TM Exclusive: मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति पर बवाल, दलित या राजपूत? कांग्रेस के आरोपों की पूरी पड़ताल

कांग्रेस एससी विभाग के अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार का दावा “राजपूत बागरी समाज को गलत तरीके से मिला अनुसूचित जाति का लाभ”, हाईकोर्ट की फटकार के बाद तेज हुई कार्रवाई
TM Exclusive: मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति पर बवाल, दलित या राजपूत? कांग्रेस के आरोपों की पूरी पड़ताल
Published on

भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र को लेकर विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। जाति प्रमाणपत्र की वैधता जांचने वाली राज्य स्तरीय छानबीन समिति के समक्ष बुधवार को अनुसूचित जाति कांग्रेस विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार साक्ष्यों और दस्तावेजों के साथ उपस्थित हुए और मंत्री प्रतिमा बागरी के अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र को “फर्जी” बताते हुए उसे तत्काल निरस्त करने की मांग की। इस मामले में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप और 60 दिनों में निर्णय लेने के निर्देश के बाद प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है।

द मूकनायक की पड़ताल में सामने आया है कि यह विवाद केवल एक व्यक्ति के जाति प्रमाण पत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड, विंध्य और महाकौशल क्षेत्र में “बागरी” उपनाम के इस्तेमाल और अनुसूचित जाति की पात्रता को लेकर वर्षों से चले आ रहे विवाद से जुड़ा हुआ है।

कांग्रेस नेता अहिरवार का दावा है कि वास्तविक अनुसूचित जाति बागरी समुदाय और राजपूत-ठाकुर बागरी उपनाम का उपयोग करने वाले समुदायों के बीच अंतर किए बिना वर्षों तक जाति प्रमाण पत्र जारी किए गए, जिससे आरक्षण व्यवस्था प्रभावित हुई। जबकि बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र के बागरी राजपूत (सामान्य) से आते हैं।

समिति को दस्तावेज सौंपे

बुधवार को मंत्रालय स्थित वल्लभ भवन में हुई सुनवाई के दौरान प्रदीप अहिरवार ने प्रमुख सचिव ई. रमेश कुमार सहित समिति के अन्य अधिकारियों के सामने विस्तृत दस्तावेज प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि वर्ष 1950 की स्थिति एवं देश की आजादी के बाद जब पहली बार अनुसूचित जातियों की सूची बनाई गई थी, तब केवल उन जातियों को इसमें शामिल किया गया था जो सामाजिक अस्पृश्यता, छुआछूत और निम्न सामाजिक कार्यों से जुड़ी थीं। उनके अनुसार, मध्य भारत क्षेत्र में रहने वाले बागरी समुदाय को विशेष परिस्थितियों में अनुसूचित जाति श्रेणी में रखा गया था, लेकिन विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र में रहने वाले राजपूत बागरी समुदाय को कभी भी अनुसूचित जाति की मान्यता प्राप्त नहीं थी।

द मूकनायक से बातचीत में प्रदीप अहिरवार के अनुसार वर्ष 1961 की जातिगत जनगणना में सतना और पन्ना जिलों में रहने वाले बागरी समाज को अनुसूचित जाति के रूप में दर्ज नहीं किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि 1956 में मध्य प्रदेश के गठन के बाद जिन जिलों में बागरी समुदाय को अनुसूचित जाति का लाभ दिया गया, वे मुख्यतः मध्य भारत क्षेत्र के जिले थे, जिनमें भिंड, मुरैना, शिवपुरी, गुना, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर, इंदौर, देवास, धार, झाबुआ और नीमच शामिल थे। 1976 में क्षेत्रीय बंधन हटने के बाद विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र के राजपूत-ठाकुर बागरी समुदाय के लोगों ने अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र बनवाने शुरू कर दिए।

प्रदीप अहिरवार ने समिति के सामने यह भी तर्क रखा कि सतना जिले की रेगांव विधानसभा सीट अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित है और प्रतिमा बागरी ने इसी प्रमाण पत्र के आधार पर चुनाव लड़ा, विधायक बनीं और बाद में मंत्री पद तक पहुंचीं। उनका आरोप है कि यदि प्रमाण पत्र नियमों के विपरीत जारी हुआ है, तो यह केवल व्यक्तिगत मामला नहीं बल्कि आरक्षण व्यवस्था और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।

