नई दिल्ली: नोएडा में पिछले अप्रैल महीने में वेतन वृद्धि की मांग को लेकर हुए आंदोलन के मामले में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। गुरुवार को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में कई वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और प्रोफेसरों ने सरकार से एक अहम मांग की। उनका स्पष्ट कहना है कि कार्यकर्ताओं और मजदूरों को लगातार 'अवैध हिरासत' में रखने वाले अधिकारियों की जवाबदेही हर हाल में तय होनी चाहिए।
यह कड़ा रुख इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 2 सितंबर के उस महत्वपूर्ण फैसले के बाद देखने को मिला है, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय की 25 वर्षीय कानून की छात्रा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत को रद्द कर दिया गया था। आकृति को इसी मजदूर आंदोलन के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था।
इस विरोध प्रदर्शन को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा दर्ज मुकदमों में पूर्व पत्रकार सत्यम वर्मा सहित कम से कम 15 मजदूर और आठ कार्यकर्ता अब भी जेल में बंद हैं। सत्यम वर्मा के खिलाफ भी पुलिस ने एनएसए के कठोर प्रावधानों का इस्तेमाल किया है।
छात्रा की गिरफ्तारी के मामले में अदालत ने गौतम बुद्ध नगर की जिलाधिकारी मेधा रूपम के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की थी। डीएम ने ही आकृति चौधरी को हिरासत में लेने का आदेश जारी किया था। अदालत ने अपनी तल्ख टिप्पणी में कहा था कि जिलाधिकारी याचिकाकर्ता को एक 'उदाहरण' के तौर पर पेश करना चाहती थीं।
इस मामले से जुड़े अधिकारियों की जवाबदेही की मांग करते हुए वरिष्ठ पत्रकार जॉन दयाल ने बेबाकी से अपनी बात रखी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि चाहे कोई मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) या भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की बेटी ही क्यों न हो, सभी को उनके कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
जॉन दयाल ने कहा कि आकृति के मामले में अदालत का फैसला सीधे तौर पर गौतम बुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम की कार्यशैली पर सवाल उठाता है और यह देश भर के ज्यादातर अधिकारियों पर लागू होता है। उन्होंने स्वतंत्र भारद्वाज (जिन्हें जुलाई में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान एक छात्र के पिता पर कथित हमले के मामले में गिरफ्तार किया गया था) का उदाहरण दिया जो भाजपा नेताओं को अपना 'बड़ा भाई' बताते हुए अपने अपराधों पर शेखी बघारता है।
उन्होंने आगे कहा कि यूपी पुलिस भी ठीक इसी अहंकार के साथ काम करती है कि सरकार और प्रशासन उनके 'बड़े भाई' हैं। इस हालात को देखते हुए देश में पुलिस सुधारों की तत्काल आवश्यकता है।
वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखते हुए आकृति चौधरी की एनएसए के तहत हिरासत रद्द होने को देश में बह रही बदलाव की बयार का प्रतीक बताया। भूषण ने कहा कि देश के छात्र, युवा और कामकाजी लोग सड़कों पर उतरकर सरकार और प्रशासन से जवाबदेही मांग रहे हैं। इसी दबाव के कारण न्यायपालिका को भी लोगों के पक्ष में फैसले देने पड़ रहे हैं।
कैंपेन फॉर रिलीज ऑफ एक्टिविस्ट्स एंड वर्कर्स ऑफ नोएडा (कारवां) से जुड़े कार्यकर्ता केशव ने बताया कि उच्च न्यायालय ने हिरासत के आदेश में कई विसंगतियों को उजागर किया है। इतना ही नहीं, अदालत ने राज्य के पक्ष को एक पूरी तरह से 'मनगढ़ंत कहानी' करार दिया।
केशव ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह ने शुरुआत में दावा किया था कि उनके पास 'मास्टरमाइंड' को पकड़ने के लिए पुख्ता इलेक्ट्रॉनिक और वीडियोग्राफिक सबूत हैं। लेकिन पांच महीने बीत जाने के बाद भी पुलिस किसी भी कार्यकर्ता या मजदूर के खिलाफ कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर पाई है।
कार्यकर्ता ने जिलाधिकारी मेधा रूपम पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जिस दस्तावेज में डीएम ने एनएसए हिरासत को मंजूरी दी थी, उसी में उन्होंने लिखा था कि मजदूरों के आंदोलन से पूंजी निवेश प्रभावित हो सकता है और औद्योगिक क्षेत्र की छवि खराब हो सकती है। केशव ने सवाल किया कि क्या डीएम ऐसा करके नोएडा के उन उद्योगपतियों के प्रति अपनी वफादारी नहीं दिखा रही हैं, जिनके शोषण के कारण ही मजदूरों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा था।
केशव ने एक ऐसे वीडियो का भी जिक्र किया जिसमें कथित तौर पर यूपी पुलिस को एक हिरासत में ली गई कार्यकर्ता के घर में उसका फोन रखते हुए देखा जा सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस हिरासत के दौरान सृष्टि नाम की कार्यकर्ता को 'सबूत बरामद करने' के नाम पर उसके घर ले गई थी।
उन्होंने बताया कि कैमरे की फुटेज में पुलिस को सृष्टि का पहले से जब्त फोन और एक किताब घर में रखते हुए और उसे उठाने का आदेश देते हुए साफ देखा जा सकता है, ताकि इसे वीडियो में कैद किया जा सके। कैमरे देखकर उन्होंने अपना यह मिशन बीच में ही रोक दिया और उन कैमरों को तोड़ने की भी कोशिश की।
जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि सरकार यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि देश में आसमान छूती महंगाई और मजदूरों की बिगड़ती स्थिति के कारण यह विरोध प्रदर्शन हुआ। उन्होंने बताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य में हुई घटना के बाद भारत में एलपीजी सिलेंडर की कीमतें बढ़ गईं। 10,000 से 12,000 रुपये महीना कमाने वाले मजदूर महंगे गैस सिलेंडर खरीदने में असमर्थ हैं।
प्रोफेसर कुमार ने आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि भारत में लगभग 94 प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र में कार्यरत हैं, जिनकी स्थिति बेहद चिंताजनक है।
अदालत में कार्यकर्ताओं का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील माणिक गुप्ता ने पुलिस प्रक्रिया की खामियों को उजागर किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जब भी किसी की जमानत के लिए आवेदन किया जाता है, तो पुलिस तुरंत नई धाराएं और नई एफआईआर जोड़ देती है, या फिर एनएसए लगा दिया जाता है।
गुप्ता ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आरोपियों को हिरासत में प्रताड़ना देने के बाद जंजीरों में बांधकर अदालत लाया जाता है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि यूपी के मौजूदा शासन में यह सौभाग्य की बात है कि उन्हें किसी एनकाउंटर में नहीं मारा गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अदालत में एनएसए लगाने के सभी आधार निराधार साबित हुए हैं और पुलिस का कोई भी दावा सबूतों से मेल नहीं खाता है।
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