भोपाल। मध्य प्रदेश के औबेदुल्लागंज से बैतूल नेशनल हाइवे पर स्थित रातापानी अभयारण्य में निर्माणाधीन 12.38 किलोमीटर का वन्यजीव कॉरिडोर पर्यावरण संरक्षण और सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में उभर रहा है। इस कॉरिडोर का मुख्य उद्देश्य जंगल में रहने वाले वन्य प्राणियों को वाहनों के शोर और दुर्घटनाओं से बचाना है। इस परियोजना में रॉक वूल टेक्नोलॉजी से बनी साउंडप्रूफ दीवारें प्रमुख भूमिका निभा रही हैं, जो पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के साथ-साथ आधुनिक तकनीक का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करती हैं।
इस कॉरिडोर में साउंडप्रूफ वॉल बनाने के लिए रॉक वूल टेक्नोलॉजी का उपयोग किया गया है। रॉक वूल, जिसे खनिज ऊन भी कहा जाता है, पत्थरों को पिघलाकर और रेशों में बदलकर बनाया जाता है। इसका व्यापक उपयोग इमारतों में थर्मल इन्सुलेशन के लिए किया जाता है, लेकिन यहां इसे वाहनों के शोर को कम करने के लिए लगाया जा रहा है। यह 3 मीटर ऊंची दीवार पॉलीकार्बोनेट शीट से कवर की गई है, जो नॉइज बैरियर के रूप में कार्य करती है।
राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के अनुसार, इस परियोजना की कुल लागत 417 करोड़ रुपए है। दिसंबर 2024 के अंत तक कॉरिडोर का सड़क निर्माण कार्य पूरा होने की उम्मीद है, जबकि साउंडप्रूफ दीवार का काम जनवरी 2025 तक पूरा किया जाएगा। इस दीवार के निर्माण से वन्यजीवों और पर्यावरण को लंबे समय तक लाभ मिलने की संभावना है।
रातापानी अभयारण्य नर्मदा घाटी में स्थित एक समृद्ध जैव विविधता वाला क्षेत्र है। यहां बाघ, तेंदुआ, चिंकारा, सांभर, और कई अन्य दुर्लभ प्रजातियां निवास करती हैं। हाइवे के निर्माण के दौरान इन प्राणियों के प्राकृतिक आवास को न्यूनतम क्षति पहुंचाने के लिए यह कॉरिडोर बनाया जा रहा है।
नॉइज बैरियर का महत्व: वाहनों के शोर से वन्यजीवों का व्यवहार और प्रजनन चक्र प्रभावित होता है। साउंडप्रूफ वॉल इन प्रभावों को कम करके उन्हें शांतिपूर्ण वातावरण प्रदान करेगी।
हिट-एंड-रन घटनाओं में कमी: कॉरिडोर निर्माण से सड़क पर वन्यजीवों के दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनाएं भी कम होंगी।
साउंडप्रूफ वॉल में उपयोग किए गए इंसुलेशन मटेरियल और पॉलीकार्बोनेट शीट न केवल शोर अवशोषित करने में प्रभावी हैं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से टिकाऊ भी हैं।
ऊर्जा कुशलता: रॉक वूल थर्मल इन्सुलेशन में मददगार है, जिससे दीवारों की ऊर्जा दक्षता बढ़ती है।
लंबी उम्र: यह सामग्री टिकाऊ है और कठोर मौसम परिस्थितियों में भी प्रभावी रहती है।
हरित निर्माण: इस परियोजना में इस्तेमाल होने वाली सामग्री पर्यावरण के अनुकूल है, जो इसे अन्य सड़कों के लिए एक मॉडल बनाती है।
रातापानी अभयारण्य में इस प्रकार का कॉरिडोर बनाना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक उदाहरण है। यह परियोजना दिखाती है कि विकास और संरक्षण एक साथ संभव हैं।
बरकतउल्ला विश्वविद्यालय, भोपाल के पर्यावरण विभाग के प्रोफेसर विपिन व्यास ने द मूकनायक से बातचीत में बताया कि साउंडप्रूफ बॉल्स का उपयोग वन्यजीवों को हाईवे पर होने वाले शोर से बचाने के लिए एक सराहनीय कदम है। उन्होंने कहा कि तेज़ रफ्तार वाहनों से निकलने वाली ध्वनि न केवल वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित करती है, बल्कि उनके व्यवहार और प्रजनन प्रक्रिया पर भी नकारात्मक असर डालती है। ऐसे में साउंडप्रूफ तकनीक से उन्हें राहत मिल सकती है।
हालांकि, प्रोफेसर व्यास का मानना है कि तकनीकी समाधानों के साथ-साथ प्रकृति आधारित उपायों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पेड़ों की घनी हरियाली और बायोडायवर्सिटी कॉरिडोर जैसे उपाय वन्यजीवों को प्राकृतिक रूप से सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। इससे न केवल शोर का प्रभाव कम होगा, बल्कि वन्यजीवों का पर्यावरण से सामंजस्य भी बना रहेगा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए नीतिगत स्तर पर ठोस कदम उठाए जाने चाहिए।
रातापानी अभयारण्य का यह साउंडप्रूफ कॉरिडोर अन्य अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों में ऐसी परियोजनाओं के लिए प्रेरणा बनेगा। इसके सफल कार्यान्वयन से यह सिद्ध होगा कि आधुनिक तकनीक का उपयोग पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास में सहायक हो सकता है। साउंडप्रूफ ऐसे जंगलों के हाइवे पर लगाएं जाएंगे जहां दुर्लभ प्रजाति के वन्यप्राणी हों।
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