नई दिल्ली: वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग को लेकर जनजातीय कार्य मंत्रालय के हालिया रुख पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। मंगलवार, 8 सितंबर को मुख्य विपक्षी दल ने केंद्र सरकार की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े किए।
कांग्रेस ने पूछा कि क्या मंत्रालय 'मोडानी' समूह और अन्य खनन कंपनियों के दबाव में काम कर रहा है। यहाँ 'मोडानी' से उनका सीधा इशारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अदाणी समूह की ओर था। दरअसल, मंत्रालय ने हाल ही में कहा था कि वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) में वन भूमि के डायवर्जन के लिए ग्राम सभा की सहमति लेने का कोई प्रावधान नहीं है।
कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने मंत्रालय के इस स्टैंड को बेहद चौंकाने वाला करार दिया। उन्होंने कहा कि यह कानून की गहरी नासमझी और मंत्रालय की वैधानिक जिम्मेदारी से भागने का सीधा प्रमाण है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार का यह नया रुख वन भूमि के डायवर्जन से जुड़ी पुरानी गाइडलाइंस और वर्तमान प्रक्रियाओं के बिल्कुल विपरीत है। रमेश ने कहा कि एफआरए को लागू करने के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय ही नोडल एजेंसी है, इसलिए अधिकारों की रक्षा करना उसी का जिम्मा है।
उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि अगर मंत्रालय अपनी ही जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ेगा, तो यह कानून और उन आदिवासी समुदायों के हितों के साथ एक भद्दा मजाक होगा, जिनकी सुरक्षा के लिए इसे बनाया गया था।
यह विवाद तब गहराया जब हाल ही में मीडिया में एक अहम रिपोर्ट सामने आई। इस रिपोर्ट के मुताबिक, जनजातीय कार्य मंत्रालय ने ऊर्जा मंत्रालय को बताया था कि 2006 के कानून में ग्राम सभा की सहमति लेने का कोई नियम नहीं है।
यह बात 31 अगस्त को दोनों मंत्रालयों के बीच हुई उस अहम बैठक के दौरान कही गई, जिसमें ग्राम सभा की सहमति को सरकारी प्रोजेक्ट्स में एक 'रुकावट' के तौर पर देखा जा रहा था।
जयराम रमेश ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि गैर-वानिकी उद्देश्यों के लिए वन भूमि के इस्तेमाल से पहले एफआरए के नियमों का पालन करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि खुद जनजातीय कार्य मंत्रालय और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय कई बार इस अनिवार्यता को दोहरा चुके हैं।
अपनी बात को साबित करने के लिए कांग्रेस नेता ने कई अहम दस्तावेजों का हवाला दिया। इनमें साल 2012 में राज्यों को भेजा गया जनजातीय मंत्रालय का पत्र और 2018 में पर्यावरण मंत्रालय के साथ हुआ संवाद शामिल है।
इसके अलावा, संसद में दिए गए जवाबों और सरकार के 'वन संरक्षण एवं संवर्धन नियम, 2023' का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि संबंधित ग्राम सभा से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) लेना हमेशा से एक अनिवार्य शर्त रही है।
यह सच है कि एफआरए में सीधे तौर पर ऐसे डायवर्जन के लिए ग्राम सभा की सहमति का जिक्र नहीं है, लेकिन केंद्र सरकार के नियम इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करते हैं। वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत बने नियमों के मुताबिक, किसी भी वन भूमि के आधिकारिक डायवर्जन से पहले एफआरए की सभी प्रक्रियाओं का पूरा होना जरूरी है।
इस प्रक्रिया के तहत संभावित दावेदारों की पहचान करना, उनके अधिकारों को मान्यता देना और फिर संबंधित ग्राम सभा से एनओसी प्राप्त करना अनिवार्य है। इसी पूरी प्रक्रिया को आम बोलचाल में 'ग्राम सभा की सहमति' कहा जाता है।
जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले की भी याद दिलाई। उन्होंने कहा कि एफआरए और 2013 के नियमगिरि फैसले को एक साथ पढ़ने पर यह साफ हो जाता है कि वन अधिकारों और संसाधनों से जुड़े फैसलों में ग्राम सभा की भूमिका सबसे अहम है।
अपनी बात खत्म करते हुए उन्होंने कहा कि ये सुरक्षा उपाय महज तकनीकी खानापूर्ति नहीं हैं। देश के आदिवासी और वनवासी समुदाय अपने 'जल, जंगल और जमीन' के अधिकारों की रक्षा के लिए एफआरए 2006 और ऐसे ही अन्य कानूनी संरक्षणों पर ही पूरी तरह निर्भर करते हैं।
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