
भोपाल। मध्य प्रदेश के तालाबों, झीलों और वेटलैंड को अतिक्रमण और प्रदूषण से बचाने के लिए अब केवल सरकारी रिकॉर्ड और कागजी सीमांकन के भरोसे काम नहीं चलेगा। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने प्रदेश के वेटलैंड संरक्षण को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए जमीन पर स्पष्ट सीमाएं तय करने और उनका भौतिक रूप से सीमांकन करने के निर्देश दिए हैं। प्रदेश में चिह्नित 13,565 वेटलैंड का छह महीने के भीतर जमीन पर सीमांकन कर मुनार लगाने को कहा गया है, ताकि वेटलैंड की वास्तविक सीमा स्पष्ट रूप से दिखाई दे और उसके भीतर अथवा आसपास होने वाले अवैध निर्माण और अतिक्रमण पर प्रभावी तरीके से रोक लगाई जा सके।
एनजीटी ने यह भी स्पष्ट किया है कि वेटलैंड के हाई फ्लड लेवल (HFL) से 50 मीटर के दायरे में निर्माण की अनुमति नहीं होगी। यदि इस क्षेत्र में अवैध निर्माण या अतिक्रमण पाया जाता है तो संबंधित प्रशासन को तय समयसीमा में कार्रवाई करनी होगी। खास बात यह है कि वेटलैंड की सुरक्षा में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाएगी। यदि अधिकारियों की जानकारी में आने के बाद भी अतिक्रमण या अवैध निर्माण नहीं हटाया गया तो संबंधित अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
वेटलैंड में निर्माण, मलबा और प्रदूषित पानी डालने पर सख्ती
एनजीटी ने वेटलैंड के संरक्षण को लेकर प्रतिबंधित गतिविधियों को भी स्पष्ट किया है। वेटलैंड क्षेत्र में गैर-वेटलैंड उपयोग, अतिक्रमण, उद्योगों की स्थापना, निर्माण या विध्वंस का मलबा डालना, मिट्टी और रेत भरना तथा ठोस कचरा डालना प्रतिबंधित रहेगा। इसके अलावा बिना उपचारित सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट को वेटलैंड में छोड़ना भी प्रतिबंधित रहेगा।
अधिकरण ने राज्य वेटलैंड अथॉरिटी को इन निर्देशों के पालन की हर महीने निगरानी करने के लिए कहा है। वहीं प्रदेश के मुख्य सचिव को सभी संबंधित विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर वेटलैंड संरक्षण के लिए प्रदेशव्यापी रोडमैप तैयार कराने के निर्देश दिए गए हैं। इसका उद्देश्य अलग-अलग विभागों की जिम्मेदारियों को स्पष्ट करना और वेटलैंड संरक्षण के मामलों में विभागीय तालमेल की कमी के कारण होने वाली देरी को रोकना है।
बड़े तालाब का फिर से होगा सीमांकन, 15 दिन में वैज्ञानिक सर्वे
राशिद नूर खान और आर्या श्रीवास्तव की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान एनजीटी ने भोपाल के बड़े तालाब को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। अधिकरण ने बड़े तालाब की फुल टैंक लेवल (FTL) की वास्तविक सीमा निर्धारित करने के लिए नए सिरे से वैज्ञानिक सर्वे कराने को कहा है। इसके लिए ड्रोन सर्वे, सैटेलाइट इमेजरी, रिमोट सेंसिंग, जियो-टैगिंग और ग्राउंड ट्रुथिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा।
एनजीटी के निर्देश के मुताबिक वास्तविक जलभराव क्षेत्र की वैज्ञानिक तरीके से जांच कर 15 दिन के भीतर रिपोर्ट तैयार करनी होगी। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि बड़े तालाब की वास्तविक एफटीएल सीमा कहां तक है और उसके आधार पर किन क्षेत्रों को संरक्षित किया जाना चाहिए।
एफटीएल तय होने तक भदभदा डैम के गेट खोलने पर रोक
