Explained: ट्रांस बिल 2026 के खिलाफ क्यों हो रहा है विरोध? वो सारी बातें जो आप जानना चाहते हैं

समुदाय का एकमत है कि यह बिल नालसा जजमेंट और मौलिक अधिकारों दोनों का उल्लंघन करता है। इसलिए उनकी मांग बिल को तुरंत वापस लेने और ट्रांस समुदाय से सही मायने में बातचीत करने की है।
प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में रविवार को ट्रांस बिल को लेकर हुई जन सुनवाई में समुदाय ने अपना विरोध जाहिर किया।
प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया में रविवार को ट्रांस बिल को लेकर हुई जन सुनवाई में समुदाय ने अपना विरोध जाहिर किया।
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नई दिल्ली- ट्रांसजेंडर समुदाय के कार्यकर्ता और समर्थक इन दिनों देशभर में ‘रिजेक्ट एंड रीपील द ट्रांस अमेंडमेंट बिल’ के नारे लगा रहे हैं। ट्रांस अमेंडमेंट बिल 2026 को लेकर उठे विरोध के प्रमुख कारण, समुदाय की मांग आदि को यहाँ डिटेल में बताया जा रहा है:

बिल के विरोध की मुख्य वजह यह है कि यह विधेयक ज्यादातर ट्रांसजेंडर लोगों को बाहर कर देता है और केवल कुछ विशिष्ट समूहों तक सीमित रह जाता है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि बिल ट्रांस मेन, ट्रांस वीमेन, नॉन-बाइनरी लोगों और ख्वाजा सरा जैसी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान वाले व्यक्तियों को पूरी तरह बाहर रखता है। यह बिल केवल हिजड़ा, किन्नर, अरावानी, जोगता, यूनुक और इंटरसेक्स लोगों को ही ट्रांसजेंडर की परिभाषा में शामिल करता है, जो नालसा जजमेंट के सेक्शन 129 (2) का सीधा उल्लंघन है। उस ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले में सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया गया था कि ट्रांसजेंडर लोगों की स्व-प्रतिपादित पहचान को कानूनी मान्यता दी जाए।

विरोध का दूसरा बड़ा कारण अपराधीकरण और डर का माहौल है। बिल उन कुछ ट्रांस लोगों को भी खतरे में डालता है जिन्हें वह शामिल करता है। कई ट्रांसजेंडर व्यक्ति जन्म परिवार की हिंसा से भागकर हिजड़ा, किन्नर या अन्य ट्रांस समुदायों में शरण लेते हैं। संशोधन के तहत अब जन्म परिवार वाले लोग दावा कर सकते हैं कि इन समुदायों ने उन्हें जबरन ट्रांस बनाया। इससे समर्थन देने वाले लोग भी डर के मारे पीछे हट जाएंगे और ट्रांस समुदायों पर मुकदमों का साया मंडराएगा।

इसके अलावा बिल शरीर और निजता पर सीधा हमला है। इसमें अस्पतालों को ट्रांसजेंडर लोगों की सर्जरी से जुड़ी सारी जानकारी सरकार को देने का प्रावधान है, जो निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। साथ ही ट्रांस पहचान के लिए मेडिकल अथॉरिटी द्वारा परीक्षण अनिवार्य कर दिया गया है, जो नालसा जजमेंट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित स्व-प्रतिपादित पहचान के सिद्धांत के खिलाफ है। कार्यकर्ता कहते हैं कि यह प्रक्रिया प्रशासनिक से चिकित्सकीय बना दी गई है।

समुदाय की मांग साफ है: बिल को पूरी तरह वापस लिया जाए और सरकार 2014 के नालसा जजमेंट के निर्देशों का पालन करे। अगर नया बिल लाना है तो वह सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुरूप हो, ट्रांस समुदाय से व्यापक परामर्श के बाद तैयार किया जाए और संसदीय स्थायी समिति को भेजा जाए।

सरकार के दावे और सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या

सरकार का दावा है कि मूल ट्रांस एक्ट कभी भी स्व-प्रतिपादित पहचान को शामिल करने के लिए नहीं था। लेकिन सच्चाई इसके ठीक उलट है। ट्रांस एक्ट में स्पष्ट परिभाषा दी गई है कि ट्रांसजेंडर वह व्यक्ति है जिसका जेंडर जन्म के समय दर्ज सेक्स से मेल नहीं खाता, चाहे मेडिकल स्थिति कुछ भी हो। नालसा जजमेंट के सेक्शन 129 (2) में भी केंद्र और राज्य सरकारों को ट्रांसजेंडर लोगों की स्व-चयनित जेंडर पहचान- मेल, फीमेल या थर्ड जेंडर को कानूनी मान्यता देने का आदेश दिया गया था।

