
उत्तर प्रदेश: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) से जुड़े एक मामले में बेहद अहम आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अगर किसी मां को अपने सगे बेटे से गुजारा भत्ता मिल रहा है, तो वह बाद में अपने सौतेले बेटे से भी भरण-पोषण की मांग नहीं कर सकती।
कोर्ट ने बीते 14 जुलाई को दिए गए अपने फैसले में कहा कि सगे बेटे से आर्थिक मदद मिलने के बाद, मां अपना भरण-पोषण खुद करने में सक्षम हो जाती है। ऐसे में उसके पक्ष में किसी दूसरे व्यक्ति के खिलाफ गुजारा भत्ता देने का नया आदेश पारित नहीं किया जा सकता।
हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि गुजारे की जिम्मेदारी उठाने के लिए दो या उससे अधिक लोग कानूनी रूप से उत्तरदायी हैं और दावा करने वाला व्यक्ति अदालत पहुंचता है, तो यह तय करना कोर्ट का काम है कि किससे और कितनी रकम दिलाई जाए।
जस्टिस लक्ष्मीकांत शुक्ला की पीठ ने एक महिला की उस आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने पारिवारिक अदालत के आदेश में बदलाव की मांग की थी। पारिवारिक अदालत पहले ही महिला के सगे बेटे को हर महीने 8,000 रुपये का गुजारा भत्ता देने का निर्देश दे चुकी थी।
इसके बावजूद महिला चाहती थी कि अदालत उसके सौतेले बेटे को भी भरण-पोषण के लिए जवाबदेह ठहराए। महिला के वकील की दलील थी कि निचली अदालत ने केवल सगे बेटे पर भरण-पोषण का भार डालकर गलती की है। उनका तर्क था कि दोनों बेटों को मां का खर्च उठाने का आदेश दिया जाना चाहिए था।
वहीं, राज्य सरकार और सौतेले बेटे की ओर से पेश हुए वकील ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि जब सगा बेटा अपनी मां का खर्च उठाने में पूरी तरह सक्षम है और उसके पास पर्याप्त साधन हैं, तो सौतेले बेटे पर इसकी जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।
इन सभी दलीलों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने सीआरपीसी (CrPC) की धारा 125 का बारीकी से अवलोकन किया। कोर्ट ने कहा कि माता-पिता के भरण-पोषण के दावे पर विचार करते समय यह देखना जरूरी होता है कि क्या वे अपना खर्च खुद उठाने में असमर्थ हैं। इसके साथ ही यह भी जाचना होता है कि जिससे गुजारे भत्ते की मांग की जा रही है, क्या उसके पास पर्याप्त साधन मौजूद हैं।
अदालत ने इस तथ्य पर गौर किया कि याचिकाकर्ता एक बेटे की सगी मां और दूसरे की सौतेली मां है। जब उसने पहली बार भरण-पोषण का मुकदमा दायर किया था, तब वह अपना खर्च उठाने में असमर्थ रही होगी। इसी वजह से पारिवारिक अदालत ने उसके सगे बेटे को पैसे देने का आदेश दिया था।
उस आदेश के बाद हालात बदल गए। हाई कोर्ट ने कहा कि अब महिला अपने सगे बेटे से मिल रही राशि के जरिए अपना खर्च चलाने में पूरी तरह सक्षम है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कोर्ट द्वारा गुजारा भत्ता देने का आदेश पारित होते ही, किसी व्यक्ति की खुद को असहाय मानने की स्थिति समाप्त हो जाती है। जिसके पक्ष में एक बार भरण-पोषण का आदेश पारित हो चुका है, वह किसी दूसरे व्यक्ति से दोबारा वही मांग नहीं कर सकता।
मामले में कोई ठोस कानूनी आधार न पाते हुए हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। फैसले के अंत में अदालत ने यह सख्त टिप्पणी भी की कि यह याचिका बिना किसी कानूनी आधार के, केवल सौतेले बेटे को परेशान करने की नीयत से दाखिल की गई थी।
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