भारत सरकार ने 2007 में किया संशोधन

शिकायतकर्ता ने 2003 में राज्य शासन द्वारा जारी आदेशों का भी हवाला दिया। उनके अनुसार, राज्य शासन और मध्य प्रदेश जनजाति शोध संस्थान (TRI) द्वारा किए गए मानव शास्त्रीय अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया था कि बुंदेलखंड, महाकौशल और विंध्य क्षेत्र में रहने वाले “बागरी” उपनाम वाले परिवार वास्तव में राजपूत-ठाकुर समुदाय से संबंधित हैं और उन्हें अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र जारी नहीं किए जाने चाहिए।

टीआरआई की रिपोर्ट के अनुसार यह विंध्य क्षेत्र के बागरी राजपूत मालगुजार लोग है। और जातीय नाम की समानता के आधार पर इन्होंने एससी के जाति प्रमाण पत्र का बनाकर लाभ लेना शुरू कर दिया।

छानबीन समिति ने नही किए थे निर्देश

इस संबंध में 25 फरवरी 2003 और 14 जुलाई 2003 को सभी कलेक्टरों को निर्देश जारी किए गए थे। बाद में उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने भी शासन के निर्णय को सही माना था।

मामले में एक महत्वपूर्ण बिंदु वर्ष 2007 का संशोधन भी है। केंद्र सरकार ने उस समय स्पष्ट किया था कि “बागरी/बागड़ी” समुदाय को अनुसूचित जाति में रखा जाएगा, लेकिन राजपूत और ठाकुर उपजाति के वे लोग जो केवल “बागरी” उपनाम का उपयोग करते हैं, उन्हें इसका लाभ नहीं मिलेगा। अहिरवार का कहना है कि इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर बिना पर्याप्त जांच के जाति प्रमाण पत्र जारी होते रहे।

द मूकनायक से बातचीत में अनुसूचित जाति कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने आरोप लगाया कि मंत्री प्रतिमा बागरी और उनका परिवार वर्षों से अपनी जातीय पहचान को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा करता रहा है। उनका कहना है कि प्रतिमा बागरी पक्ष द्वारा 1950 के पहले के खसरा-खतौनी और राजस्व दस्तावेज प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जिनमें उनके परिवार का उपनाम “बागरी” दर्ज है। लेकिन केवल “बागरी” उपनाम होने भर से कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति वर्ग का पात्र नहीं हो जाता।

अहिरवार के अनुसार, 1950 में लागू संवैधानिक अनुसूचित जाति सूची में विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र के राजपूत बागरी समुदाय को अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त नहीं था। उन्होंने दावा किया कि 1956 और 1961 के दस्तावेजों एवं जातिगत अभिलेखों में भी इस परिवार ने स्वयं को अनुसूचित जाति के रूप में दर्ज नहीं कराया था, यह इसलिए क्योंकि यह राजपूत (सामान्य) वर्ग से आते हैं। उन्होंने कहा, की राजस्व रिकार्ड में बागरी उपनाम होना उनके अनुसूचित जाति का होने का साक्ष्य नहीं माना जा सकता।

प्रदीप अहिरवार ने आगे कहा कि बागरी जाति केवल मध्य भारत क्षेत्र में अनुसूचित जाति के रूप में मान्यता प्राप्त है। और उसी “बागरी” समुदाय के जाति नाम की समानता का लाभ उठाकर मंत्री प्रतिमा के परिवार प्रमाण पत्र हासिल करने में सफल हुआ है। उन्होंने आशंका जताई कि छानबीन समिति के समक्ष भी पुराने दस्तावेजों के आधार पर भ्रम फैलाने की कोशिश की जा सकती है।

अहिरवार का दावा है कि जिन दस्तावेजों में परिवार का उपनाम “बागरी” दर्ज है, वे वास्तव में राजपूत बागरी समुदाय से संबंधित हैं, न कि अनुसूचित जाति वर्ग से।

