
भोपाल। मध्य प्रदेश में बाल विवाह के खिलाफ कानून और सरकारी अभियानों के बावजूद जिलों के बीच स्थिति में भारी असमानता सामने आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6), 2023-24 की मध्य प्रदेश फैक्टशीट के मुताबिक प्रदेश में कुछ जिले ऐसे हैं, जहां 18 वर्ष की कानूनी उम्र से पहले विवाह करने वाली महिलाओं का प्रतिशत बेहद अधिक है, जबकि कुछ जिलों में स्थिति तुलनात्मक रूप से काफी बेहतर है।
23 अगस्त 2026 को जारी फैक्टशीट के अनुसार, आगर मालवा में 20 से 24 वर्ष आयु वर्ग की 49.4 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 साल की उम्र पूरी होने से पहले हो चुका था। यानी सर्वे में शामिल इस आयु वर्ग की लगभग हर दूसरी युवती का विवाह कानूनी उम्र से पहले हुआ।
इसके उलट छिंदवाड़ा में यही आंकड़ा केवल 4.3 प्रतिशत दर्ज किया गया है। दोनों जिलों के बीच करीब 11.5 गुना का अंतर सामने आया है। यह अंतर बताता है कि मध्य प्रदेश में बाल विवाह की समस्या पूरे प्रदेश में एक जैसी नहीं है और सामाजिक, भौगोलिक तथा स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर जिलों की तस्वीर काफी अलग है।
प्रदेश में सुधार, लेकिन आगर मालवा में स्थिति बिगड़ी
मध्य प्रदेश के समग्र आंकड़ों पर नजर डालें तो बाल विवाह के मामले में कुछ सुधार दिखाई देता है। NFHS-5 में प्रदेश की 20 से 24 वर्ष आयु वर्ग की 23.1 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 साल से पहले हुआ था। NFHS-6 में यह आंकड़ा घटकर 20 प्रतिशत रह गया है।
यानी प्रदेश स्तर पर बाल विवाह के प्रतिशत में कमी आई है। हालांकि, इसका मतलब यह भी है कि आज भी मध्य प्रदेश में इस आयु वर्ग की हर पांच में से लगभग एक महिला का विवाह 18 वर्ष की कानूनी उम्र पूरी होने से पहले हुआ था।
सबसे चिंताजनक तस्वीर आगर मालवा की है। यहां NFHS-5 में 20 से 24 वर्ष की महिलाओं में 18 साल से पहले विवाह का प्रतिशत 35.6 था। NFHS-6 में यह बढ़कर 49.4 प्रतिशत पहुंच गया।
यानी जिस अवधि में प्रदेश के औसत आंकड़े में सुधार हुआ, उसी दौरान आगर मालवा में बाल विवाह का प्रतिशत करीब 13.8 प्रतिशत अंक बढ़ गया। यह वृद्धि जिले में बाल विवाह रोकने के प्रयासों और स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
पश्चिमी और आदिवासी अंचलों में चुनौती ज्यादा
NFHS-6 के आंकड़ों में मध्य प्रदेश के पश्चिमी और आदिवासी बहुल इलाकों के कई जिले बाल विवाह की ऊंची दर वाले जिलों में शामिल हैं। आगर मालवा के बाद झाबुआ में 37 प्रतिशत, अलीराजपुर में 33.5 प्रतिशत, बड़वानी में 32.6 प्रतिशत और शिवपुरी में 31 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले होने का आंकड़ा दर्ज किया गया है।
इन जिलों में स्थिति केवल इसलिए चिंता का विषय नहीं है कि बाल विवाह की दर अधिक है, बल्कि कुछ जिलों में पिछली NFHS की तुलना में आंकड़े बढ़े भी हैं।
झाबुआ में मामूली, लेकिन चिंताजनक बढ़ोतरी
झाबुआ में NFHS-5 के दौरान 20 से 24 वर्ष की महिलाओं में 18 साल से पहले विवाह का आंकड़ा 36.5 प्रतिशत था। NFHS-6 में यह बढ़कर 37 प्रतिशत हो गया।
प्रतिशत में यह बढ़ोतरी भले ही बहुत बड़ी न दिखे, लेकिन इसका अर्थ यह है कि जिले में बाल विवाह की समस्या में अपेक्षित कमी नहीं आई। इसके साथ ही झाबुआ में कम उम्र में गर्भधारण और मातृत्व का आंकड़ा भी गंभीर संकेत देता है।
यहां 15 से 19 वर्ष आयु वर्ग की 21.9 प्रतिशत महिलाएं मां बन चुकी थीं या सर्वे के समय गर्भवती थीं। यह प्रतिशत बताता है कि बाल विवाह और कम उम्र में मातृत्व की समस्या एक-दूसरे से जुड़ी हुई चुनौती के रूप में सामने आ रही है।
अलीराजपुर में भी बढ़ा बाल विवाह का प्रतिशत
आदिवासी बहुल अलीराजपुर में भी स्थिति चिंताजनक है। NFHS-6 में यहां 20 से 24 वर्ष आयु वर्ग की 33.5 प्रतिशत महिलाओं का विवाह 18 वर्ष से पहले हुआ।
NFHS-5 में यह आंकड़ा 30.7 प्रतिशत था। यानी नवीनतम सर्वेक्षण में इसमें बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अलीराजपुर में 15 से 19 वर्ष की 17.7 प्रतिशत महिलाएं मां बन चुकी थीं या गर्भवती थीं। यह आंकड़ा भी बताता है कि कम उम्र में विवाह के बाद किशोरावस्था में गर्भधारण की समस्या यहां एक महत्वपूर्ण सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौती बनी हुई है।