सरकार ने यह भी कहा कि ट्रांसजेंडर की परिभाषा बहुत अस्पष्ट थी। कार्यकर्ता जवाब देते हैं कि परिभाषा अस्पष्ट नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि जेंडर पहचान का फैसला व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक स्थिति और स्व-प्रतिपादित पहचान से होना चाहिए, न कि किसी बायोलॉजिकल टेस्ट से। कोर्ट ने यह भी कहा था कि विभिन्न जेंडर पहचानों को शामिल न करना समाज की नैतिक विफलता है।

एक और सरकारी तर्क है कि मूल एक्ट मौजूदा कानूनों और प्रावधानों के साथ संगत नहीं था। लेकिन नालसा जजमेंट में स्पष्ट है कि जेंडर पहचान की मान्यता समानता और गरिमा के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। कोई भी पुराना कानून मौलिक अधिकारों के ऊपर नहीं हो सकता। भारतीय कानून में सामंजस्यपूर्ण निर्माण का सिद्धांत कहता है कि नया कानून पुराने कानून को ओवरराइड करेगा और सभी कानूनों को एक-दूसरे के अनुरूप बनाया जाना चाहिए। ट्रांस लोगों के नए अधिकारों को पुराने कानूनों के नाम पर नहीं छीना जा सकता।

सरकार का यह भी कहना है कि एक्ट का दुरुपयोग हो सकता है और लोग फर्जी तरीके से ट्रांस घोषित कर लाभ ले सकते हैं। लेकिन आंकड़े कुछ और कहते हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग चार लाख ट्रांसजेंडर लोग हैं। इनमें से केवल 37 हजार को ही ट्रांसजेंडर कार्ड मिल पाया है। आयुष्मान भारत बीमा का लाभ सिर्फ तीन हजार लोगों (0.75 प्रतिशत) तक पहुंचा है। पुनर्वास या कौशल प्रशिक्षण का लाभ 1,500 से भी कम लोगों को मिला है। यानी कुल ट्रांस आबादी का 10 प्रतिशत से भी कम हिस्सा लाभ ले पाया है। सरकार ने अभी तक दुरुपयोग का कोई ठोस उदाहरण नहीं दिया है। इसके अलावा फ्रॉड के लिए पहले से ही कानूनी प्रावधान मौजूद हैं।

नालसा जजमेंट के प्रमुख अंश इस बात की पुष्टि करते हैं। कोर्ट ने कहा था कि जेंडर पहचान व्यक्ति स्वयं तय करेगा। सेक्शन 74 में लिखा है: ‘Determination of gender to which a person belongs is to be decided by the person concerned।’ सेक्शन 75 में स्पष्ट किया गया कि बायोलॉजिकल टेस्ट नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक टेस्ट लागू होगा। सेक्शन 129 (5) में कहा गया कि सर्जरी के लिए आग्रह करना अनैतिक और अवैध है। जजमेंट की शुरुआत में ही कोर्ट ने कहा था कि समाज की विभिन्न जेंडर पहचानों को अपनाने में अनिच्छा एक नैतिक विफलता है, जिसे बदलना होगा।

प्रदर्शनकारी अब सरकार से कुछ सीधे सवाल भी पूछ रहे हैं: ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के राष्ट्रीय परिषद से परामर्श क्यों नहीं लिया गया? जो ट्रांसजेंडर व्यक्ति पहले ही मूल कानून के तहत अपना जेंडर बदल चुके हैं, उनका क्या होगा? कथित दुरुपयोग के सबूत कहां हैं और वैध लाभार्थियों को क्यों सजा दी जा रही है?

समुदाय का एकमत है कि यह बिल नालसा जजमेंट और मौलिक अधिकारों दोनों का उल्लंघन करता है। इसलिए उनकी मांग बिल को तुरंत वापस लेने और ट्रांस समुदाय से सही मायने में बातचीत करने की है। विरोध प्रदर्शन तेज होते जा रहे हैं और कार्यकर्ता चेतावनी दे रहे हैं कि अगर बिल पास हुआ तो ट्रांस लोगों की सुरक्षा, गरिमा और अधिकारों पर गहरा संकट आ जाएगा।

Summary

ट्रांसजेंडर समुदाय की मांग है कि ट्रांस संशोधन विधेयक वापस लें। किसी भी नए विधेयक के लिए सरकार को ट्रांस समुदाय से परामर्श करना होगा और उसे स्थायी समिति के पास भेजना होगा। कोई भी नया विधेयक सर्वोच्च न्यायालय के NALSA फैसले का उल्लंघन नहीं करना चाहिए।

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