बागरी जाति से नहीं हुई छुआ-छूत

शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि विंध्य और बुंदेलखंड क्षेत्र के बागरी परिवार आर्थिक और सामाजिक रूप से प्रभावशाली कृषक समुदाय के रूप में जाने जाते रहे हैं। दस्तावेजों में दावा किया गया है कि इन परिवारों के पास स्वतंत्रता से पहले से बड़ी मात्रा में कृषि भूमि रही है और इनके साथ कभी सामाजिक छुआछूत जैसी स्थिति नहीं रही। शिकायतकर्ता ने अंग्रेजों के समय के गजेटियर और पुराने प्रशासनिक दस्तावेजों का हवाला देते हुए कहा कि सिवनी जिले के राजपूत बागरी समुदाय का उल्लेख बड़े कृषक समुदाय के रूप में मिलता है और उनके विवाह संबंध सतना-पन्ना क्षेत्र के बागरी परिवारों से होते रहे हैं।

इस पूरे मामले ने प्रदेश की राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी है। विपक्ष इसे “आरक्षण व्यवस्था में घुसपैठ” का मुद्दा बना रहा है, जबकि सत्ता पक्ष की ओर से अब तक इस मामले पर कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर मामला अब संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि यदि छानबीन समिति शिकायतकर्ता के दावों को सही पाती है तो इसके राजनीतिक और संवैधानिक परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।

20 जून के पहले हो सकता है फैसला

राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति इस मामले में 20 जून से पहले अपना फैसला सुना सकती है। दरअसल, जबलपुर हाईकोर्ट की डबल बेंच ने मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और छानबीन समिति को निर्देश दिए थे कि मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र विवाद पर 60 दिनों के भीतर निर्णय लिया जाए। कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद ही इस मामले में जांच प्रक्रिया तेज हुई और अब समिति के समक्ष शिकायतकर्ता द्वारा दस्तावेज और साक्ष्य प्रस्तुत किए जा चुके हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में इस हाई-प्रोफाइल मामले पर बड़ा फैसला सामने आ सकता है।

जाति प्रमाण-पत्र रद्द हुआ तो क्या होगा?

यदि राज्य स्तरीय जाति छानबीन समिति मंत्री प्रतिमा बागरी का जाति प्रमाण पत्र निरस्त कर देती है, तो इसके कानूनी और राजनीतिक प्रभाव बेहद गंभीर हो सकते हैं। क्योंकि उन्होंने सतना जिले की रेगांव विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा था, जो अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित है। ऐसे में जाति प्रमाण पत्र अमान्य पाए जाने की स्थिति में उनकी विधानसभा सदस्यता पर संकट खड़ा हो सकता है और मामला निर्वाचन याचिका तथा अदालत तक पहुंच सकता है। इसके अलावा मंत्री पद पर बने रहने को लेकर भी संवैधानिक प्रश्न उठ सकते हैं।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह साबित होता है कि आरक्षित वर्ग के लिए जारी प्रमाण पत्र गलत तथ्यों के आधार पर प्राप्त किया गया था, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ फर्जी दस्तावेज और आरक्षण का अनुचित लाभ लेने से जुड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई भी संभव है।

TM Exclusive: मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति पर बवाल, दलित या राजपूत? कांग्रेस के आरोपों की पूरी पड़ताल
जब एक टांग पर हाथ जोड़े खड़े रहे दलित सरपंच: वो 11 स्तब्ध करने वाली घटनाएं जिन्होंने राजस्थान हाई कोर्ट को खाप पंचायतों के विरुद्ध सख्ती के लिए कर दिया मजबूर |TM Mega Report
TM Exclusive: मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति पर बवाल, दलित या राजपूत? कांग्रेस के आरोपों की पूरी पड़ताल
MP: सतना के तत्कालीन SDM पर फर्जी SC प्रमाण पत्र जारी करने का आरोप, कांग्रेस ने EOW से की शिकायत
TM Exclusive: मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति पर बवाल, दलित या राजपूत? कांग्रेस के आरोपों की पूरी पड़ताल
MP की राज्य मंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र मामले में हाईकोर्ट सख्त, कांग्रेस ने कहा- "दो महीने की बची हैं मिनिस्टर!"

द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.

द मूकनायक की मदद करें

‘द मूकनायक’ जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है. अगर आप भी चाहते हैं कि ‘द मूकनायक’ हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज़ बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहे तो सपोर्ट करें.

यहां सपोर्ट करें
The Mooknayak - आवाज़ आपकी
www.themooknayak.com