मद्रास हाई कोर्ट का फैसला: बार-बार शारीरिक संबंध बनाना सहमति नहीं, युवाओं को 'रोमांस फ्रॉड' से बचने की सख्त चेतावनी

मद्रास हाई कोर्ट का बड़ा फैसला- बार-बार शारीरिक संबंध बनाना कानूनी सहमति नहीं, युवाओं को ऑनलाइन 'रोमांस फ्रॉड' और साइबर ब्लैकमेलिंग से बचने की सख्त हिदायत।
Madras High Court, Romance Fraud
मद्रास हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: बार-बार शारीरिक संबंध बनाना कानूनी सहमति नहीं है। जानें कोर्ट ने युवाओं को 'रोमांस फ्रॉड' से बचने की क्या सख्त चेतावनी दी।
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मद्रास उच्च न्यायालय ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि आरोपी और पीड़िता के बीच बार-बार शारीरिक संबंध बनने का मतलब यह नहीं है कि इसके लिए सहमति दी गई थी। अदालत ने कहा कि कानून की नजर में वैध सहमति मानने से पहले उन परिस्थितियों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाना चाहिए जिनमें यह कृत्य हुआ। इसमें स्वतंत्र और सूचित विकल्प का अभाव, जबरदस्ती, धोखा या डराने-धमकाने जैसी बातों की बारीकी से जांच होनी चाहिए।

न्यायमूर्ति एन आनंद वेंकटेश और न्यायमूर्ति के के रामकृष्णन की खंडपीठ ने मंगलवार को यह सख्त टिप्पणी की। मदुरै पीठ के इन न्यायाधीशों ने स्पष्ट किया कि अदालतों को दोनों पक्षों के पूरे आचरण की जांच करनी चाहिए। यह देखना बेहद जरूरी है कि रिश्ता कैसे शुरू हुआ, आरोपी के इरादे क्या थे और क्या यह संबंध वास्तविक स्नेह पर आधारित था या सोची-समझी साजिश के तहत बनाया गया था।

अदालत ने युवाओं और उनके परिवारों को 'रोमांस फ्रॉड' यानी प्यार के नाम पर होने वाले धोखे के प्रति भी आगाह किया। न्यायाधीशों ने ऑनलाइन या तकनीक आधारित रिश्तों में पड़ने से पहले अत्यधिक सावधानी बरतने की सलाह दी है। उन्होंने समाज की सभी युवा लड़कियों और महिलाओं से एक विनम्र लेकिन गंभीर अपील की है कि वे अपनी निजता को लेकर सतर्क रहें।

अदालत ने कहा कि स्नेह, विश्वास या गोपनीयता का वादा चाहे कितना भी गहरा क्यों न लगे, कभी भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से अपनी अंतरंग तस्वीरें या वीडियो किसी के साथ साझा नहीं करनी चाहिए। एक बार जब ऐसी सामग्री आपके नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तो इसका आसानी से दुरुपयोग किया जा सकता है। इसके परिणामस्वरूप पीड़िता की निजता, सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य पर ऐसा प्रभाव पड़ता है जिसे सुधारा नहीं जा सकता। विश्वास टूटने के बाद कानूनी मदद लेने की कठिन प्रक्रिया से गुजरने से बेहतर है कि पहले ही सावधानी बरती जाए।

न्यायाधीशों ने इस बात पर जोर दिया कि गलत जगह किया गया एक पल का भरोसा कभी भी जीवन भर की पीड़ा नहीं बनना चाहिए। आज के तेजी से बढ़ते तकनीकी युग और सोशल मीडिया के दौर में, अदालतें लगातार ऑनलाइन लालच, भावनात्मक हेरफेर, यौन शोषण और साइबर ब्लैकमेल से जुड़े अपराधों का सामना कर रही हैं। डिजिटल संचार के विकास ने मानव संपर्क को तो बढ़ाया है, लेकिन साथ ही धोखे, जबरदस्ती और गैर-सहमति वाली रिकॉर्डिंग के जरिए शोषण के अवसर भी पैदा किए हैं।

उच्च न्यायालय ने यह कड़ी टिप्पणियां साल 2020 में कन्याकुमारी जिले में कई महिलाओं के यौन शोषण और जबरन वसूली से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान कीं। अदालत ने निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कासी उर्फ सुजी नामक व्यक्ति को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने इसे धोखे से किए गए बलात्कार, यौन जबरन वसूली और 'रोमांस फ्रॉड' का एक बिल्कुल सटीक उदाहरण बताया।

मानव सभ्यता की शुरुआत से ही शालीनता और निजता को मानवीय गरिमा का अभिन्न अंग माना गया है। अदालत ने बाइबल में आदम और हव्वा के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि अपनी नग्नता का अहसास होने पर उन्होंने खुद को पत्तों से ढक लिया था, जो निजता को बनाए रखने की सहज मानवीय प्रवृत्ति को दर्शाता है। लेकिन दुर्भाग्य से आज के डिजिटल युग में कुछ बेईमान लोग युवा लड़कियों की भावनात्मक कमजोरी और भरोसे का फायदा उठा रहे हैं।

इस संवेदनशील मुद्दे के व्यापक जनहित को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने अपने फैसले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अंग्रेजी, तमिल और हिंदी में सुनाया। हालांकि, समय की कमी के कारण देश की अन्य सभी क्षेत्रीय भाषाओं में इस फैसले का अनुवाद उपलब्ध न करा पाने पर अदालत ने खेद भी व्यक्त किया।

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