
नई दिल्ली- सुप्रीम कोर्ट के एसआईआर यानि विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े फैसले पर राजनीतिक विश्लेषक और पॉलिटिकल स्ट्रैटेजिस्ट योगेंद्र यादव ने एक तीखी और भावुक प्रतिक्रिया दी है, जिसमें उन्होंने इस फैसले को भारतीय लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक मोड़ करार दिया है। यादव ने कहा कि यह फैसला सरकार और विशेष तौर पर बीजेपी को अपनी मर्जी से "क्यूरेटेड वोटर लिस्ट" (चुनिंदा मतदाता सूची) बनाने की छूट देता है। खुद 124 पेज का फैसला पूरा पढ़ने के बाद यादव ने साफ कहा कि वह इस नतीजे से हैरान नहीं हैं, लेकिन बेहद परेशान जरूर हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यह जजमेंट सिर्फ बिहार के लिए नहीं है, बल्कि आने वाले 50 सालों तक देश के लोकतंत्र का भविष्य तय करेगा। उन्होंने कहा, "यह वो जजमेंट है जो आने वाले 2 साल में नहीं, 5 साल में नहीं, बल्कि अगले 50 साल तक कोर्ट में साइट किया जाएगा और हमारे लोकतंत्र का भविष्य तय करेगा।"
योगेंद्र यादव ने अपनी बात की शुरुआत लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांत से की। उन्होंने कहा कि दुनिया भर के लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि मतदाता सरकार का चुनाव करते हैं, सरकार मतदाता का नहीं। लेकिन इस फैसले के बाद यह तस्वीर उलट जाएगी। उन्होंने आरोप लगाया कि अब बीजेपी को खुली छूट मिल गई है कि वह अपने तरीके से देश की मतदाता सूची बनाए। "अब सरकार तय करेगी कि चुनाव आयोग में कौन बैठेगा और सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से चुनाव आयोग को खुली छूट मिल गई है कि वह जैसे मर्जी चाहे वोटर लिस्ट बनाए," यादव ने कहा। उन्होंने इसे उस मुहावरे से जोड़ा जहां 'जो राजा कहे वही सही' की जगह अब 'जो इलेक्शन कमीशन कहे वही सही' हो गया है। उनके मुताबिक, चाहे चुनाव आयोग बने हुए कानून को माने, अपने मन से नया कानून बनाए, या सब नियमों को ताक पर रख दे, उसके पास विशेष ताकत है और कोर्ट ने उसे मंजूरी दे दी है।
यादव ने कानूनी पेचीदगियों को समझाते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसी पतली गली (क्लॉज 21/3) को हाथियों की बारात निकालने का रास्ता बना दिया है। यह प्रावधान मूल रूप से किसी एक कांस्टीट्यूएंसी या कुछ गांवों के लिए था, लेकिन कोर्ट ने शहरीकरण और प्रवासन जैसे सामान्य कारणों को 'विशेष परिस्थिति' मानकर पूरे देश में इसके इस्तेमाल की इजाजत दे दी। नागरिकता के सवाल पर यादव ने सबसे बड़ा विरोधाभास बताया।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच 'लाल बाबू हुसैन केस' में पहले ही साफ कह चुकी है कि नागरिकता तय करना चुनाव आयोग का काम नहीं है। लेकिन दो जजों की इस बेंच ने उसे साइड करते हुए कहा कि आयोग यह तो नहीं तय कर सकता कि कोई नागरिक है या नहीं, लेकिन 'नागरिक न होने' के आधार पर उसे वोटर लिस्ट से निकाल सकता है। यादव ने इसे बारीकियों का खेल बताते हुए कहा, "अगर आपको यह समझ नहीं आया तो मैं आपको दोष नहीं देता, इसी के लिए वकीलों को लाखों रुपए मिलते हैं।"
वोटर लिस्ट से नाम कटने के आंकड़ों पर यादव ने सुप्रीम कोर्ट के ही बयान पर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि अब तक 6 करोड़ नाम कट चुके हैं और 4 करोड़ और कटने वाले हैं, लेकिन कोर्ट ने अपने फैसले के पैरा 95 में कहा कि ऐसा नहीं लगता कि नाम कटना 'व्यापक' (वाइड स्प्रेड) है।
यादव ने तंज कसा, "हुजूर, कब व्यापक होगा? जब 60 करोड़ नाम कट जाएंगे तब?" उन्होंने यह भी बताया कि हर राज्य में जेंडर रेशियो गिरा है और महिलाओं के नाम ज्यादा कट रहे हैं, लेकिन जजमेंट में इस पर एक शब्द भी नहीं है। उन्होंने कोर्ट के उस दावे को भी खारिज कर दिया कि अब वोटर लिस्ट में 'कंप्लीटनेस' (पूर्णता) और 'एक्यूरेसी' (सटीकता) आ गई है। उन्होंने कहा कि एडल्ट पॉपुलेशन के मुकाबले वोटर्स का अनुपात 99 से घटकर 90 से नीचे आ गया है और तमिलनाडु के नाम बिहार की लिस्ट में मिल रहे हैं, फिर भी कोर्ट इसे सटीक बता रहा है।
अपनी सबसे कड़ी टिप्पणी में योगेंद्र यादव ने इस फैसले की तुलना इमरजेंसी के दौर के कुख्यात एडीएम जबलपुर केस से की। उन्होंने याद दिलाया कि उस केस में सुप्रीम कोर्ट ने सत्ता के सामने समर्पण कर दिया था और कहा था कि अगर सरकार किसी को गोली मार भी दे तो कोर्ट उस पर सवाल नहीं उठा सकता। यादव ने कहा, "एडीएम वाले केस में लोगों के प्राण लेने की इजाजत दे दी गई थी। आज जो बच्चा कानून की पढ़ाई करता है, जो भी वकील इस केस के बारे में पढ़ता है वो शर्मिंदा महसूस करता है, जज मानते हैं यह इतिहास में सबसे 'लो मोमेंट' था इन्डियन जुडीशियरी का। एडीएम् केस में लोगों के प्राण लेने की इजाज़त दी गई, एडीआर केस में लोकतंत्र के प्राण लेने की इजाज़त दे दी गई।"
उन्होंने कहा कि एडीएम जबलपुर केस को 42 साल बाद रिव्यू किया गया था और उस गलती को जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ के बेटे ने सुधारा था। उन्होंने उम्मीद जताई कि इतिहास खुद इस फैसले का जवाब देगा और सच की जीत होगी। अपनी बात के अंत में यादव ने कहा कि हर नागरिक का अधिकार है कि वह कोर्ट के जजमेंट की व्याख्या करे, उसके परिणामों को समझे और देश को उसके खतरों से आगाह करे। उन्होंने संविधान और न्यायपालिका में अपनी आस्था दोहराते हुए कहा, "इतिहास जानता है, एक कोर्ट का फैसला होता है, एक इतिहास का फैसला होता है। सच जीतेगा।"
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