MP: बालाघाट में फोटो-वीडियो और रील पर रोक का आदेश 5 घंटे में वापस, विरोध के बाद प्रशासन ने लिया फैसला

अस्पताल, स्कूल और सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति रिकॉर्डिंग पर लगाई गई थी रोक; उल्लंघन पर BNS की धारा 223 के तहत कार्रवाई की चेतावनी, वरिष्ठ पत्रकार ने बैगा बच्चों की मौतों से जोड़कर उठाए सवाल
MP: बालाघाट में फोटो-वीडियो और रील पर रोक का आदेश 5 घंटे में वापस, विरोध के बाद प्रशासन ने लिया फैसला
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भोपाल। मध्य प्रदेश के बालाघाट में जिला प्रशासन की ओर से सार्वजनिक स्थानों, अस्पतालों, स्कूलों और अन्य संस्थानों में बिना अनुमति फोटो, वीडियो या रील बनाने पर रोक लगाने का आदेश जारी किए जाने के कुछ ही घंटों बाद वापस ले लिया गया। प्रशासन ने यह आदेश भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 163 के तहत जारी किया था। आदेश में नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 के तहत कार्रवाई की चेतावनी दी गई थी।

आदेश सामने आने के बाद सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर इसका विरोध शुरू हो गया। लोगों और पत्रकारों ने सवाल उठाए कि सार्वजनिक स्थानों पर फोटो और वीडियो बनाने पर व्यापक रोक लगाने से मीडिया की स्वतंत्र रिपोर्टिंग और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की निगरानी प्रभावित हो सकती है। विवाद बढ़ने के बाद प्रशासन ने आदेश की समीक्षा की और करीब 5 घंटे के भीतर इसे वापस लेने का फैसला किया।

3 सितंबर से 3 नवंबर तक लागू होना था आदेश

अपर कलेक्टर डीपी बर्मन की ओर से जारी आदेश में कहा गया था कि यह बालाघाट जिले की पूरी सीमा में 3 सितंबर से तत्काल प्रभाव से लागू होगा और 3 नवंबर तक प्रभावी रहेगा।

प्रशासन ने आदेश के पीछे जनसामान्य की सुरक्षा, अस्पतालों में मरीजों की निजता और गरिमा की रक्षा, विद्यार्थियों की सुरक्षा तथा शासकीय, चिकित्सकीय और शैक्षणिक कार्यों के सुचारू संचालन को वजह बताया था।

आदेश में अस्पतालों, स्वास्थ्य संस्थानों, स्कूलों, कॉलेजों और अन्य सार्वजनिक एवं संस्थागत स्थानों पर फोटो, वीडियो और रील बनाने को लेकर कई तरह के प्रतिबंध लगाए गए थे।

अस्पतालों में मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों की रिकॉर्डिंग पर रोक

प्रशासन के आदेश के मुताबिक अस्पतालों और अन्य स्वास्थ्य संस्थानों में जिम्मेदार अधिकारी या संस्था प्रमुख की अनुमति के बिना मरीजों, उनके परिजनों, डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की फोटो, वीडियो या रील बनाने पर रोक लगाई गई थी।

इसके अलावा ऐसी सामग्री को सोशल मीडिया पर प्रसारित करने को लेकर भी प्रतिबंध लगाया गया था, यदि उससे मरीज की निजी जानकारी, सम्मान, इलाज या मेडिकल कार्य प्रभावित होने की स्थिति बनती हो।

प्रशासन का तर्क था कि अस्पतालों में इलाज करा रहे मरीजों की निजता और गरिमा की रक्षा जरूरी है। बिना अनुमति रिकॉर्डिंग से मरीजों की व्यक्तिगत जानकारी सार्वजनिक होने की आशंका रहती है।

स्कूल-कॉलेजों में विद्यार्थियों की रिकॉर्डिंग भी प्रतिबंधित

आदेश में शासकीय और अशासकीय स्कूलों, कॉलेजों तथा अन्य शिक्षण संस्थानों को भी शामिल किया गया था। यहां संस्था प्रमुख की अनुमति के बिना विद्यार्थियों, विशेषकर नाबालिग बच्चों, शिक्षकों और शैक्षणिक गतिविधियों की फोटो, वीडियो या रील बनाने पर रोक लगाई गई थी।

यदि ऐसी रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया पर प्रसारित होने से किसी विद्यार्थी की पहचान, सुरक्षा, निजता या शैक्षणिक व्यवस्था प्रभावित होती है तो कार्रवाई का प्रावधान रखा गया था।

प्रशासन का कहना था कि नाबालिग विद्यार्थियों की पहचान और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उनकी तस्वीरों और वीडियो के अनधिकृत प्रसारण को रोकना आवश्यक है।

सार्वजनिक स्थानों पर भी लागू किए गए थे प्रतिबंध

आदेश का दायरा केवल अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों तक सीमित नहीं था। जिले की सीमा में सार्वजनिक स्थानों पर भी बिना अनुमति फोटो, वीडियो या रील बनाने को लेकर प्रतिबंध का प्रावधान किया गया था।

यही बिंदु आदेश जारी होने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा में आया। सवाल उठने लगे कि सार्वजनिक स्थानों पर रिकॉर्डिंग को लेकर अनुमति की अनिवार्यता किस तरह लागू होगी और इसका पत्रकारिता, नागरिक निगरानी तथा सोशल मीडिया कंटेंट बनाने वालों पर क्या असर पड़ेगा।

BNS की धारा 223 के तहत कार्रवाई की चेतावनी

प्रशासन ने आदेश में इसके उल्लंघन की स्थिति में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 223 के तहत कार्रवाई की बात कही थी। इसके चलते आदेश को लेकर लोगों में और अधिक चर्चा शुरू हो गई।

आलोचकों का कहना था कि निजता और सुरक्षा के नाम पर प्रतिबंध लगाए जाने का उद्देश्य समझ में आता है, लेकिन आदेश की व्यापक भाषा से पत्रकारों और आम नागरिकों के लिए असमंजस की स्थिति पैदा हो सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार कैलाश साहू ने उठाए सवाल

आदेश को लेकर वरिष्ठ पत्रकार कैलाश साहू ने भी प्रशासन पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि बालाघाट में बैगा आदिवासी बच्चों की समय से पहले हो रही मौतों को लेकर प्रशासन की बदनामी रोकने के लिए जल्दबाजी में इस तरह का आदेश जारी किया गया।

उनका आरोप था कि प्रशासन नहीं चाहता कि बैगा आदिवासी बच्चों के बीमार होने, उनकी मौत और अस्पतालों में उनके इलाज से जुड़ी वास्तविक स्थिति की तस्वीरें और वीडियो सामने आएं।

हालांकि, ये आरोप पत्रकार कैलाश साहू की ओर से लगाए गए हैं। प्रशासन ने आदेश जारी करने के पीछे मरीजों की निजता, विद्यार्थियों की सुरक्षा और शासकीय, चिकित्सकीय एवं शैक्षणिक कार्यों के सुचारू संचालन को कारण बताया था।

विरोध के बाद प्रशासन ने की समीक्षा

आदेश जारी होने के बाद इसका विरोध तेज हुआ और सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर सवाल उठने लगे। इसके बाद प्रशासन ने आदेश की समीक्षा की।

समीक्षा के बाद गुरुवार रात प्रशासन ने आदेश को वापस लेने का निर्णय लिया। इस तरह जिस आदेश को 3 सितंबर से 3 नवंबर तक दो महीने के लिए लागू किया जाना था, वह जारी होने के करीब पांच घंटे बाद ही वापस ले लिया गया।

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