उत्तर प्रदेश: बलरामपुर जिले में बेसिक शिक्षा विभाग ने एक बड़ा और सख्त कदम उठाया है। अब जिले के सभी सरकारी और परिषदीय स्कूलों में बिना अनुमति किसी भी बाहरी व्यक्ति, यूट्यूबर या सोशल मीडिया क्रिएटर्स के प्रवेश पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। इस फैसले के बाद से जहां एक तरफ प्रशासन इसे पढ़ाई के माहौल को बचाने की कोशिश बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ नागरिक समाज ने पारदर्शिता को लेकर गंभीर चिंताएं जाहिर की हैं।
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी विकास चंद्र श्रीवास्तव ने 17 अगस्त को यह सख्त निर्देश जारी किया। दरअसल, विभाग को लगातार ऐसी शिकायतें मिल रही थीं कि कुछ लोग बिना किसी पूर्व अनुमति के स्कूलों में घुसकर वहां के परिसर और शिक्षकों की तस्वीरें या वीडियो बना रहे हैं। इन वीडियो को बाद में सोशल मीडिया पर डाला जा रहा था, जिससे स्कूल का सामान्य कामकाज प्रभावित हो रहा था।
अधिकारियों का मानना है कि इस तरह की गतिविधियों से न केवल बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही थी, बल्कि शिक्षकों की गरिमा को भी ठेस पहुंच रही थी। इसके अलावा, इससे विभाग की छवि पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा था। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि छात्रों की सुरक्षा और उनके हितों को सर्वोपरि रखते हुए इस पाबंदी को तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है।
अब शिक्षकों को यह साफ निर्देश दिया गया है कि वे बिना सक्षम अधिकारी की मंजूरी के किसी भी बाहरी व्यक्ति या सोशल मीडिया से जुड़े लोगों को वीडियोग्राफी या फोटोग्राफी न करने दें। शिक्षा विभाग ने यह भी साफ किया है कि स्कूलों की निगरानी के लिए पहले से ही एक मजबूत विभागीय व्यवस्था लागू है।
जिले और ब्लॉक स्तर के नामित अधिकारी नियमित रूप से इन परिषदीय स्कूलों का निरीक्षण करते हैं। विभाग ने तय किया है कि निरीक्षण के लिए आने वाले इन अधिकृत अधिकारियों को भी अब स्कूल के विजिटर रजिस्टर में अपनी उपस्थिति अनिवार्य रूप से दर्ज करनी होगी।
इस नए फरमान का कई शिक्षाविदों ने कड़ा विरोध किया है। मां पाटेश्वरी विश्वविद्यालय के पूर्व डीन राजेश कुमार सिंह ने इस आदेश को पूरी तरह से 'तानाशाही' करार दिया। उनका तर्क है कि सरकारी मिड-डे मील योजना के तहत बच्चों को सही खाना मिल रहा है या नहीं, और उन्हें कैसी शिक्षा दी जा रही है, यह जांचने के लिए सार्वजनिक निगरानी बेहद जरूरी है।
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के पूर्व अध्यक्ष अरविंद कुमार द्विवेदी ने भी इस फैसले पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि सामुदायिक निगरानी से ही यह तय होता है कि शिक्षक नियमित रूप से स्कूल आ रहे हैं या बच्चों को किसी तरह की परेशानी का सामना तो नहीं करना पड़ रहा है।
द्विवेदी का मानना है कि इसी निगरानी से बच्चों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने और स्कूल की जर्जर या असुरक्षित इमारतों का खुलासा हो पाता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रशासन जितनी अधिक पारदर्शिता अपनाएगा, जनता का सरकारी व्यवस्था पर भरोसा उतना ही मजबूत होगा।
इस पूरे विवाद पर सामाजिक कार्यकर्ता देवेश चंद्र श्रीवास्तव ने एक संतुलित राय रखी। उन्होंने पढ़ाई में बाधा डालने वाले बाहरी तत्वों पर रोक लगाने के फैसले का तो समर्थन किया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि स्कूलों में अभिभावकों की पहुंच को किसी भी कीमत पर सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
उन्होंने सुझाव दिया कि हर एक या दो महीने में प्रधानाचार्यों और शिक्षकों को अभिभावकों के साथ अनिवार्य रूप से बैठक करनी चाहिए। इससे बच्चों की शैक्षणिक प्रगति पर चर्चा हो सकेगी और अभिभावकों की चिंताओं का भी समाधान किया जा सकेगा।
इन तमाम आलोचनाओं के बावजूद, जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी अपने फैसले का बचाव करते नजर आए। उनका स्पष्ट रूप से यही कहना है कि अनधिकृत लोगों के स्कूल में आने से पठन-पाठन का माहौल बुरी तरह बिगड़ रहा था, जिसे देखते हुए व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह पाबंदी लगाना बेहद जरूरी हो गया था।
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