय क्षेत्र में कांग्रेस अपनी जीत के लिए लगातार ही प्रयासरत है, लेकिन उसे सफलता नहीं मिल पा रही है। वर्तमान सांसद गजेंद्र उमराव सिंह पटेल को ही लगातार दूसरी बार भाजपा ने टिकट देकर मैदान में उतारा है। वहीं कांग्रेस ने समाजसेवी और सेलटेक्स विभाग से वीआरएस लेकर राजनीति में उतरे पोरलाल खरते को प्रत्याशी बनाया है।

यह संसदीय क्षेत्र 1962 में अस्तित्व में आया। नर्मदा घाटी में बसे होने के कारण यह क्षेत्र प्राकृतिक रूप से खूब भरापूरा है। सतपुड़ा की पर्वत श्रेणियां और नर्मदा नदी से यह इलाका घिरा हुआ है। कुंदा और वेदा नदियां भी इसी क्षेत्र से बहती हैं। इस लोकसभा क्षेत्र में 8 विधानसभा सीट आती हैं, जिनमें खरगोन, कसरावद, भगवानपुरा, महेश्वर, बड़वानी, राजपुर, पानसेमल और सेंधवा विधानसभा शामिल है।

खरगोन लोकसभा सीट पर 16 आम चुनाव हो चुके हैं, जिनमें से पांच बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है, जबकि 8 बार बीजेपी को जीत मिली है, इसके अलावा 2 चुनाव भारतीय जनसंघ और 1 बार लोकदल ने जीता है।

निमाड़ के चार जिलों को दो भागों में बांटा जाता है। एक पूर्वी तो दूसरा पश्चिमी निमाड़। पूर्वी निमाड़ में खंडवा-बुरहानपुर लोकसभा सीट आती है तो पश्चिमी निमाड़ में खरगोन-बड़वानी लोकसभा सीट आती है। वर्ष 1952 से शुरू हुए खरगोन (तब नाम निमाड़) संसदीय क्षेत्र के चुनाव में शुरुआती दौर में कांग्रेस का कब्जा रहा, लेकिन 10 वर्ष बाद ही 1962 में जनसंघ ने कांग्रेस से यह सीट छीन ली।

खास मुद्दा

यहां फिलहाल लोकसभा चुनाव में केवल रेल लाइन का मुद्दा गरमाया हुआ है। क्योंकि निमाड़ के खरगोन जिले में सफेद सोना कपास की बंपर पैदावार होती है, जो देश-विदेश तक जाता है। ऐसे में रेल लाइन नहीं होने से व्यापार कमजोर है। इसी के साथ एशिया की दूसरे नंबर की मिर्ची मंडी भी खरगोन जिले में स्थापित है।

खरगोन निवासी मनोज सोनवाल ने बताया की रेल लाइन का नहीं होना आम जन का सबसे बड़ा मुद्दा है, इसके अलावा भी स्वास्थ्य, शिक्षा सड़क जैसे मुद्दे भी है। पिछले सालों में विकास तो हुआ है, लेकिन जैसा होना था वह स्थिति नहीं है।

महेश्वर के सतीश मालवीय ने बताया कि वर्तमान सांसद के खिलाफ जनता में नाराजगी है, पिछले 10 सालों से गजेंद्र उमराव सांसद हैं, लेकिन विकास नहीं हुआ हम पिछड़े हुए हैं। ग्रामीण इलाकों स्थिति ठीक नहीं हैं, कई गांवों में आज तक सड़क नहीं बन पाई। सतीश ने कहा- "सांसद निधि के विकास के नाम पर सिर्फ बस स्टॉप दिखाई देते हैं।"

वोटर्स का गणित

खरगोन लोकसभा सीट पर पहला चुनाव साल 1962 में हुआ। फिलहाल यह सीट अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार के लिए आरक्षित है। यहां पर हुए पहले चुनाव में जनसंघ के रामचंद्र बडे को जीत मिली थी। हालांकि अगले चुनाव में उनको हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस के एस बाजपेयी को जीत मिली। 1971 के चुनाव में रामचंद्र ने एक बार फिर वापसी की और कांग्रेस के अमलोकाचंद को मात दी।