बड़े तालाब से जुड़े मामले में एनजीटी ने भदभदा डैम को लेकर भी अहम निर्देश दिए हैं। अधिकरण ने कहा है कि जब तक बड़े तालाब का पानी एफटीएल से ऊपर नहीं पहुंचता, तब तक भदभदा के गेट नहीं खोले जाएंगे। इस निर्देश का संबंध बड़े तालाब के जलस्तर और उसकी वास्तविक एफटीएल सीमा को लेकर चल रही प्रक्रिया से है।
बड़े तालाब और छोटे तालाब के एफटीएल क्षेत्र को लेकर भी निर्माण पर सख्ती की गई है। निर्देशों के अनुसार शहर की ओर एफटीएल से 50 मीटर और ग्रामीण क्षेत्र की ओर 250 मीटर तक निर्माण पर रोक रहेगी। वहीं पहले से मौजूद अवैध निर्माण और कब्जों के खिलाफ प्रशासन को तीन महीने के भीतर कार्रवाई करनी होगी।
अपर लेक कैचमेंट में 227 अतिक्रमण चिह्नित
सुनवाई के दौरान भदभदा के पास अपर लेक कैचमेंट क्षेत्र में 227 अतिक्रमण चिह्नित होने की जानकारी भी सामने आई। इनमें से कुछ अतिक्रमण हटाए जाने की बात प्रशासन की ओर से बताई गई, जबकि शेष अतिक्रमणों को हटाने के लिए समय मांगा गया है। एनजीटी ने अवैध निर्माण और कब्जे के मामलों में प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर स्पष्ट किया कि जानकारी मिलने के बाद कार्रवाई में अनावश्यक देरी को गंभीरता से लिया जाएगा।
अधिकरण ने यह भी कहा कि यदि किसी एक विभाग को कार्रवाई के लिए दूसरे विभाग से सहयोग की जरूरत है और वह सहयोग मांगता है, तो संबंधित विभाग को तत्काल सहायता उपलब्ध करानी होगी। विभागों के बीच पत्राचार और जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डालने के कारण कार्रवाई में देरी को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सरकारी जमीन पर कब्जा मिला तो अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होगी
एनजीटी ने सरकारी जमीन या वेटलैंड क्षेत्र पर अवैध कब्जे के मामलों में अधिकारियों की जवाबदेही को भी महत्वपूर्ण माना है। यदि किसी अधिकारी की जानकारी में सरकारी जमीन या वेटलैंड पर अवैध कब्जा बना रहता है और कार्रवाई नहीं होती है, तो परिस्थितियों के आधार पर संबंधित अधिकारी की मिलीभगत या लापरवाही की जिम्मेदारी तय की जा सकती है। ऐसे मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
इससे वेटलैंड संरक्षण से जुड़े अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन पर यह जिम्मेदारी बढ़ गई है कि वे केवल रिकॉर्ड में सीमांकन और अतिक्रमण की जानकारी दर्ज करने के बजाय जमीन पर वास्तविक स्थिति की निगरानी करें और समय पर कार्रवाई सुनिश्चित करें।
बड़ी झील की एफटीएल और एफआरएल पर 15 दिन में रिपोर्ट
पर्यावरणविद् डॉ. सुभाष सी. पांडेय की याचिका पर सुनवाई के दौरान एनजीटी ने भोज वेटलैंड, केरवा और कलियासोत की एफटीएल और एफआरएल को अंतिम रूप देने के लिए सात सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। समिति को अपनी रिपोर्ट 15 दिन में प्रस्तुत करनी होगी।
समिति वास्तविक जलभराव क्षेत्र और जलस्तर से जुड़े तथ्यों की जांच के लिए ड्रोन सर्वे, सैटेलाइट इमेजरी, रिमोट सेंसिंग और जियो-टैगिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करेगी। इससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि जल निकायों की वास्तविक सीमा और उनके संरक्षण क्षेत्र को वैज्ञानिक आधार पर किस तरह निर्धारित किया जाए।
झील में गिरने वाले हर नाले पर लगेंगे कैमरे और डिजिटल फ्लो मीटर
बड़े तालाब और छोटे तालाब में सीवेज पहुंचने की समस्या पर भी एनजीटी ने सख्त निर्देश दिए हैं। नितिन सक्सेना की याचिका पर सुनवाई के दौरान अधिकरण ने झीलों में सीवेज पहुंचाने वाले हर नाले के आउटफॉल पर PTZ कैमरे और डिजिटल फ्लो मीटर लगाने के निर्देश दिए हैं।
