बाल विवाह पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला: शरियत नहीं, बल्कि देश का कानून तय करेगा शादी की उम्र

इलाहाबाद हाई कोर्ट का स्पष्ट निर्देश: देश में सभी नागरिकों के लिए विवाह की न्यूनतम कानूनी उम्र समान है, शरियत या मुस्लिम पर्सनल लॉ बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA) और पॉक्सो (POCSO) एक्ट से ऊपर नहीं हो सकता।
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इलाहाबाद हाई कोर्ट
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उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने देश में विवाह की कानूनी उम्र को लेकर एक बेहद अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि बाल विवाह निषेध अधिनियम (PCMA), 2006 के तहत निर्धारित शादी की न्यूनतम उम्र देश के सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होती है, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। कोर्ट ने यह सख्त टिप्पणी की है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ का वह सिद्धांत, जिसमें यौवन (प्यूबर्टी) प्राप्त करने को शादी की सही उम्र माना जाता है, किसी भी सूरत में केंद्रीय कानून से ऊपर नहीं हो सकता।

यह महत्वपूर्ण फैसला 1 जुलाई को जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ द्वारा सुनाया गया। यह बेंच एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 19 लोगों के खिलाफ दर्ज की गई एक एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी। यह पूरा मामला इसी साल फरवरी महीने में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले का है, जहां एक 16 वर्षीय नाबालिग लड़की की शादी कराने का प्रयास किया जा रहा था।

घटना के वक्त चाइल्डलाइन और पुलिस के अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर उस नाबालिग लड़की को रेस्क्यू कर लिया था। हालांकि, बचाव कार्य के दौरान लड़की के रिश्तेदारों द्वारा रेस्क्यू टीम पर कथित तौर पर हमला भी किया गया था। इसी मामले में राहत की उम्मीद लेकर याचिकाकर्ताओं ने अदालत में दलील दी थी कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत 15 वर्ष की आयु में यौवन प्राप्त कर चुकी लड़की शादी के योग्य मानी जाती है।

अपनी बात को सही ठहराने के लिए उन्होंने भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875 और मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के प्रावधानों का भी हवाला दिया और कहा कि पीसीएमए (PCMA) शरियत की जगह नहीं ले सकता।

सभी पक्षों को सुनने के बाद खंडपीठ ने इस बात को स्वीकार किया कि मुस्लिम नाबालिगों की शादी पर्सनल लॉ के तहत मानी जाए या पीसीएमए और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 के तहत, इसे लेकर देशभर के विभिन्न उच्च न्यायालयों की अलग-अलग राय रही है।

हालांकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 'मोइदुट्टी मुसलियार बनाम सब इंस्पेक्टर, वडक्कनचेरी पुलिस स्टेशन' मामले में केरल हाई कोर्ट द्वारा दिए गए तर्क से पूरी तरह सहमति जताई। इस तर्क के अनुसार, कोई भी पर्सनल लॉ बाल विवाह पर लगी वैधानिक रोक को दरकिनार नहीं कर सकता और न ही पॉक्सो (POCSO) एक्ट की गंभीरता को कम कर सकता है।

अदालत ने अपने फैसले में बड़ी ही साफगोई से कहा कि इस देश के हर नागरिक के लिए विवाह की उम्र वही होगी जो पीसीएमए द्वारा तय की गई है। 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति की शादी की अनुमति देना सीधे तौर पर पॉक्सो एक्ट के खिलाफ होगा, जो एक बच्चे के साथ शारीरिक संबंध बनाने को एक गंभीर अपराध की श्रेणी में रखता है।

इन कानूनों की महत्ता पर जोर देते हुए कोर्ट ने कहा कि पीसीएमए और पॉक्सो एक्ट सार्वजनिक स्वास्थ्य और राष्ट्रीय नीति पर आधारित हैं। इनके पीछे एक वैज्ञानिक समझ है जिसे निषेधाज्ञा के रूप में कानूनी रूप दिया गया है, और देश का कोई भी व्यक्ति इसके दायरे से बाहर नहीं जा सकता। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने एफआईआर को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया।

अदालत ने यह भी माना कि पुलिस और चाइल्डलाइन के अधिकारी पीसीएमए के तहत अपने वैधानिक कर्तव्यों का ही पालन कर रहे थे ताकि पॉक्सो एक्ट के संभावित उल्लंघन को रोका जा सके। फैसले के अंत में अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि लड़की की शादी के लिए यौवन को योग्य उम्र मानने वाला शरियत कानून सीधे तौर पर पीसीएमए और पॉक्सो एक्ट दोनों के ही खिलाफ है।

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