अदालतों ने बचाई नोएडा के मजदूरों की आजीविका: 53 दिन जेल में रहने के बाद 84% को मिली जमानत, पुलिसिया कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल

नोएडा में वेतन वृद्धि की मांग को लेकर गिरफ्तार 84% फैक्ट्री मजदूरों को कोर्ट से मिली जमानत। जानिए कैसे अदालतों ने बिना सबूत वाली पुलिसिया कार्रवाई पर उठाए गंभीर सवाल।
Noida workers protest
नोएडा में वेतन वृद्धि के लिए प्रदर्शन करने वाले 84% मजदूरों को कोर्ट से जमानत मिल गई है। 53 दिन जेल में रहने के बाद जानें कैसे अदालत ने यूपी पुलिस की कार्रवाई को कटघरे में खड़ा किया।
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उत्तर प्रदेश: जंतर-मंतर पर परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग को लेकर हुए हालिया विरोध प्रदर्शन का अंत केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के साथ हुआ। साथ ही, केंद्र और राज्य सरकारों ने यह भी आश्वासन दिया कि प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कोई मामला नहीं चलाएगी। इसके ठीक विपरीत, अप्रैल के महीने में वेतन वृद्धि की मांग को लेकर सड़क पर उतरे यूपी में नोएडा के फैक्ट्री मजदूरों को ऐसा कोई भी सरकारी दिलासा नहीं मिल सका।

पुलिस की सख्त कार्रवाई के तहत लगभग 200 लोगों को तुरंत हिरासत में ले लिया गया। इनमें से दो लोगों पर कड़ा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) भी लगा दिया गया, जिसमें बिना किसी मुकदमे के आरोपी को एक साल तक जेल में रखा जा सकता है।

अदालतों का रुख और पुलिस की खामियां

उत्तर प्रदेश सरकार ने 14 अप्रैल को मजदूरी में इजाफा जरूर कर दिया था, लेकिन जेल में बंद ज्यादातर प्रदर्शनकारियों को रिहाई के लिए अदालतों का ही दरवाजा खटखटाना पड़ा। इंडियन एक्सप्रेस द्वारा किये गए एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में गंभीर आरोपों वाले 106 ऐसे मामलों का विश्लेषण किया गया, जिनमें गिरफ्तार किए गए एक प्रदर्शनकारी ने औसतन 53 दिन हिरासत में बिताए। इन गिरफ्तारियों के परिणामस्वरूप सात अलग-अलग प्राथमिकियों (FIR) से जुड़े 222 जमानत आदेश सामने आए।

अदालती आंकड़ों के अनुसार, 188 या 84 प्रतिशत मामलों में अदालत ने आरोपियों को जमानत दे दी। न्यायधीशों ने अपने फैसलों में यह स्पष्ट पाया कि पुलिस ने किसी व्यक्ति विशेष के कृत्य को साबित करने के बजाय पूरी भीड़ को ही आरोपी मानकर कार्रवाई की थी। अदालतों ने कहा कि किसी भी प्रदर्शन में केवल उपस्थित होना जमानत से इनकार करने का पर्याप्त आधार नहीं है। इसके अलावा, अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन कर रहे आम मजदूरों की तुलना हिंसा भड़काने वाले साजिशकर्ताओं से बिल्कुल नहीं की जा सकती।

हालांकि, जिन मामलों में व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर भीड़ जुटाने, साजिश रचने और आगजनी में सीधे तौर पर शामिल होने के सबूत मिले, वहां अदालत ने जमानत याचिकाएं खारिज भी कीं। इस पूरे घटनाक्रम पर गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) की पुलिस कमिश्नर लक्ष्मी सिंह और जांच से जुड़े अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

