अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), भोपाल
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), भोपाल

मध्य प्रदेश: भोपाल एम्स बना रहा देश का पहला 'होप' डिवाइस, जानिए कैसे बीमारियों का पता लगाएगी यह तकनीक?

'होप' नाम का डिवाइस दो सालों में बनकर तैयार हो जाएगा, जिससे 'स्लीप एपनिया' बीमारी का पता लगाया जाएगा।

भोपाल। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल एक स्लीप डिवाइस बनाने जा रहा है, इस डिवाइस को हाथ में पहनकर सोने से बीमारी का पता चल सकेगा। यह डिवाइस रात को सोते वक्त शरीर की मॉनिटरिंग करेगी। रात के वक्त खर्राटे लेना, नींद पूरी न होना, थकान बने रहना ऐसे लक्षणों की जांच इस डिवाइस से की जा सकेगी। उक्त सभी समस्याएं स्लीप एपनिया बीमारी के लक्षण हो सकते हैं। जिसका पता आसानी से लगाया जा सकेगा। एम्स भोपाल में बनने जा रहा यह डिवाइस देश का पहला डिवाइस होगा। जो सिर्फ मेडिकल उपयोग के लिए होगा। इस डिवाइस का नाम 'होप' रखा गया है। जो दो सालों में बनकर तैयार हो जाएगा, जिससे 'स्लीप एपनिया' बीमारी का पता लगाया जाएगा।

स्लीप एपनिया ऐसी बीमारी होती है, जिसके बारे में मरीज को पता ही नहीं चलता कि वो कब इस बीमारी की चपेट में आ चुका है। जब इसका पता चलता है, तब तक मरीज अपनी शारीरिक और मानसिक क्षमता को प्रभावित कर चुका होता है। स्लीप एपनिया के कारण, हाई ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, हृदय से संबंधित बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है। स्लीप एपनिया बीमारी का समय से पता लगने पर इन सभी बीमारियों को रोका जा सकता है।

द मूकनायक से बातचीत करते हुए भोपाल एम्स के पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. अभिषेक गोयल ने बताया कि ‘स्लीप एपनिया’ नींद से जुड़ी बीमारी है। इस बीमारी का पता स्लीपिंग पैटर्न से ही लगाया जा सकता है। इसके लिए भोपाल एम्स डिवाइस तैयार कर रहा है। पहले से इस तरह के डिवाइस मौजूद हैं लेकिन हम एक नए तरीके का डिवाइस बना रहे हैं। जो दो वायर वाला होगा। 

"इसको हाथ में पहना जा सकेगा। यह डिवाइस होम पाली सोनोग्राफी ‘होप’ नाम से बनाया जा रहा है। यह डिवाइस किसी भी व्यक्ति के स्लीपिंग पैटर्न को बताएगा। इससे क्वालिटी नींद का भी पता चल पाएगा", डॉ. अभिषेक गोयल ने बताया कि "अभी यह प्रोजेक्ट शुरुआती दौर में हैं, हमें अप्रूवल मिल चुका है। डिवाइस पर काम शुरू हो चुका है। डिवाइस तैयार होने में टीम के अनुमान अनुसार दो साल लग सकते हैं।"

कैसे काम करेगा ‘होप’ डिवाइस?

‘होप’ डिवाइस पर काम कर रही एम्स की टीम ने बताया कि यह डिवाइस एक वॉच की तरह होगा। जिसे हाथ में पहनकर सोया जा सकता है। क्योंकि सोते समय व्यक्ति को यह पता नहीं चलता कि वो खर्राटे ले रहा है, या फिर बार-बार उसकी नींद टूट रही है। साथ ही ये भी पता नहीं चलता कि वो गहरी नींद में है या नहीं। ये डिवाइस व्यक्ति के सोने वाले इस पैटर्न को रिकार्ड करेगा। ये दिल की धड़कन, बाडी मूवमेंट के साथ-साथ इसकी भी जांच करेगा कि आपके दिमाग तक पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन पहुंच पा रही है, या नहीं। डिवाइस बारीकी से इन समस्याओं को रिकॉर्ड करेगा। 

प्रदेश के 32 प्रतिशत लोग हैं रोगी 

भोपाल एम्स इस बीमारी को लेकर रिसर्च कर चुका है। एम्स के डॉक्टर्स द्वारा 1080 मरीजों पर की गई रिसर्च से पता चला कि स्लीप एपनिया से पीड़ित लोगों में से 66 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जिनको हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत है। रिसर्च में यह भी पाया गया की 50 साल से ज्यादा उम्र के लोग इससे ज्यादा पीड़ित हो रहे हैं। इस बीमारी की वजह से मरीज आम व्यक्ति के मुकाबले 2 घंटे कम या ज्यादा नींद ले रहे हैं।

5 से 10 साल के 10 प्रतिशत बच्चे भी सोते समय खर्राटे लेने की समस्या से जूझ रहे हैं। जब ऐसी समस्या होती है, तो बच्चे को रात में बार-बार पेशाब के लिए जागना पड़ता है। पढ़ाई में मन नहीं लगता। इससे बच्चा हाइपर एक्टिव हो जाता है। वहीं, 18 से 40 साल तक के 20 प्रतिशत युवा ऐसे हैं, जो स्लीप एपनिया की चपेट में हैं। इस बीमारी के लक्षण ज्यादा या कम नींद आना दोनों होते हैं।

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