
भोपाल। मध्य प्रदेश की जीवनदायिनी और ‘गंगा’ कही जाने वाली आज गंभीर जल संकट का सामना कर रही है। राजधानी से करीब 25 किलोमीटर दूर रायसेन जिले के झिरी गांव में स्थित इसका उद्गम स्थल पूरी तरह सूख चुका है। गोमुख से पिछले छह महीनों से पानी नहीं निकल रहा है। यही बेतवा नदी आगे चलकर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के करीब 10 जिलों से गुजरती हुई यमुना और फिर गंगा में मिलती है। कभी बारहमासी मानी जाने वाली यह नदी अब बारिश के कुछ महीनों बाद ही सूखने लगी है, जिसने पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों की चिंता बढ़ा दी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी नदी का उद्गम लगातार दूसरे वर्ष सूखना केवल एक स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि पूरे कैचमेंट क्षेत्र की जल प्रणाली के विफल होने का संकेत है। यही कारण है कि अब बेतवा को पुनर्जीवित करने के लिए व्यापक स्तर पर अभियान शुरू किया गया है।
‘ऑपरेशन चेक डैम’ के जरिए नदी बचाने की कोशिश
बेतवा नदी को बचाने के लिए रिटायर्ड आयकर अधिकारी आरके पालीवाल के नेतृत्व में ‘ऑपरेशन चेक डैम’ नाम से जनअभियान चलाया जा रहा है। बीते सात दिनों में भोपाल, इंदौर, रायसेन, विदिशा और राजगढ़ सहित कई जिलों से पहुंचे पर्यावरणविदों, वकीलों, विद्यार्थियों और स्थानीय ग्रामीणों ने श्रमदान कर 85 नए चेक डैम बनाए हैं। इसके अलावा पिछले वर्ष बनाए गए 55 चेक डैम को व्यवस्थित और मजबूत किया गया है।
इन चेक डैम का उद्देश्य बारिश के पानी को रोकना और उसे जमीन में रिसने देना है, ताकि भूजल स्तर बढ़ सके और उद्गम स्थल तक पानी की प्राकृतिक आपूर्ति दोबारा शुरू हो सके। अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि बारिश का पानी स्थानीय स्तर पर रोका गया तो आने वाले वर्षों में गोमुख फिर से प्रवाहित हो सकता है।
आठ फीट मलबे में दबा था पार्वती कुंड
अभियान के दौरान बेतवा क्षेत्र के सबसे ऊंचे जल स्रोतों में शामिल पार्वती कुंड को भी पुनर्जीवित किया गया। आरके पालीवाल के अनुसार यह कुंड करीब आठ फीट मलबे में दब चुका था और पूरी तरह बंद हो गया था। लगातार श्रमदान और सफाई के बाद इसे फिर से खोला गया है।
अब इस कुंड में पानी जमा होने लगा है और आसपास के वन्यजीव यहां प्यास बुझाने पहुंच रहे हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे प्राकृतिक जल स्रोतों का संरक्षण ही किसी नदी को जीवित रखने का सबसे महत्वपूर्ण आधार होता है।
जंगल खत्म हुए, खेती बढ़ी और सूखने लगी नदी
विशेषज्ञों के अनुसार बेतवा नदी के सूखने का सबसे बड़ा कारण कैचमेंट क्षेत्र में तेजी से हुए भू-उपयोग परिवर्तन हैं। झिरी और उसके आसपास का इलाका कुछ वर्ष पहले तक घने जंगलों से आच्छादित था, लेकिन अब वहां बड़े पैमाने पर खेती होने लगी है। जंगल खत्म होने से बारिश का पानी जमीन में कम रिस रहा है और भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया प्रभावित हुई है।
झिरी और उससे लगे बेहड़ा गांव सहित आसपास के क्षेत्र में लगभग एक हजार एकड़ में गेहूं और धान की खेती की जा रही है। इन फसलों की सिंचाई के लिए बड़े पैमाने पर भूजल का उपयोग हो रहा है। पेयजल की जरूरतें भी इसी भूजल पर निर्भर हैं। लगातार बढ़ते दोहन ने उस प्राकृतिक जल प्रणाली को कमजोर कर दिया है, जिस पर बेतवा का उद्गम निर्भर था।
प्राकृतिक जलस्रोतों में लगे मोटर पंप, रास्ते में ही खींचा जा रहा पानी
गोमुखी के आसपास कई छोटे प्राकृतिक जलस्रोत मौजूद हैं, जो पहले धीरे-धीरे रिसकर उद्गम स्थल तक पानी पहुंचाते थे। लेकिन अब इन स्रोतों को गहरा कर उनमें मोटर पंप लगा दिए गए हैं और उनका उपयोग ट्यूबवेल की तरह किया जा रहा है।
स्थिति यह हो गई है कि जो पानी पहले प्राकृतिक रूप से बहकर बेतवा उद्गम तक पहुंचता था, उसे रास्ते में ही निकाल लिया जा रहा है। इसी संकट को देखते हुए पिछले दो वर्षों में कुल 135 चेक डैम बनाए गए हैं, ताकि अधिक से अधिक पानी को रोका जा सके और भूजल पुनर्भरण बढ़ाया जा सके।
पहले की 200 किलोमीटर यात्रा, अब नदी बचाने की मुहिम
आरके पालीवाल ने बताया कि बेतवा का संकट केवल उद्गम स्थल तक सीमित नहीं है, बल्कि आगे का नदी क्षेत्र भी कई स्थानों पर सूख चुका है। इसी को समझने के लिए फरवरी 2023 में देशभर के पर्यावरणविदों के साथ बेतवा नदी की करीब 200 किलोमीटर लंबी यात्रा निकाली गई थी।
इस यात्रा के दौरान नदी के सूखने के कारणों का अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि अनियंत्रित भूजल दोहन, जंगलों की कटाई, जलस्रोतों पर अतिक्रमण और वर्षाजल संरक्षण की कमी ने नदी को संकट में डाल दिया है। पालीवाल का कहना है कि बेतवा केवल एक नदी नहीं, बल्कि मध्य भारत की सांस्कृतिक और पर्यावरणीय धरोहर है। पुराणों में भी इसका उल्लेख मिलता है और यह लाखों लोगों के जीवन से जुड़ी हुई है।
जनभागीदारी से ही बचेगी बेतवा
पर्यावरणविदों का मानना है कि केवल सरकारी योजनाओं से नदियों को बचाना संभव नहीं है। स्थानीय समुदाय, विद्यार्थियों, सामाजिक संगठनों और प्रशासन की साझेदारी से ही जल संरक्षण के स्थायी परिणाम मिल सकते हैं। बेतवा के उद्गम स्थल पर चल रहा श्रमदान अभियान इसी जनभागीदारी का उदाहरण बनकर सामने आया है।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.
‘द मूकनायक’ जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है. अगर आप भी चाहते हैं कि ‘द मूकनायक’ हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहे तो सपोर्ट करें.
यहां सपोर्ट करें