नई दिल्ली: ईद 20 मार्च को होने वाली थी, लेकिन यह एक दिन टल गई। शर्जील इमाम के परिवार का कहना है कि उनके लिए इससे बड़ी खुशी की बात और कुछ नहीं हो सकती थी।
इसका सीधा मतलब यह था कि कड़े गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत जेल में बंद और अब अंतरिम जमानत पर बाहर शर्जील पूरे छह साल बाद त्योहार के लिए बिहार के जहानाबाद स्थित अपने पैतृक गांव काको आ सके। वह 20 मार्च की देर रात अपने छोटे भाई मुजम्मिल इमाम के साथ दिल्ली से घर पहुंचे।
जनवरी 2020 में गिरफ्तारी से पहले, 38 वर्षीय शर्जील के लिए ईद और बकरीद ही ऐसे दो मौके होते थे जब वह गांव जरूर आते थे। स्कूली शिक्षा के दौरान ही वह गांव से बाहर चले गए थे। अदालत ने 9 मार्च को उनकी बीमार मां और भाई मुजम्मिल की शादी के मद्देनजर उन्हें ग्यारह दिनों की अंतरिम मोहलत दी थी।
घर में हल्दी की रस्म की गहमागहमी के बीच मुजम्मिल मेहमानों और शर्जील से मिलने आ रहे रिश्तेदारों का खास ख्याल रख रहे हैं। जमानत की कड़ी शर्तों के अनुसार शर्जील को मीडिया से बात करने, सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करने या किसी भी तरह के सार्वजनिक बयान और राजनीतिक गतिविधियों से पूरी तरह दूर रहना है।
मुजम्मिल घर के निर्माण कार्य की देखरेख भी कर रहे हैं और सजावट वालों के फोन कॉल्स के साथ-साथ आखिरी समय के कामों के निर्देश भी दे रहे हैं। वहीं शर्जील लोगों की नजरों से दूर घर के एक अंदरूनी कमरे में ही अपना समय बिता रहे हैं।
शर्जील अपने भाई से करीब तीन साल बड़े हैं और उनकी गैरमौजूदगी में मुजम्मिल को बहुत जल्दी सारी जिम्मेदारियां संभालनी पड़ीं। यहां तक कि उन्हें अपनी शादी का पूरा इंतजाम भी अकेले ही देखना पड़ा। उनके पिता का 2014 में इंतकाल हो गया था और मां की तबीयत भी अक्सर खराब ही रहती है।
उनके एक चाचा बताते हैं कि पिता के निधन से पहले शर्जील काफी बेफिक्र स्वभाव के थे। लेकिन पिता के गुजर जाने के बाद उन्होंने बड़े बेटे की जिम्मेदारी उठाई और स्कॉलरशिप व फ्रीलांस काम के जरिए परिवार की मदद की, साथ ही मुजम्मिल की पढ़ाई का खर्च भी उठाया।
चाचा का कहना है कि 2020 में शर्जील के जेल जाने के बाद यह सारी जिम्मेदारी मुजम्मिल के कंधों पर आ गई। परिवार ने अदालत के लगातार चक्कर काटने के दौरान भारी आर्थिक तंगी का भी सामना किया। उनकी मां की हालत देखकर परिवार ने मुजम्मिल को शादी के लिए राजी किया, ताकि जब वह कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए बाहर रहें तो बहू घर को संभाल सके।
नोएडा के एक विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट-ग्रेजुएट मुजम्मिल ने कुछ समय तक एक ट्रेनी प्रोडक्शन असिस्टेंट के रूप में भी काम किया था। हालांकि, हाल के दिनों में वह राजनीति और सामाजिक मुद्दों को लेकर काफी सक्रिय रहे हैं।
काको गांव में मुस्लिम समुदाय अल्पसंख्यक है और कुल आबादी का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा है। इस गांव में शर्जील के परिवार को उनकी कड़ी मेहनत और अपनी किस्मत खुद बदलने के लिए जाना जाता है। उनके दादा एक छोटे व्यापारी हुआ करते थे।
उनके पिता अकबर इमाम अपने बच्चों को बेहतरीन शिक्षा देने के लिए दृढ़ संकल्पित थे। इसलिए पटना जाकर राजनीति में हाथ आजमाने के साथ ही उन्होंने शर्जील और मुजम्मिल दोनों का दाखिला प्रतिष्ठित सेंट जेवियर्स स्कूल में कराया। अकबर ने दो बार विधानसभा चुनाव भी लड़ा। परिवार के मुताबिक, चुनाव हारने के बावजूद राज्य के शीर्ष राजनीतिक नेता उनका बहुत सम्मान करते थे।
इन सबके बावजूद परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। मुजम्मिल याद करते हुए बताते हैं कि कई बार ऐसा भी हुआ जब स्कूल की फीस भरने के लिए उनके माता-पिता उन्हें ईद पर नए कपड़े तक नहीं दिला पाते थे।
उन दिनों की एक याद आज भी उनके जेहन में एकदम ताजा है। वह बताते हैं कि दोनों भाइयों को एक्शन ब्रांड के जूते बहुत पसंद थे, लेकिन उनके पिता हमेशा उन्हें सस्ते ब्रांड्स की ओर ले जाते और समझाते कि ये जूते ज्यादा मजबूत हैं।