अलग-अलग प्राथमिकियां (FIR) और अदालती फैसले

नोएडा फेज-3 थाने की एफआईआर संख्या 149/2026 के तहत सेक्टर 67 स्थित एमके इलेक्ट्रॉनिक्स में 13 अप्रैल को हुए हंगामे में 31 कर्मचारियों को जमानत मिल गई, जबकि 6 बाहरी लोगों की याचिका खारिज हो गई। इसी थाने की एफआईआर 151/2026 में 37 लोगों को जमानत दी गई, क्योंकि पुलिस अदालत में हिंसा का कोई भी स्पष्ट सीसीटीवी फुटेज पेश करने में पूरी तरह नाकाम रही।

नोएडा फेज-2 की एफआईआर 163/2026 में 10 से 11 अप्रैल के बीच पैरामाउंट एक्सपोर्ट्स, अनुभव अपैरल्स और रिचा ग्लोबल में हुए प्रदर्शन को लेकर 3 लोगों को जमानत मिली। वहीं, साजिश रचने के प्रथम दृष्टया आरोप में 10 लोगों को जेल में ही रहना पड़ा। इसी तरह, एफआईआर 165/2026 में 13 अप्रैल को सेक्टर 84 में हुए करीब 450-500 मजदूरों के बवाल के आरोप में 29 को राहत मिली, जबकि 6 लोगों को साजिशकर्ता मानकर जमानत नहीं दी गई। अदालत ने माना कि किसी भी वीडियो या फोटो में आरोपियों की मौके पर मौजूदगी साबित नहीं हो पाई थी।

एफआईआर 169/2026 (रिचा ग्लोबल मामला) में 26 लोगों को जमानत दी गई और केवल एक की खारिज हुई। इस मामले में अदालत ने पुलिस द्वारा 10 दिन की देरी से एफआईआर दर्ज करने पर भी कड़े सवाल उठाए। नोएडा फेज-1 की एफआईआर 172/2026 (ऑटो कंपोनेंट्स निर्माता मामला) में 21 को राहत मिली, जबकि 7 को नहीं।

अदालत ने एक बार फिर दोहराया कि केवल भीड़ का हिस्सा होना कोई अपराध नहीं है। अंततः, एफआईआर 164/2026 से जुड़ी 41 में से 39 याचिकाओं को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर स्वीकार कर लिया, जबकि 4 को नामंजूर कर दिया गया।

प्रदर्शन के मुख्य कारण और वेतन वृद्धि का फैसला

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में शामिल नोएडा में अप्रैल के इन प्रदर्शनों के पीछे तीन बड़े कारण थे। इनमें मध्य पूर्व के संकट के चलते रसोई गैस (LPG) के आसमान छूते दाम, नए लेबर कोड से जुड़ी व्हाट्सएप अफवाहें और हरियाणा के मानेसर में हुआ वेतन वृद्धि आंदोलन शामिल था। ठेके पर काम करने वाले मजदूर लंबे समय से 10-12 घंटे की शिफ्ट, पीएफ जैसी सामाजिक सुरक्षा के अभाव और कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे थे।

हरियाणा सरकार ने मानेसर आंदोलन के बाद 9 अप्रैल को न्यूनतम वेतन में 35 प्रतिशत का बड़ा इजाफा किया था। इसे 1 अप्रैल से पिछली तारीख से लागू करते हुए अकुशल श्रमिकों का वेतन 15,220.71 रुपये और अत्यधिक कुशल श्रमिकों का वेतन 19,425.85 रुपये कर दिया गया।

पड़ोसी राज्य के इस फैसले ने नोएडा के विरोध प्रदर्शनों में आग में घी का काम किया। हालात तब जाकर नियंत्रण में आए जब 14 अप्रैल को उत्तर प्रदेश सरकार ने गौतम बुद्ध नगर और गाजियाबाद के लिए अंतरिम वेतन वृद्धि की आधिकारिक घोषणा की। नए नियमों के तहत अकुशल श्रमिकों का वेतन 11,313 रुपये से बढ़ाकर 13,690 रुपये और कुशल श्रमिकों का वेतन 13,940 रुपये से बढ़ाकर 16,868 रुपये तय कर दिया गया। प्रशासन ने ठेकेदारों को यह कड़ी चेतावनी भी दी कि भविष्य में शिकायत मिलने पर उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

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