
नई दिल्ली- ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) अमेंडमेंट बिल 2026 को लेकर देशभर में उठे विरोध के बीच सोशल जस्टिस एंड एम्पावरमेंट मंत्रालय ने शनिवार को नेशनल काउंसिल फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स (NCTP) के सदस्यों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई थी। लेकिन बैठक में केंद्रीय मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार की अनुपस्थिति और वरिष्ठ आर्थिक सलाहकार योगिता स्वरूप के कथित असंवेदनशील तथा अपमानजनक बयानों ने पूरे ट्रांसजेंडर समुदाय को झकझोर दिया है। समुदाय के प्रतिनिधियों ने योगिता स्वरूप के इस्तीफे की मांग करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास’ के विजन के खिलाफ इस व्यवहार की निंदा की है।
NCTP के सदस्यों के अनुसार सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के जॉइंट डायरेक्टर ने फोन कर बताया था कि मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार तुरंत दिल्ली में उनसे मिलना चाहते हैं और उनकी राय सुनना चाहते हैं। इस खबर से खुश होकर सदस्यों ने पूरे देश से टिकट बुक किए और दिल्ली पहुंच गए। दोपहर दो बजे डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर के कॉन्फ्रेंस हॉल में वे इंतजार कर रहे थे, लेकिन मंत्री कभी नहीं पहुंचे। उनकी जगह मंत्री की वरिष्ठ आर्थिक सलाहकार योगिता स्वरूप आईं। जब सदस्यों ने मंत्री के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया वे फैमिली इमरजेंसी का कारण नहीं आ पाएंगे। स्वरूप ने कहा, “हम आपकी राय नोट कर लेंगे।” सदस्यों ने बताया कि इस बात से उनका दिल टूट गया क्योंकि वे व्यक्तिगत रूप से मंत्री से मिलकर अपना मसौदा सौंपना चाहते थे।
बैठक के दौरान संशोधन विधेयक पर बिंदुवार चर्चा हुई। सबसे विवादास्पद मुद्दा स्व-प्रतिपादित लिंग पहचान (सेल्फ-परसीव्ड जेंडर आइडेंटिटी) का था। अधिकारी इस पर अड़े रहे और कहा कि नॉन-बाइनरी तथा जेंडर-फ्लुइड जैसी पहचानें भ्रम पैदा करती हैं। उन्होंने दावा किया कि इन “अन्य” पहचानों के कारण योजनाएं असली ट्रांसजेंडर लोगों तक नहीं पहुंच रही हैं और पढ़े-लिखे मुख्यधारा के लोग इसका फायदा उठा रहे हैं।
एनसीटीपी की दक्षिण क्षेत्रीय प्रतिनिधि कल्कि सुब्रमण्यम ने कहा, “मंत्री बहुत अच्छे और सहानुभूतिपूर्ण व्यक्ति हैं, लेकिन उनके सलाहकार और नीति बनाने वाले अधिकारी ट्रांसजेंडर व्यक्ति को समझ ही नहीं पा रहे हैं।” एक अन्य सदस्य अभिना अहेर ने बताया कि उन्होंने समझाया कि अगर परिभाषा संकरी की गई तो लोग भिक्षा मांगने और पारंपरिक समुदायों में धकेल दिए जाएंगे। उन्होंने ट्रांसमेन, ट्रांसमस्कुलिन तथा ट्रांसफेमिनिन व्यक्तियों को परिभाषा में शामिल करने की मांग की, लेकिन अधिकारियों ने पारंपरिक सांस्कृतिक श्रेणियों तक ही सीमित रखने का रुख दिखाया।
सदस्यों ने बताया कि विधेयक में ट्रांसमेन और ट्रांसवुमेन को स्पष्ट रूप से शामिल करने की संभावना सिर्फ 10-20 प्रतिशत है। हालांकि कुछ सांस्कृतिक और जनजातीय पहचानें जैसे तिरुनंगई, तिरुनंबी (तमिलनाडु), नुपी मान्बा, नुपा मान्बा (मणिपुर) को जोड़ा जा सकता है। रिजर्वेशन जैसे मुद्दों पर अधिकारियों ने बात करने से इनकार कर दिया।
सबसे शॉकिंग बात यौन अपराधों की सजा से जुड़ा था। एक सदस्य ने पूछा कि सिसजेंडर महिला के साथ बलात्कार पर अपराधी को मौत की सजा तक हो सकती है, लेकिन ट्रांस महिला के मामले में अधिकतम दो साल की सजा क्यों है? योगिता स्वरूप ने जवाब दिया, “ट्रांसजेंडर व्यक्ति की शारीरिक संरचना (एनाटॉमी) सिसजेंडर महिला से अलग होती है।” सदस्य ने कहा, “रैप सिर्फ यौनांग में घुसपैठ नहीं है, इसमें मारना-पीटना, यातना, खून बहाना और हत्या भी शामिल है।” लेकिन अधिकारी ने जवाब दिया कि सजा अलग ही रहेगी।
परिवारिक हिंसा पर भी अधिकारी की टिप्पणी चौंकाने वाली थी। जब सदस्यों ने पूछा कि घर से निकाले गए युवा ट्रांस बच्चों के लिए क्या सुरक्षा व्यवस्था है, तो स्वरूप ने ट्रांस समुदाय पर युवाओं को “लुभाने” और “ब्रेनवॉश” करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि माता-पिता को कभी सजा नहीं दी जा सकती, भले ही वे अपने बच्चों को पीटें। सदस्यों ने पूछा कि विधेयक क्यों बिना किसी परामर्श के लाया गया- न ईमेल, न फोन, न मैसेज। जवाब मिला, “हमें पता है कि विधेयक के साथ क्या करना है, परामर्श की जरूरत नहीं समझी।” बैठक को “अनौपचारिक” बताया गया और फोटो खींचने से मना किया गया।
कल्कि सुब्रमण्यम, अभिना अहेर, रवीना बरिहा और विद्या समेत NCTP के सदस्यों ने इस पूरे व्यवहार को ट्रांस एरेजर और अपमानजनक करार दिया। उन्होंने कहा कि यह प्रधानमंत्री मोदी के समावेशी भारत के सपने के खिलाफ है। सोशल मीडिया पर “Yes We Exist” अकाउंट और अन्य ट्रांस एक्टिविस्टों ने योगिता स्वरूप के इस्तीफे और सार्वजनिक माफी की मांग की है। समुदाय का कहना है कि बिना व्यापक परामर्श और संवेदनशीलता के यह विधेयक ट्रांसजेंडर लोगों को और पीछे धकेल देगा।
पूर्व केन्द्रीय मंत्री और सांसद रेणुका चौधरी ने इस घटना की निंदा करते हुए कहा, " भारत सरकार का ट्रांसजेंडर अधिकारों के प्रति दृष्टिकोण समझ और सहानुभूति की घोर कमी को उजागर करता है। एक ऐसा विधेयक जो आत्म-पहचान को कमजोर करता है, हितधारकों से सार्थक परामर्श किए बिना पारित किया गया है, और अब तो संवाद से भी इनकार किया जा रहा है! यह सुधार नहीं, बल्कि प्रतिगमन है। ऐसी सतही और घटिया सोच से लैंगिक अधिकारों को निर्धारित नहीं किया जा सकता।"
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