
भोपाल। मध्य प्रदेश में शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) में कमी आने के बावजूद नवजात बच्चों की मौत का संकट गंभीर बना हुआ है। जनगणना निदेशालय की सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) रिपोर्ट ने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में नवजात मृत्यु दर 26 प्रति हजार दर्ज की गई है। इसका मतलब यह है कि हर एक हजार बच्चों में से 26 बच्चे जन्म लेने के 28 दिन के भीतर ही दम तोड़ दे रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग जहां इसे पहले की तुलना में सुधार बताकर उपलब्धि मान रहा है, वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थिति अब भी बेहद चिंताजनक है और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े स्तर पर सुधार की आवश्यकता है।
प्रदेश में हर साल हजारों नवजातों की मौत
मध्य प्रदेश में हर वर्ष लगभग 20 लाख बच्चों का जन्म होता है। यदि एसआरएस रिपोर्ट के आंकड़ों को आधार माना जाए तो करीब 52 हजार नवजात बच्चे जन्म के पहले 28 दिनों के भीतर ही अपनी जान गंवा रहे हैं। यह आंकड़ा केवल स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति ही नहीं, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं और नवजातों की देखभाल की वास्तविक तस्वीर भी सामने लाता है। विशेषज्ञों के अनुसार जन्म के शुरुआती 28 दिन किसी भी बच्चे के जीवन के सबसे संवेदनशील दिन होते हैं। इस दौरान संक्रमण, समयपूर्व जन्म, कम वजन, सांस लेने में परेशानी और प्रसव संबंधी जटिलताओं के कारण बड़ी संख्या में बच्चों की मौत हो जाती है।
शिशु मृत्यु दर में कमी, फिर भी देश में सबसे खराब राज्यों में शामिल मध्य प्रदेश
दो दिन पहले जारी एसआरएस 2024 की रिपोर्ट में मध्य प्रदेश की शिशु मृत्यु दर 37 से घटकर 35 प्रति हजार दर्ज की गई है। यह कुछ हद तक राहत देने वाला आंकड़ा माना जा रहा है, लेकिन इसके बावजूद प्रदेश देश में सबसे अधिक शिशु मृत्यु दर वाले राज्यों में शामिल है। इस मामले में केवल छत्तीसगढ़ की स्थिति मध्य प्रदेश से खराब बताई गई है। शिशु मृत्यु दर में एक वर्ष तक की आयु के बच्चों की मौत को शामिल किया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि आंकड़ों में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन प्रदेश की विशाल आबादी और ग्रामीण क्षेत्रों की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को देखते हुए यह सुधार पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
पांच वर्ष से पहले ही दम तोड़ रहे बच्चे
रिपोर्ट में सबसे चिंताजनक पहलुओं में से एक पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर है। मध्य प्रदेश में प्रति हजार 41 बच्चे पांच साल की उम्र पूरी करने से पहले ही दुनिया छोड़ रहे हैं। यह देश में सबसे खराब स्थिति मानी जा रही है। दूसरे स्थान पर छत्तीसगढ़ है, जहां यह दर 39 है, जबकि राष्ट्रीय औसत 28 प्रति हजार है। विशेषज्ञों के मुताबिक बच्चों में कुपोषण, बार-बार होने वाले संक्रमण, निमोनिया, दस्त, कमजोर प्रतिरोधक क्षमता और समय पर टीकाकरण नहीं होना इसके प्रमुख कारण हैं। ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी स्थिति को और गंभीर बना रही है।
गर्भावस्था में देखभाल की कमी बड़ी वजह
शिशु रोग विशेषज्ञों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भावस्था के दौरान महिलाओं की सही तरीके से देखभाल नहीं होना नवजात मृत्यु दर बढ़ने का बड़ा कारण है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच नहीं हो पाती। रक्तचाप, शुगर और हीमोग्लोबिन की जांच समय पर नहीं होने से गर्भावस्था के दौरान जटिलताएं बढ़ जाती हैं। कुपोषण भी एक गंभीर समस्या है, जिससे मां और गर्भस्थ शिशु दोनों प्रभावित होते हैं। प्रदेश के कई आदिवासी और दूरस्थ इलाकों में आज भी महिलाएं पर्याप्त पोषण और चिकित्सकीय सुविधा से वंचित हैं।
केवल 140 सरकारी अस्पतालों में सीजर डिलीवरी की सुविधा
प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की एक और बड़ी कमजोरी यह सामने आई है कि केवल लगभग 140 सरकारी अस्पतालों में ही सीजर डिलीवरी की सुविधा उपलब्ध है। इसका प्रमुख कारण एनेस्थीसिया विशेषज्ञ, शिशु रोग विशेषज्ञ और स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञों की भारी कमी बताई जा रही है। इनमें मेडिकल कॉलेज से जुड़े अस्पताल भी शामिल हैं। गंभीर स्थिति में गर्भवती महिलाओं को कई किलोमीटर दूर दूसरे अस्पतालों में रेफर करना पड़ता है। इस दौरान मां और गर्भस्थ शिशु दोनों की हालत बिगड़ने का खतरा बढ़ जाता है। कई मामलों में समय पर उपचार नहीं मिलने से नवजात और प्रसूता की मौत तक हो जाती है।
संक्रमण भी नवजात मौतों का बड़ा कारण
पूर्व राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) डायरेक्टर और शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. पंकज शुक्ला के अनुसार नवजात बच्चों की मौत का एक बड़ा कारण संक्रमण है। उन्होंने कहा कि निमोनिया और सेप्सिस जैसी बीमारियों से बड़ी संख्या में बच्चों की जान जा रही है। लेबर रूम और प्रसव केंद्रों में साफ-सफाई तथा संक्रमण नियंत्रण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से नवजातों में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि प्रसव पूर्व चारों जांचों को गुणवत्तापूर्ण बनाना होगा और ग्रामीण क्षेत्रों में प्रसव के बाद बीमार नवजातों की देखभाल की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।
मातृ मृत्यु दर में सुधार, लेकिन चुनौतियां बरकरार
एसआरएस 2021-23 रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में मातृ मृत्यु अनुपात (एमएमआर) में सुधार दर्ज किया गया है। यह आंकड़ा 159 से घटकर 135 प्रति लाख पहुंच गया है। इसमें गर्भवती और प्रसूताओं की मृत्यु को शामिल किया जाता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह सुधार स्वागत योग्य है, लेकिन अभी भी प्रदेश को राष्ट्रीय औसत तक पहुंचने के लिए लंबा सफर तय करना बाकी है। ग्रामीण इलाकों में सुरक्षित प्रसव, समय पर एम्बुलेंस सुविधा, विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता और पोषण योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ा संकेत
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आंकड़ों में सुधार से स्थिति बेहतर नहीं मानी जा सकती। जरूरत इस बात की है कि गांवों और दूरस्थ क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत किया जाए, विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति बढ़ाई जाए और गर्भवती महिलाओं को समय पर पोषण तथा स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं। साथ ही नवजातों की देखभाल, टीकाकरण और संक्रमण रोकने की व्यवस्थाओं को जमीनी स्तर तक प्रभावी बनाया जाए।
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