इन कैमरों और डिजिटल मीटर के माध्यम से नालों से झील में पहुंचने वाले पानी की निगरानी और रिकॉर्डिंग की जा सकेगी। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि किस नाले से कितना पानी या सीवेज झील में पहुंच रहा है और उसे रोकने या उपचारित करने के लिए क्या कार्रवाई की गई है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को तीन सप्ताह में देना होगा पूरा हिसाब
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को तीन सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत कर यह बताना होगा कि बड़े और छोटे तालाब में कितने नाले सीवेज छोड़ रहे हैं, कुल कितना सीवेज पैदा हो रहा है, उसमें से कितना सीवेज इंटरसेप्ट किया जा रहा है और कितना ट्रीट किया जा रहा है।
एनजीटी ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि बिना उपचारित सीवेज या औद्योगिक अपशिष्ट को वेटलैंड में छोड़ा जाता है तो राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को संबंधित जिम्मेदार पक्ष से पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति वसूलनी होगी। इस व्यवस्था से झीलों में प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों की पहचान और उनके खिलाफ कार्रवाई का रास्ता और स्पष्ट होगा।
2.25 हेक्टेयर से बड़े जलस्रोत वेटलैंड के दायरे में
एनजीटी ने वेटलैंड की पहचान को लेकर भी महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की है। अधिकरण ने कहा कि किसी जलस्रोत को केवल डैम या रिजर्वायर नाम देने से उस पर वेटलैंड से जुड़े संरक्षण नियम लागू होने से बचा नहीं जा सकता। 2.25 हेक्टेयर से बड़े जल निकाय वेटलैंड के दायरे में आएंगे।
इसका मतलब यह है कि जलस्रोत की पहचान केवल उसके नाम या प्रशासनिक वर्गीकरण के आधार पर नहीं होगी, बल्कि उसके वास्तविक स्वरूप और क्षेत्रफल को भी ध्यान में रखा जाएगा। इससे छोटे-बड़े जलस्रोतों को वेटलैंड संरक्षण व्यवस्था के दायरे में लाने की प्रक्रिया अधिक व्यापक हो सकती है।
हर जिले में वेटलैंड की निगरानी, वेबसाइट पर शिकायत की सुविधा
एनजीटी ने सभी जिलों में कलेक्टर की अध्यक्षता वाली जिला वेटलैंड संरक्षण समितियों को सक्रिय भूमिका निभाने के निर्देश दिए हैं। इन समितियों को अपने-अपने जिलों में जलस्रोतों और वेटलैंड की पहचान, संरक्षण और नियमित निगरानी करनी होगी।
इसके साथ ही जिला प्रशासन की वेबसाइट पर वेटलैंड की सूची उपलब्ध कराने और अतिक्रमण या अवैध निर्माण की शिकायत दर्ज करने के लिए यूजर-फ्रेंडली व्यवस्था विकसित करने के निर्देश भी दिए गए हैं। इससे आम लोग भी वेटलैंड क्षेत्र में होने वाले अवैध कब्जे या निर्माण की जानकारी प्रशासन तक पहुंचा सकेंगे।
अब कागजों से बाहर आएगा वेटलैंड संरक्षण
एनजीटी के इन निर्देशों का सबसे अहम पहलू यह है कि वेटलैंड संरक्षण की व्यवस्था को केवल सरकारी रिकॉर्ड और कागजी सीमांकन तक सीमित नहीं रखा जाएगा। जमीन पर मुनार, वैज्ञानिक सर्वे, ड्रोन और सैटेलाइट इमेजरी से निगरानी, सीवेज आउटफॉल पर कैमरे और डिजिटल मीटर तथा अधिकारियों की जवाबदेही तय करने जैसी व्यवस्थाओं के जरिए जलस्रोतों की वास्तविक स्थिति पर निगरानी बढ़ाने की कोशिश की गई है।
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