चर्चों पर हमलों को लेकर आप ने पीएम मोदी को लिखा पत्र, कहा- 'दलगत राजनीति से ऊपर उठकर लें कड़ा एक्शन'

आप सांसद संजय सिंह ने प्रधानमंत्री से धर्मांतरण विरोधी कानूनों के दुरुपयोग पर रोक लगाने और ईसाई समुदाय पर हो रहे हमलों की निष्पक्ष जांच की मांग की है।
Sanjay Singh
आप सांसद संजय सिंह
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नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (आप) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा है। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में ईसाई समुदाय, उनके धार्मिक स्थलों और संस्थानों पर लगातार हो रहे हमलों का मुद्दा उठाया है। उन्होंने प्रधानमंत्री से दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस मामले में तुरंत ठोस कदम उठाने की मांग की है।

सांसद संजय सिंह ने शुक्रवार, 10 जुलाई 2026 को प्रधानमंत्री को भेजे गए इस पत्र में जबरन धर्मांतरण विरोधी कानूनों के दुरुपयोग का विशेष जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इन कानूनों की आड़ में निर्दोष पादरियों, प्रार्थना करने वाले श्रद्धालुओं और ईसाई समुदाय के आम लोगों को निशाना बनाया जा रहा है, जिसे तुरंत रोका जाना चाहिए।

उन्होंने देश के मुखिया से अपील की है कि वे इन घटनाओं की सार्वजनिक रूप से निंदा करें। इसके साथ ही उन्होंने दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और हरियाणा जैसे प्रभावित राज्यों में सामने आए मामलों की एक तय समय सीमा के भीतर स्वतंत्र जांच कराने के निर्देश देने की भी मांग रखी है।

संजय सिंह ने प्रधानमंत्री को उनके संवैधानिक दायित्वों की याद दिलाते हुए लिखा कि देश का शीर्ष पद किसी भी व्यक्ति से बिना किसी भेदभाव के सभी को समान सुरक्षा देने की मांग करता है। इस समय देश को सरकार से किसी भी तरह की चुप्पी नहीं, बल्कि हिंसा के खिलाफ एक कड़ा और स्पष्ट रुख चाहिए ताकि देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को अक्षुण्ण रखा जा सके।

अपने पत्र में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विभिन्न राज्यों से आ रही हिंसा और तोड़फोड़ की ये खबरें कोई सामान्य या छुटपुट घटनाएं नहीं हैं। उन्होंने दावा किया कि शांतिपूर्ण प्रार्थनाओं में बाधा डालना और झूठे आरोपों के सहारे भय का माहौल बनाना एक सोची-समझी और संगठित कोशिश का हिस्सा नजर आता है।

उन्होंने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि लगातार हो रही इन घटनाओं के कारण उपद्रवी तत्वों के हौसले बुलंद हो रहे हैं। कानून-व्यवस्था की आड़ में इन संवेदनशील मामलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे अल्पसंख्यकों के मन में असुरक्षा की भावना पैदा हो रही है।

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