भोपाल की हरियाली बचाने पर NGT सख्त, अतिक्रमण हटाने और पेड़ लगाने के आदेश

तीन महीने में ग्रीन बेल्ट की जमीन से कब्जे हटाने के निर्देश, GIS मैपिंग से होगी पेड़ों और वन क्षेत्र की पहचान
भोपाल की हरियाली बचाने पर NGT सख्त, अतिक्रमण हटाने और पेड़ लगाने के आदेश
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भोपाल। राजधानी भोपाल के ग्रीन एरिया और सड़कों के किनारे लगातार घट रही हरियाली को लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने कड़ा रुख अपनाया है। ट्रिब्यूनल ने शहर की ग्रीन बेल्ट और दर्ज वन भूमि की वैज्ञानिक तरीके से पहचान करने, अतिक्रमण हटाने और भविष्य की हरियाली के लिए ठोस योजना बनाने के निर्देश दिए हैं।

एनजीटी ने कहा है कि शहर में मौजूद वन भूमि और ग्रीन एरिया का हाई-रिजोल्यूशन GIS सर्वे कराया जाए। इसके साथ ही सड़क किनारे लगे पेड़ों की गिनती कर उनकी प्रजातियों का रिकॉर्ड तैयार किया जाए। कोर्ट ने अतिक्रमण वाले क्षेत्रों की पहचान कर तीन महीने के भीतर कार्रवाई करने और उसकी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश भी दिए हैं।

यह आदेश डॉ. सुभाष चंद्र पांडे की ओर से भोपाल नगर निगम और अन्य के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के बाद दिया गया।

सेंट्रल वर्ज और सड़क किनारे की हरियाली पर उठे सवाल

याचिका में भोपाल की सड़कों के दोनों किनारों और बीच में बने सेंट्रल वर्ज की हरियाली को नुकसान पहुंचने का मुद्दा उठाया गया था। आरोप था कि कई स्थानों पर पार्किंग और अन्य गतिविधियों के लिए पेड़ों को हटाया गया और ग्रीन एरिया पर कब्जे किए गए।

याचिकाकर्ता के मुताबिक, मामले में 1200 से अधिक कथित अतिक्रमणकारियों का उल्लेख किया गया था। इनमें राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोगों के अलावा कुछ बड़े संस्थानों और कारोबारियों के नाम भी शामिल होने की बात कही गई।

सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी सामने आया कि ग्रीन एरिया के संरक्षण से जुड़े निर्देशों का जमीनी स्तर पर अपेक्षित तरीके से पालन नहीं हो रहा है। इसके बाद एनजीटी ने संबंधित विभागों को समयबद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए।

सिर्फ पौधे लगाना नहीं, 15 साल तक करनी होगी निगरानी

एनजीटी ने वृक्षारोपण को लेकर भी विस्तृत दिशा-निर्देश दिए हैं। वन विभाग को स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल देसी प्रजातियों के पेड़ लगाने को कहा गया है। ऐसे पौधों को प्राथमिकता देने की बात कही गई है, जो कम पानी में भी जीवित रह सकें और स्थानीय मौसम के अनुकूल हों।

कोर्ट ने संकटग्रस्त और स्थानीय प्रजातियों की पहचान कर उनके संरक्षण और रोपण की योजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं। नगर निगम क्षेत्र में लगाए जाने वाले पौधों की निगरानी वन विभाग और नगर निगम को 15 साल तक करनी होगी, ताकि पौधारोपण केवल कागजों तक सीमित न रह जाए और पौधों के जीवित रहने की जिम्मेदारी भी तय हो।

GIS मैपिंग से खुलेगा ग्रीन एरिया का पूरा रिकॉर्ड

शहर में पेड़ों और ग्रीन बेल्ट की स्थिति जानने के लिए GIS तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। पेड़ों की गणना के साथ उनकी प्रजातियों की जानकारी भी जुटाई जाएगी। इसके जरिए यह पता लगाया जाएगा कि शहर में कितनी वन भूमि और हरित जमीन मौजूद है और किन इलाकों में अतिक्रमण या निर्माण के कारण उसका स्वरूप बदल चुका है।

एनजीटी ने ग्रीन बेल्ट की सीमाओं और अतिक्रमण की पहचान के लिए जमीन पर वास्तविक सत्यापन यानी ग्राउंड ट्रूथिंग के बाद हाई-रिजोल्यूशन सैटेलाइट इमेजरी और ड्रोन सर्वे जैसी तकनीकों का उपयोग करने के निर्देश दिए हैं।

कब्जे हटाकर फिर से विकसित होगी हरियाली

सड़क किनारे और सेंट्रल वर्ज में हुए अतिक्रमण को हटाने के बाद संबंधित क्षेत्रों की फेंसिंग की जाएगी। इसके बाद वहां दोबारा वृक्षारोपण और हरित क्षेत्र विकसित करने की योजना बनाई जाएगी।

एनजीटी ने यह भी स्पष्ट किया है कि शहर के ग्रीन बेल्ट क्षेत्र में अनावश्यक कंक्रीट निर्माण नहीं होना चाहिए। इन इलाकों को शहर के पर्यावरणीय संतुलन के लिए सुरक्षित रखना जरूरी है।

कोर्ट ने ग्रीन बेल्ट को स्थानीय लोगों के लिए शहर के “फेफड़ों” के रूप में संरक्षित रखने की बात कही है। तेजी से फैलते कंक्रीट के बीच इन क्षेत्रों को केवल खाली जमीन मानकर अन्य निर्माण कार्यों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

सरकारी जमीन पर भी बनेंगे छोटे शहरी वन

एनजीटी के निर्देश के मुताबिक, शहर में सरकारी विभागों के 200 वर्ग मीटर से अधिक खाली भूखंडों का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा मियावाकी पद्धति से हरित क्षेत्र विकसित करने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

इस पद्धति के जरिए कम जगह में घने और बहु-प्रजातीय शहरी वन विकसित किए जाते हैं। इससे शहर के भीतर छोटे-छोटे क्षेत्रों में भी हरियाली बढ़ाने की संभावना बनेगी।

बड़ी परियोजनाओं में पेड़ कटाई पर होगी अतिरिक्त निगरानी

कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी विकास परियोजना के लिए राज्य सरकार की तय सीमा से अधिक पेड़ों को काटने की जरूरत पड़ती है, तो ऐसे मामले को राज्य स्तर पर गठित उच्चस्तरीय केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति के पास भेजा जा सकता है।

इससे बड़े निर्माण और विकास कार्यों के दौरान होने वाली व्यापक पेड़ कटाई की अलग से समीक्षा की जा सकेगी।

तीन महीने में देनी होगी कार्रवाई की रिपोर्ट

एनजीटी ने राज्य के मुख्य सचिव, वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, पीसीसीएफ और हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स को ग्रीन एरिया और वन भूमि पर हुए अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं।

तीन महीने बाद कोर्ट के सामने विस्तृत रिपोर्ट पेश करनी होगी। इसमें वन क्षेत्र का कुल रकबा, वन आवरण, अतिक्रमण की स्थिति, कब्जे हटाने के लिए की गई कार्रवाई और वास्तविक रूप से मुक्त कराई गई जमीन का ब्योरा देना होगा।

रिपोर्ट में यह भी बताना होगा कि संबंधित क्षेत्रों में अब तक वन क्षेत्र को कितना नुकसान हुआ है।

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