बाल विवाह और किशोरावस्था में मातृत्व का सीधा संबंध
बाल विवाह केवल कानूनी उम्र से पहले शादी का मामला नहीं है। इसके प्रभाव लड़कियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, आर्थिक स्वतंत्रता और भविष्य की सामाजिक स्थिति पर भी पड़ते हैं। कम उम्र में विवाह होने के बाद लड़कियों के स्कूल छोड़ने की आशंका बढ़ती है और जल्द गर्भधारण की संभावना भी अधिक हो सकती है।
झाबुआ और अलीराजपुर के आंकड़े इसी चुनौती की ओर संकेत करते हैं। जहां बाल विवाह का प्रतिशत ऊंचा है, वहां 15 से 19 वर्ष आयु वर्ग में मां बनने या गर्भवती होने वाली किशोरियों का अनुपात भी उल्लेखनीय है।
किशोरावस्था में गर्भधारण को स्वास्थ्य के लिहाज से भी संवेदनशील माना जाता है। ऐसे मामलों में मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य से जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं। इसलिए बाल विवाह की रोकथाम केवल कानून लागू करने का मुद्दा नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, सामाजिक जागरूकता और आर्थिक परिस्थितियों से जुड़ा व्यापक विषय है।
एक ही प्रदेश में 4.3% से 49.4% तक का अंतर
आगर मालवा और छिंदवाड़ा के आंकड़ों की तुलना मध्य प्रदेश के भीतर मौजूद असमानता को सबसे स्पष्ट तरीके से दिखाती है।
आगर मालवा: 49.4%
झाबुआ: 37%
अलीराजपुर: 33.5%
बड़वानी: 32.6%
शिवपुरी: 31%
छिंदवाड़ा: 4.3%
आगर मालवा और छिंदवाड़ा के बीच करीब 45.1 प्रतिशत अंक का अंतर है। अनुपात के हिसाब से आगर मालवा में यह दर छिंदवाड़ा की तुलना में करीब 11.5 गुना अधिक है।
इससे यह संकेत मिलता है कि राज्य स्तर पर औसत में सुधार होने के बावजूद कुछ जिलों की स्थिति इतनी खराब है कि वहां अलग और केंद्रित रणनीति की जरूरत है।
प्रदेश का औसत सुधरा, लेकिन औसत पूरी कहानी नहीं बताता
मध्य प्रदेश में NFHS-5 के 23.1 प्रतिशत से NFHS-6 में 20 प्रतिशत तक की गिरावट को बाल विवाह के मामले में सकारात्मक बदलाव माना जा सकता है। लेकिन जिला स्तर के आंकड़े बताते हैं कि केवल राज्य के औसत को देखकर समस्या की वास्तविक तस्वीर समझना पर्याप्त नहीं है।
एक ओर छिंदवाड़ा जैसे जिले में आंकड़ा 5 प्रतिशत से भी नीचे है, वहीं दूसरी ओर आगर मालवा में यह लगभग 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। इसका मतलब है कि राज्य के भीतर सामाजिक परिस्थितियां, शिक्षा की पहुंच, आर्थिक स्थिति, जागरूकता, परंपराएं और प्रशासनिक हस्तक्षेप अलग-अलग परिणाम दे रहे हैं।
विशेषज्ञों के लिए भी यह महत्वपूर्ण सवाल है कि जिन जिलों में NFHS-5 की तुलना में बाल विवाह बढ़ा है, वहां कारणों की अलग से पड़ताल की जाए और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति तैयार की जाए।
अब सबसे बड़ी चुनौती: हाई-रिस्क जिलों पर केंद्रित कार्रवाई
NFHS-6 के आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि मध्य प्रदेश में बाल विवाह की चुनौती को एक समान राज्यव्यापी समस्या मानकर केवल सामान्य अभियान चलाना पर्याप्त नहीं होगा। आगर मालवा, झाबुआ, अलीराजपुर, बड़वानी और अन्य ऊंची दर वाले जिलों के लिए विशेष रणनीति की जरूरत है।
बालिकाओं की माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा जारी रखना, स्कूल छोड़ने वाली किशोरियों की पहचान करना, विवाह की सूचना मिलने पर त्वरित हस्तक्षेप, पंचायत और समुदाय स्तर पर निगरानी तथा किशोरियों और उनके परिवारों के बीच कानूनी उम्र और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण हो सकता है।
प्रदेश के औसत में सुधार निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है, लेकिन आगर मालवा जैसे जिले का 49.4 प्रतिशत का आंकड़ा बताता है कि बाल विवाह के खिलाफ लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। बल्कि NFHS-6 ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मध्य प्रदेश में अब सबसे बड़ी जरूरत उन जिलों की पहचान कर वहां केंद्रित कार्रवाई करने की है, जहां कानून बनने और जागरूकता अभियानों के बावजूद बाल विवाह की दर बेहद ऊंची बनी हुई है या पहले की तुलना में बढ़ रही है।
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