'आधी मांसपेशियों के साथ भी मेरा हौसला बुलंद है': अनशन पर अडिग सोनम वांगचुक, संसद मार्च के लिए मिला आज़ाद का साथ

NEET विवाद: जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक का अनशन 18वें दिन भी जारी, चंद्रशेखर आजाद का मिला साथ और 20 जुलाई को संसद मार्च का ऐलान।
Sonam Wangchuk hunger strike
NEET पेपर लीक के खिलाफ सोनम वांगचुक का जंतर-मंतर पर अनशन 18वें दिन भी जारी। स्वास्थ्य में गिरावट, आजाद का समर्थन और संसद मार्च का ऐलान।फोटो साभार- @abhijeet_dipke
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नई दिल्ली: जंतर-मंतर पर मंच पर एक गद्दे पर लेटे हुए 59 वर्षीय जाने-माने कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने अपने समर्थकों का आभार जताते हुए कहा कि वे सभी से प्यार करते हैं और आधी मांसपेशियों के बचे होने के बावजूद खुद को बेहद मजबूत महसूस कर रहे हैं। बुधवार को उनकी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का 18वां दिन था। इस दौरान वहां मौजूद भीड़ लगातार 'वी लव यू सोनम' और 'सोनम तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं' के नारे लगाकर उनका उत्साह बढ़ा रही थी।

वांगचुक ने कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के अभियान को अपना खुला समर्थन दिया है। इस पार्टी का गठन नीट (NEET) पेपर लीक विवाद के बाद किया गया था। इस संगठन की मुख्य मांग केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का तत्काल इस्तीफा है।

जंतर-मंतर पर वांगचुक और कई अन्य लोगों के लगातार विरोध प्रदर्शन और अनशन के बावजूद, केंद्र सरकार की ओर से इस गतिरोध को खत्म करने की कोई ठोस कोशिश सामने नहीं आई है। इसी बीच, वांगचुक के लगातार गिरते स्वास्थ्य को जानलेवा बताते हुए बुधवार को दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (PIL) भी दायर की गई है।

विरोध स्थल पर बुधवार को समर्थन का एक नया सैलाब देखने को मिला, जब भीम आर्मी के प्रमुख और लोकसभा सांसद चंद्रशेखर आजाद प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंचे। उन्होंने आगामी 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद मार्च का पुरजोर समर्थन करते हुए अपने समर्थकों से इसमें भारी संख्या में शामिल होने की अपील की। आजाद ने यह भी घोषणा की कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो 20 जुलाई के बाद वे हर रात प्रदर्शन स्थल पर ही बिताएंगे।

आजाद ने स्पष्ट किया कि वह सोनम से अनशन खत्म करने के लिए नहीं कहेंगे। उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वांगचुक को कुछ भी होता है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी सत्ता में बैठे लोगों की होगी। उनका कहना था कि जो केंद्रीय शिक्षा मंत्री देश की परीक्षा प्रणाली की शुचिता नहीं बचा सकते, उनसे देश के भविष्य की रक्षा की उम्मीद बिल्कुल नहीं की जा सकती।

बुधवार को सीपीआई के राज्यसभा सांसद पी संतोष कुमार और स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा ने भी धरना स्थल का दौरा कर अपना समर्थन जताया। दूसरी ओर, कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर एक खुला पत्र साझा करते हुए वांगचुक से अपना अनशन समाप्त करने का विनम्र आग्रह किया।

थरूर ने अपने पत्र में लिखा कि वांगचुक ने देश की अंतरात्मा को जगा दिया है और एक अनशन का असल उद्देश्य भी यही होता है। उन्होंने बताया कि सोमवार से संसद का सत्र फिर से शुरू हो रहा है, जहां लोकतंत्र के सबसे ऊंचे मंच पर छात्रों के मुद्दे उठाने का पूरा अवसर मिलेगा। साथ ही, उन्होंने सरकार से युवाओं के साथ संवाद करने की अपील करते हुए इसे कमजोरी नहीं बल्कि कुशल राजनीति (Statesmanship) का प्रतीक बताया।

हालांकि, सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने समर्थकों से अपील की कि वे वांगचुक पर अनशन तोड़ने का कोई दबाव न डालें। दीपके के अनुसार, जब उन्होंने वांगचुक से इस बारे में बात की, तो उनका जवाब था कि सरकार से उनकी मांगें सुनने को कहा जाए, न कि उनसे अनशन खत्म करने को। इसके साथ ही दीपके ने वांगचुक के प्रति एकजुटता दिखाने के लिए गुरुवार को एक दिवसीय सामूहिक भूख हड़ताल का भी आह्वान किया।

वांगचुक की रोजाना डिटेल में मेडिकल जांच की जा रही है। डॉक्टरों के मुताबिक फिलहाल उनकी स्थिति स्थिर बनी हुई है। बुधवार शाम करीब साढ़े चार बजे दर्ज किए गए उनके स्वास्थ्य आंकड़ों के अनुसार, उनका वजन 57.15 किलोग्राम और हृदय गति 71 बीट प्रति मिनट थी। उनके शरीर में पानी के स्तर को 'अलर्ट' श्रेणी में रखा गया है और मानसिक स्थिति 'संतोषजनक' बताई गई है। सीजेपी प्रतिनिधियों ने जानकारी दी कि अनशन शुरू करने के बाद से अब तक उनका वजन 8.5 किलो कम हो चुका है।

मेट्रो ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स की संयुक्त प्रबंध निदेशक और वरिष्ठ न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. सोनिया लाल गुप्ता ने लंबे समय तक भूखे रहने के गंभीर खतरों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि लगभग तीन सप्ताह तक अनशन करने पर शरीर की चर्बी और मांसपेशियां टूटने लगती हैं, जिससे अत्यधिक कमजोरी, चक्कर आना और निर्जलीकरण (Dehydration) की समस्या होती है। लंबे समय तक ऐसा चलने से किडनी को नुकसान, हृदय की गति में गड़बड़ी, अंगों की कार्यप्रणाली में बाधा और मानसिक बदलाव भी आ सकते हैं।

जबरन भोजन कराने के नैतिक सवाल पर डॉ. गुप्ता ने स्पष्ट किया कि चिकित्सा हस्तक्षेप का मुख्य उद्देश्य मरीज की स्वायत्तता का सम्मान करना है। यदि व्यक्ति परिस्थितियों को समझकर निर्णय लेने में सक्षम है, तो उसे जबरन भोजन कराना नैतिक रूप से उचित नहीं ठहराया जा सकता। हालांकि, यदि वह सचेत विकल्प चुनने में असमर्थ हो जाता है, तो कानूनी दिशा-निर्देशों, वसीयत या अदालत की कार्रवाई के तहत ही चिकित्सा हस्तक्षेप की आवश्यकता तय की जाती है।

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