बीजेपी को पहली बार इस सीट पर जीत 1989 में मिली और अगले 3 चुनावों में उसने यहां पर विजय हासिल की। कांग्रेस ने 1999 में यहां पर फिर वापसी की और ताराचंद पटेल यहां के सांसद बने। इसके अगले चुनाव 2004 में बीजेपी के कृष्ण मुरारी जीते। 2007 में यहां पर उपचुनाव और कांग्रेस ने वापसी की। 2009 में परिसीमन के बाद यह सीट अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार के लिए आरक्षित हो गई। और 2009 में मकन सिंह सोलंकी चुनाव जीते। इसके बाद 2014 में सुभाष पटेल सांसद बने। वर्तमान में गजेंद्र पटेल 2019 का चुनाव जितने के बाद सांसद है।

उज्जैन में भाजपा मजबूत!

अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित उज्जैन लोकसभा सीट में उज्जैन पूरा जिला और कुछ हिस्सा रतलाम जिले का भी आता है। धार्मिक रूप से अति समृद्ध यह क्षेत्र शिप्रा नदी के किराने बसा हुआ है। यहां पर हर 12 साल में एक बार सिम्हस्थ का आयोजन भी होता है। यहां पर महाकाल लोक भी बनाया गया है जिसका उद्घाटन 11 अक्टूबर 2022 को किया गया था। उज्जैन शहर को कालीदास की नगरी के नाम से भी जाना जाता है।

उज्जैन लोकसभा सीट में आठ विधानसभाएं हैं जिनमें उज्जैन जिले की नागदा-काचरोड, महिदपुर, तराना, घटिया, उज्जैन नॉर्थ, उज्जैन साउथ, बड़नगर शामिल हैं, वहीं रातलाम जिले की आलोट सीट भी इस लोकसभा क्षेत्र में शामिल है। इन सभी विधानसभाओं में 2 पर कांग्रेस काबिज है वहीं बाकी 6 पर बीजेपी ने कब्जा जमाया हुआ है। 2019 के चुनाव की बात की जाए तो यहां पर बीजेपी की ओर से अनिल फिरोजिया ने कांग्रेस के बाबूलाल मालवीय को साढ़े तीन लाख से ज्यादा वोटो के अंतर से हराया था

उज्जैन में इस बार रोचक मुकाबला देखने को मिल सकता है। आपको बता दें कि बीजेपी ने फिर से मौजूदा सांसद अनिल फिरोजिया को टिकट दिया है, तो वहीं कांग्रेस ने यहां से पूर्व विधायक रहे महेश परमार को प्रत्याशी बनाया है। उज्जैन सीट पर लोकसभा का चुनाव चौथे चरण में 13 मई को होगा। अब देखना ये होगा कि इस चुनाव में कौन किसको कड़ी टक्कर देने वाला है।

साल 2018 में उज्जैन जिले की तराना विधानसभा सीट से अनिल फिरोजिया और महेश परमार आमने-सामने चुनाव लड़ चुके हैं। अनिल फिरोजिया को बीजेपी ने मैदान में उतारा था, जबकि महेश परमार को कांग्रेस ने टिकट दिया था। साल 2018 के विधानसभा चुनाव में महेश परमार ने अनिल फिरोजिया को 2 हजार वोटों से हराया था। इसके बाद बीजेपी ने अनिल फिरोजिया को लोकसभा का टिकट दे दिया। इस बार अनिल फिरोजिया सांसद बन गए। अब एक बार फिर दोनों ही प्रत्याशियों की लोकसभा चुनाव में आमने-सामने टक्कर है।

उज्जैन लोकसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है। इस सीट 14 लाख  98 हजार 473 मतदाता हैं। यहां की जातिगत समीकरणों की बात करें, तो यहां सामान्य वर्ग के मतदाता 24.6% हैं। वहीं, पिछड़े वर्ग के मतदाताओं की संख्या 18.6% है। इसके अलावा एससी/एसटी मतदाताओं की जनसंख्या 46.3% है। यहां अल्पसंख्यक समाज के मतदाताओं की संख्या मात्र 3.9% और अन्य 6.6% है।

