
— ✍️सुमन देवठिया
13 जनवरी, 2026 को भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक न्याय को मज़बूत करते हुए कहा कि जज और रिक्शावाले के बच्चे एक ही स्कूल और कक्षा में पढ़ें। यह टिप्पणी केवल कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि सामाजिक समानता, भाईचारे और न्याय के आदर्शों का प्रतीक भी है। यह स्पष्ट करती है कि शिक्षा केवल ज्ञान देने का माध्यम नहीं है, बल्कि समाज में असमानता और भेदभाव को दूर करने का सबसे सशक्त साधन है।
भारत के संविधान की प्रस्तावना में समानता, न्याय और भाईचारे के आदर्श निहित हैं। हर नागरिक को समान अवसर, सम्मान और सामाजिक न्याय मिलना चाहिए। जब जज और रिक्शावाले के बच्चे एक ही कक्षा में पढ़ेंगे, तो वे केवल अकादमिक ज्ञान ही नहीं सीखेंगे, बल्कि समानता, सहयोग और भाईचारे की भावना भी विकसित करेंगे।
इस सख़्त टिप्पणी को समझने के लिए हमें बाबासाहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन और संघर्ष को याद करना होगा। आंबेडकर जी को बचपन से ही जातिगत भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा। उनके अनुभवों ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि समाज में वास्तविक समानता और न्याय केवल शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने शिक्षा को समाज सुधार का सबसे शक्तिशाली हथियार माना।
डॉ. आंबेडकर ने अपने जीवन में शिक्षा को सर्वोच्च साधन बनाया। वे भारत और विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले पहले दलित छात्र थे। उनके अनुभवों और अध्ययन के आधार पर उन्होंने संविधान निर्माण में यह सुनिश्चित किया कि हर नागरिक को समान अवसर, सामाजिक न्याय और सम्मान मिले। आज भी उनके आदर्श शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून और सुप्रीम कोर्ट की इस सख़्त टिप्पणी में जीवंत हैं।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के तहत 6 से 14 साल के बच्चों के लिए निजी स्कूलों में 25% सीटें आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग तथा दलित बच्चों के लिए आरक्षित हैं। इसका उद्देश्य वंचित वर्ग के बच्चों को उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा देना और उन्हें अपने सहपाठियों के बराबर दर्जा दिलाना है। लेकिन कई बच्चे आर्थिक और सामाजिक कारणों से अभी भी इसका वास्तविक लाभ नहीं उठा पाते।
कई निजी स्कूलों में यह धारणा बनी हुई है कि आरटीई के तहत दाखिला लेने वाले बच्चे स्कूल के स्तर को प्रभावित कर सकते हैं। उनके खान-पान, भाषा और व्यवहार पर अलग से ध्यान दिया जाता है, जिससे बच्चे असहज और अलग-थलग महसूस करते हैं। यह स्थिति शिक्षा में असमानता और समाज में भेदभाव को बढ़ावा देती है।
सरकार की भूमिका इस प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण है। बजट समय पर जारी होना चाहिए ताकि स्कूल आरटीई के तहत दाखिला लेने वाले बच्चों को उचित संसाधन और सुविधाएँ प्रदान कर सकें। साथ ही, स्कूलों की निगरानी और मूल्यांकन आवश्यक है, ताकि ये बच्चे शिक्षा में अपने सहपाठियों के बराबर अवसर प्राप्त कर सकें। शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन को दलित और गरीब बच्चों के प्रति संवेदनशील और सहायक होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की यह सख़्त टिप्पणी केवल बच्चों तक सीमित नहीं है। जब बच्चे समान शिक्षा का अनुभव करेंगे, तो वे जीवन में भी समानता, भाईचारा और सहयोग के मूल्यों को अपनाएंगे। इससे समाज में जातिवाद, हीनभावना और भेदभाव कम होंगे। शिक्षा के माध्यम से सामाजिक दूरी घटेगी और भाईचारे की भावना मज़बूत होगी।
डॉ. आंबेडकर ने संविधान निर्माण के दौरान विशेष रूप से वंचित समुदायों के अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित किया। आरक्षण और शिक्षा का अधिकार उनकी इसी सोच का प्रत्यक्ष परिणाम हैं। उनका मानना था कि यदि वंचित बच्चों को समान शिक्षा और अवसर नहीं मिले, तो समाज में वास्तविक समानता और न्याय संभव नहीं है। शिक्षा केवल ज्ञान देने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता के लिए जीवन-दायिनी शक्ति है।
जब जज और रिक्शावाले के बच्चे एक साथ पढ़ेंगे, तो यह केवल भौतिक संसाधनों के भेदभाव को कम नहीं करेगा, बल्कि मानसिक भेदभाव और हीनभावना को भी घटाएगा। आने वाली पीढ़ियाँ न्यायपूर्ण और समान समाज में पलेंगी। यह न केवल उनके व्यक्तिगत विकास के लिए लाभकारी होगा, बल्कि पूरे समाज में समानता, भाईचारे और न्याय की भावना को भी मज़बूत करेगा।
(सुमन देवठिया एक वरिष्ठ दलित महिला कार्यकर्ता है और आगाज फाउंडेशन ट्रस्ट जयपुर की प्रबंधक हैं )
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