
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 20 मई 2026 को स्पष्ट किया है कि देशव्यापी जनगणना के हिस्से के रूप में जातिगत आंकड़े जुटाने में कुछ भी गलत नहीं है। अदालत का मानना है कि सत्ता में मौजूद किसी भी सरकार के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि देश में कितने लोग पिछड़े हुए हैं।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने एक मामले की सुनवाई करते हुए यह अहम टिप्पणी की। सीजेआई ने कहा कि सरकार को यह पता होना चाहिए कि समाज में किसे कल्याणकारी योजनाओं की सख्त जरूरत है, और यह पूरी तरह से एक नीतिगत मामला है।
दरअसल, शीर्ष अदालत में याचिकाकर्ता सुधाकर गुम्मुला ने एक याचिका दायर की थी। इस याचिका में उन्होंने मांग की थी कि आगामी 2027 की जनगणना में जातिगत गणना को शामिल नहीं किया जाना चाहिए।
गुम्मुला ने अदालत के समक्ष अपनी दलील देते हुए कहा कि राजनेताओं और कॉर्पोरेट संस्थाओं द्वारा जातिगत डेटा के दुरुपयोग की अनंत संभावनाएं मौजूद हैं। उन्होंने तर्क दिया कि इतने बड़े पैमाने पर जातियों से जुड़ा डेटा इकट्ठा करने का कोई उचित कारण नजर नहीं आता।
इन दलीलों को सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश ने साफ किया कि यह तय करना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता कि 2027 की जनगणना में जाति की गिनती अनिवार्य रूप से होनी चाहिए या नहीं। अदालत ने इसे पूरी तरह से नीतिगत विषय बताते हुए इस याचिका को खारिज कर दिया।
गौरतलब है कि राजनीतिक मामलों की कैबिनेट समिति ने पिछले साल अप्रैल में हुई अपनी एक अहम बैठक में 2027 की जनगणना के भीतर जातिगत गणना को शामिल करने का फैसला किया था। उसके बाद से ही यह आगामी जनगणना का एक प्रमुख और बहुचर्चित हिस्सा बन गया है।
अगर पुराने आंकड़ों और प्रक्रिया पर नजर डालें, तो 2011 की जनगणना तक केवल अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) की ही व्यवस्थित रूप से गणना की जाती थी।
सरकार ने पहले ही संसद के पटल पर यह जानकारी दे दी है कि 2027 की जनगणना के दूसरे चरण में जातिगत गणना को शामिल किया जाएगा। इसका पहला चरण 'हाउस लिस्टिंग ऑपरेशन' (एचएलओ) होगा, जिसमें प्रत्येक परिवार के आवास की स्थिति, संपत्ति और अन्य सुविधाओं की बुनियादी जानकारी जुटाई जाएगी।
इसके बाद दूसरे चरण यानी 'जनसंख्या गणना' की शुरुआत होगी। इसी चरण के दौरान देश के नागरिकों की जनसांख्यिकीय, सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां एकत्र की जाएंगी।
जातिगत गणना के महत्व पर पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी एक सटीक टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा था कि अगर सोच-समझकर और सही तरीके से जातिगत डेटा इकट्ठा किया जाए, तो यह शरीर के एमआरआई (MRI) की तरह समाज को जोड़ने और उसकी कमियों को समझने का एक बड़ा साधन बन सकता है।
आपको बता दें कि भारत में आखिरी बार व्यापक स्तर पर राष्ट्रीय जातिगत जनगणना औपनिवेशिक काल के दौरान साल 1931 में आयोजित की गई थी।
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