उज्जैन लोकसभा क्षेत्र के पूराने आकड़ों पर नजर डाले तो यहां बीजेपी बेहतर स्थिति में रही है। इस सीट पर 1984 के बाद यहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही सीधा मुकाबला रहा है। साल 1984 और 2009 को छोड़कर कांग्रेस यहां कभी भी जीत नहीं पाई है। जबकि यहां 1984 से अब तक 8 बार बीजेपी के उम्मीदवार जीत हासिल कर चुके हैं।

धार में भोजशाला विवाद मुख्य मुद्दा

धार लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र मध्य प्रदेश का महत्‍वपूर्ण संसदीय क्षेत्र है। इस प्राचीन शहर को परमार राजा भोज ने बसाया था। बेरन पहाड़ियों से घिरे इस इस क्षेत्र को झीलों और हरे-भरे वृक्षों ने खूबसूरत बना रखा है। यहां अनेक हिन्दू और मुस्लिम स्मारक आज भी मौजूद हैं। एक जमाने में मालवा की राजधानी रहे इस क्षेत्र में धार किला और भोजशाला यहां के पर्यटन का प्रमुख केंद्र है।

इस बार के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने धार की सीट सावित्री ठाकुर को दिया है, वही कांग्रेस ने राधेश्याम मुवेल को टिकट दिया है। धार लोकसभा सीट प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण संसदीय क्षेत्र है। धार लोकसभा सीट का गठन 1951 में हुआ था। 2019 के लोकसभा चुनाव में यहां 1,731 मतदान केंद्र और 16,00,524 मतदाता थे। 2019 के लोकसभा चुनाव में, भाजपा के छतरसिंह दरबार ने कांग्रेस के गिरवाल दिनेश को 156029 मतों से हराया था। छतरसिंह दरबार वर्तमान में सांसद हैं। धार लोकसभा क्षेत्र में धार, कुक्षी, मनावर, सरदारपुर, गंधवानी, डही, बदनावर और राजगढ़ विधानसभा शामिल है।

इस लोकसभा क्षेत्र में प्रमुख जातियों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, यादव, कुर्मी, और आदिवासी शामिल हैं। अन्य जातियों में तेली, धानुक, और मुस्लिम भी शामिल हैं। क्षेत्र में गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, कानून व्यवस्था, भोजशाला विवाद इस चुनाव के प्रमुख मुद्दे है।

1962 में धार लोकसभा सीट अस्तित्व में आया। बीजेपी अध्यक्ष रहे कुशाभाऊ ठाकरे की जन्मस्थली धार में शुरुआत के तीन लोकसभा चुनाव में जनसंघ ने धार में जीत दर्ज की। 1980 से 1991 तक इस सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा। 1996 में भारतीय जनता पार्टी ने दोबारा इस सीट से जीत दर्ज की। फिर हर चुनाव में जनता अपना सांसद बदलती रही। इस सीट से कांग्रेस और बीजेपी के उम्मीदवार बारी-बारी जीतते रहे। विंध्याचल पहाड़ियों से घिरे धार में चुनावी मुद्दे संवेदनशील है। अभी धार में कोर्ट के आदेश पर भोजशाला का सर्वे भी हो रहा है। 2014 और 2019 में बीजेपी ने धार से जीत दर्ज की थी।

मध्य प्रदेश में आखरी चरण शेष

लोकसभा चुनाव मध्य प्रदेश में चार चरणों में है। 19 अप्रैल को सीधी, शहडोल, जबलपुर, मंडला बालाघाट, छिंदवाड़ा संसदीय क्षेत्रों पर वोटिंग हुई थी। 26 अप्रैल को टीकमगढ़, दमोह, खजुराहो, सतना, रीवा, होशंगाबाद, बैतूल में मतदान सम्पन्न हुआ, वहीं 7 मई को मुरैना, भिंड, ग्वालियर, गुना, सागर, विदिशा, भोपाल, राजगढ़ के मतदाताओं ने वोट किए। और आखिरी चरण 13 मई को देवास, उज्जैन, इन्दौर, मंदसौर, रतलाम, धार, खरगोन और खंडवा लोकसभा सीटों पर मतदान होगा।

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