
भोपाल। मध्यप्रदेश के जबलपुर में निजी स्कूलों द्वारा मनमानी फीस वसूली और किताबों में कमीशनखोरी के बहुचर्चित मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और सख्त फैसला सुनाते हुए आरोपियों को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने निजी स्कूल संचालकों, प्रिंसिपल्स, बुक सेलर्स और पब्लिशर्स की ओर से दायर उन सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें एफआईआर रद्द करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मामले में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर हैं और उपलब्ध साक्ष्य इन आरोपों को समर्थन देते हैं, इसलिए इस स्तर पर हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा। अदालत ने यह भी दोहराया कि साक्ष्यों की गहन जांच और दोष तय करना ट्रायल कोर्ट का कार्यक्षेत्र है।
मंगलवार को इस मामले की सुनवाई जस्टिस बीपी शर्मा की एकलपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से प्रस्तुत पक्ष में बताया गया कि कई निजी स्कूलों ने फीस वृद्धि के तय मानकों का खुला उल्लंघन किया। कई मामलों में फीस में 50 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी की गई, जो नियमों के विपरीत है। इसके अलावा, छात्रों और उनके अभिभावकों को बाध्य किया गया कि वे केवल निर्धारित दुकानों से ही किताबें और अन्य शैक्षणिक सामग्री खरीदें। यह न केवल अभिभावकों की स्वतंत्रता का हनन था, बल्कि एक सुनियोजित आर्थिक दबाव की रणनीति भी थी।
इस पूरे प्रकरण की जड़ें लगभग दो वर्ष पूर्व जिला प्रशासन द्वारा की गई विस्तृत जांच में सामने आई थीं। जांच रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ कि स्कूल प्रबंधन, बुक सेलर्स और पब्लिशर्स के बीच एक संगठित गठजोड़ सक्रिय था। इस गठजोड़ के तहत किताबों की सप्लाई को नियंत्रित किया गया और बाजार में एक तरह की मोनोपोलिस्टिक व्यवस्था खड़ी कर दी गई।
अभिभावकों को खुले बाजार से किताबें खरीदने की अनुमति नहीं थी, बल्कि उन्हें विशेष दुकानों से ही महंगी दरों पर किताबें खरीदने के लिए मजबूर किया जाता था।
जांच में यह भी सामने आया कि कई किताबों पर डुप्लीकेट या संदिग्ध ISBN नंबर दर्ज थे, जो इस बात का संकेत देते हैं कि किताबों की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठते हैं। इससे यह संदेह और मजबूत हुआ कि इस पूरे नेटवर्क के जरिए अवैध तरीके से आर्थिक लाभ कमाया जा रहा था। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि जब दस्तावेजी साक्ष्य, जब्त सामग्री और गवाहों के बयान इस प्रकार की गतिविधियों की ओर इशारा कर रहे हों, तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जिला प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर जबलपुर के विभिन्न थाना क्षेत्रों- ओमती, बेलबाग, संजीवनी नगर, ग्वारीघाट और गोराबाजार में अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई थीं। इन एफआईआर को चुनौती देते हुए संबंधित स्कूलों के प्रिंसिपल, प्रबंधन और बुक सेलर्स ने हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की थीं। कुल 13 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सभी को खारिज कर दिया और कहा कि इस स्तर पर एफआईआर को रद्द करना न्यायसंगत नहीं होगा।
मामले में जिन लोगों के नाम सामने आए हैं, उनमें जबलपुर और कटनी के कई मिशनरी स्कूलों के प्रिंसिपल और प्रबंधन से जुड़े लोग शामिल हैं। प्रमुख नामों में अतुल अनुपम इब्राहम, लवी मैथ्यू, एकता पीटर्स, सेवानिवृत्त प्रिंसिपल चंद्रशेखर विश्वकर्मा के साथ-साथ चिल्ड्रन्स बुक हाउस के संचालक सूर्यप्रकाश वर्मा और शशांक श्रीवास्तव शामिल हैं। इन सभी पर आरोप है कि इन्होंने मिलकर एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया, जिसके माध्यम से किताबों की कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ाया गया और अभिभावकों से अत्यधिक राशि वसूली गई।
अदालत ने अपने आदेश में विशेष रूप से यह टिप्पणी की कि यह मामला केवल फीस वृद्धि या प्रशासनिक अनियमितता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आपराधिक षड्यंत्र के स्पष्ट संकेत दिखाई देते हैं। कोर्ट के अनुसार, स्कूलों, बुक सेलर्स और पब्लिशर्स के बीच समन्वित तरीके से काम करते हुए एक ऐसा सप्लाई सिस्टम तैयार किया गया, जिसने प्रतिस्पर्धा को समाप्त कर दिया और अभिभावकों को मजबूरन महंगी किताबें खरीदनी पड़ीं। इससे न केवल आर्थिक शोषण हुआ, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हुए।
हाईकोर्ट ने एसपी जबलपुर को निर्देश दिए हैं कि मामले की लंबित जांच को शीघ्र पूरा किया जाए और सभी तथ्यों को समुचित तरीके से एकत्र कर ट्रायल कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट इस मामले की निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई सुनिश्चित करे, ताकि दोषियों की जवाबदेही तय की जा सके।
यह उल्लेखनीय है कि इस मामले में आरोपियों को पहले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल चुकी है, लेकिन एफआईआर रद्द कराने की उनकी कोशिश अब विफल हो गई है। राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता दिनेश प्रसाद पटेल ने इस कार्रवाई को पूरी तरह वैध और आवश्यक बताया, जिसे अदालत ने स्वीकार किया।
विधि विशेषज्ञ अधिवक्ता मयंक सिंह ने द मूकनायक से बातचीत में कहा कि हाईकोर्ट का यह फैसला साफ संकेत देता है कि अगर किसी मामले में शुरुआती जांच में ही गंभीर गड़बड़ी और सबूत मिलते हैं, तो उसे सिर्फ तकनीकी आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि एफआईआर रद्द करना असाधारण स्थिति में ही होता है, लेकिन यहां जिस तरह फीस वसूली, किताबों की जबरन बिक्री और मिलीभगत के आरोप सामने आए हैं, उसमें जांच और ट्रायल जरूरी है ताकि सच्चाई सामने आ सके।
उन्होंने आगे कहा कि अगर स्कूल, बुक सेलर्स और पब्लिशर्स मिलकर अभिभावकों पर दबाव बनाते हैं और आर्थिक फायदा कमाते हैं, तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि आपराधिक कृत्य भी हो सकता है। ऐसे मामलों में कोर्ट का सख्त रुख जरूरी है, ताकि शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता बनी रहे और भविष्य में इस तरह की मनमानी पर रोक लग सके।
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