मुजम्मिल के अनुसार शर्जील बचपन से ही पढ़ाई में बेहद होशियार थे। वह आठवीं कक्षा में ही बारहवीं के गणित के सवाल आसानी से हल कर लेते थे। सेंट जेवियर्स के बाद स्कूली शिक्षा पूरी करने वह दिल्ली चले गए। महंगी कोचिंग की फीस चुकाने के लिए उन्होंने एक सेंटर पर टेस्ट दिया और दूसरा स्थान हासिल कर 25,000 रुपये की फीस पर 5,000 रुपये की छूट प्राप्त की।
शर्जील ने पहले ही प्रयास में अपना आईआईटी एंट्रेंस पास कर लिया था। इसके बाद उन्होंने आईआईटी-बॉम्बे से कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग में पांच साल का इंटीग्रेटेड बीटेक-एमटेक प्रोग्राम पूरा किया।
एक रिश्तेदार का कहना है कि उनके पिता चाहते थे कि शर्जील भी अपने साथियों की तरह आईआईटी के बाद अमेरिका में कोई अच्छी सी नौकरी करें। लेकिन शर्जील की इच्छा अपने ही देश में लोगों के बीच रहकर काम करने की थी।
उन्होंने कुछ समय तक बहुराष्ट्रीय कंपनियों में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर काम किया, लेकिन जल्द ही उनकी दिलचस्पी दर्शनशास्त्र और इतिहास की ओर मुड़ गई। 2013 में उन्होंने सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज में दाखिला लिया और एमए व एमफिल करने के बाद 2017 में 1946 के बिहार दंगों पर अपनी पीएचडी शुरू की।
यह सब उस वक्त अचानक रुक गया जब नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान दिए गए भाषणों को लेकर जनवरी 2020 में शर्जील को गिरफ्तार कर लिया गया। देशद्रोह के आरोपों के अलावा, उन्हें फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश के मामले में भी मुख्य चेहरा बताया गया और उन पर यूएपीए के तहत मामला दर्ज किया गया।
मार्च 2026 तक शर्जील पर उन्हीं भाषणों को लेकर अलग-अलग राज्यों में कुल आठ एफआईआर दर्ज हैं। वह सात मामलों में जमानत हासिल कर चुके हैं, लेकिन दिल्ली दंगा साजिश मामले में यूएपीए के तहत अभी भी हिरासत में हैं। जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद इस महीने की शुरुआत में कड़कड़डूमा अदालत ने उन्हें मानवीय आधार पर अंतरिम जमानत दी।
उनके परिवार के एक सदस्य ने इस आरोप पर भी सवाल उठाया कि शर्जील को इसी तरह के आरोपों में गिरफ्तार किए गए उमर खालिद जैसे अन्य कार्यकर्ताओं द्वारा निर्देशित किया जा रहा था।
खालिद के बारे में बात करते हुए इस रिश्तेदार ने कहा कि शर्जील और वह बिल्कुल अलग विचारधारा वाले व्यक्ति हैं। उन्होंने आपस में कभी बात तक नहीं की है और उनके काम करने का तरीका भी पूरी तरह से अलग है, क्योंकि शर्जील का ध्यान मुख्य रूप से संवैधानिक अधिकारों पर केंद्रित है।
रिश्तेदार ने यह भी बताया कि शर्जील को लगता था कि सिस्टम की खामियों को उजागर करने वाले उनके बयानों की वजह से उन्हें कुछ महीनों या एक साल के लिए जेल जाना पड़ सकता है। लेकिन उन्हें बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि इस पूरे मामले को ही यूएपीए के तहत दर्ज कर लिया जाएगा।
हालांकि, उन्होंने तुरंत यह भी स्पष्ट किया कि उनके परिवार को देश की न्यायपालिका पर पूरा और अटूट भरोसा है।
तिहाड़ जेल के अंदर भी शर्जील ने अपना पीएचडी शोध जारी रखने की पूरी कोशिश की है। उनका सिद्धांत है कि भारत के विभाजन को मुसलमानों की मांग बताना पूरी तरह सच नहीं है, बल्कि वह तर्क देते हैं कि तत्कालीन परिस्थितियों में इसे थोपा गया था।
अदालत द्वारा लगाई गई पाबंदियों को देखते हुए परिवार शर्जील के बारे में ज्यादा बात करने से बचता है। लेकिन एक बात जो उन्हें मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है, वह यह है कि जेल की सजा भी शर्जील के खाने के शौक को खत्म नहीं कर पाई है।
उनके चाचा हंसते हुए बताते हैं कि बचपन में इसके उलट शर्जील को शाकाहारी खाना ज्यादा पसंद था, लेकिन बड़े होने पर उनका स्वाद बिल्कुल बदल गया। आज उनकी खास पसंद में कबाब, निहारी और तरह-तरह की मिठाइयां शामिल हैं। एक अन्य रिश्तेदार बताते हैं कि जेल में उन्हें अंडों के अलावा कुछ खास नहीं मिलता, इसलिए उनकी मां ने इस छोटी सी छुट्टी के लिए उनके पसंदीदा कबाब अच्छी खासी मात्रा में पहले से ही तैयार करके रखे थे।
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