
भोपाल। मध्य प्रदेश में दलित दूल्हों को घोड़ी पर बैठकर बारात निकालने से रोकने और उनके साथ मारपीट की घटनाओं ने एक बार फिर सामाजिक न्याय और कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी मुद्दे को लेकर आजाद समाज पार्टी के नेता सुनील अस्तेय ने सरकार के खिलाफ तीखा हमला बोलते हुए कहा कि “सरकार अंधी, बहरी और गूंगी हो चुकी है, क्योंकि मामला दलित दूल्हों का है।” उन्होंने ऐलान किया कि वे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के गृह क्षेत्र उज्जैन से राजधानी भोपाल मुख्यमंत्री निवास तक घोड़े पर बैठकर कूच करेंगे।
इस आंदोलन का उद्देश्य सरकार को मजबूर करना है कि वह दलित दूल्हों की सुरक्षा और सम्मान के लिए विशेष प्रावधान लागू करे।
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सुनील अस्तेय ने कहा कि राज्य में लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, जहां दलित समाज के युवकों को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वे परंपरागत रूप से घोड़ी पर बैठकर बारात निकालने का पालन करना चाहते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कई मामलों में प्रशासन की भूमिका भी ढीली रहती है, जिससे आरोपियों के हौसले बुलंद होते हैं। अस्तेय ने चेतावनी दी कि यदि दोषियों पर सख्त कार्रवाई, विशेष रूप से एससी-एसटी एक्ट और एनएसए के तहत, सुनिश्चित नहीं की गई तो आजाद समाज पार्टी और भीम आर्मी सड़कों पर बड़ा आंदोलन करेंगी।
21 अप्रैल 2026 को दमोह जिले के हटा थाना क्षेत्र के बिजोरी पाठक गांव में हुई घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया। दलित युवक गोलू अहिरवार की बारात छतरपुर के बक्सवाहा जानी थी। बारात निकलने से पहले गांव में पारंपरिक “रछवाई” रस्म के तहत दूल्हे को घोड़ी पर बैठाकर घुमाया जा रहा था। परिवार के लोग खुशी मना रहे थे, लेकिन जैसे ही बारात लोधी मोहल्ले में पहुंची, वहां विवाद खड़ा हो गया।
स्थानीय दबंगों ने आपत्ति जताते हुए दूल्हे को घोड़ी से नीचे उतार दिया और उसके साथ बेरहमी से मारपीट की। इस दौरान उसकी बहन को भी नहीं बख्शा गया। घटना इतनी गंभीर थी कि बारात की जगह दूल्हे को अस्पताल और पुलिस थाने जाना पड़ा। यह घटना दर्शाती है कि आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में जातिगत भेदभाव कितनी गहराई से मौजूद है।
अप्रैल 2025 में टीकमगढ़ जिले के मोखरा गांव में दलित दूल्हे जितेंद्र अहिरवार की बारात के दौरान भी इसी तरह का विवाद सामने आया। जब दूल्हा घोड़े पर सवार होकर सवर्ण मोहल्ले से गुजर रहा था, तो एक महिला ने उस पर पत्थर फेंका। इसके बाद कुछ लोगों ने दूल्हे के साथ मारपीट की। पुलिस के हस्तक्षेप के बाद स्थिति नियंत्रित हुई और बारात को सुरक्षा में निकाला गया।
इसी जिले के सरकर गांव में मई 2025 में एक अन्य घटना में दलित दूल्हे को घोड़ी पर बैठने से रोक दिया गया और उसे गांव से वापस लौटा दिया गया। बाद में पुलिस के पहुंचने पर ही बारात निकल पाई। ये घटनाएं बताती हैं कि प्रशासन की मौजूदगी के बिना दलित दूल्हों के लिए बारात निकालना आज भी जोखिम भरा है।
जून 2025 में छतरपुर जिले के चौरई गांव में भी दलित दूल्हे को घोड़ी पर देखकर दबंग जातियों के लोगों ने पथराव किया। हालात इतने बिगड़ गए कि दो थानों की पुलिस को मौके पर बुलाना पड़ा। पुलिस की मौजूदगी में ही बारात को सुरक्षित रवाना किया गया। यह घटना इस बात का प्रतीक है कि आजादी के 75 साल बाद भी सामाजिक समानता की राह में गंभीर बाधाएं मौजूद हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल एक सामाजिक रस्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर संविधान द्वारा दिए गए समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार से जुड़ा हुआ है। द मूकनायक से बातचीत में समाजशास्त्री इम्तियाज खान ने कहा कि दलित दूल्हों को घोड़ी पर बैठने से रोकना भारतीय समाज में गहराई तक मौजूद जातिगत असमानता और भेदभाव को दर्शाता है, जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल सामाजिक अन्याय ही नहीं, बल्कि कानूनन अपराध भी है, जिसके लिए सख्त कार्रवाई का प्रावधान है। इसके बावजूद बार-बार इस तरह की घटनाओं का सामने आना प्रशासनिक ढिलाई और सामाजिक चेतना की कमी को उजागर करता है। इम्तियाज खान के अनुसार, जब तक ऐसे मामलों में त्वरित और कठोर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक “परंपरा” के नाम पर संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन जारी रहेगा।
सुनील अस्तेय का उज्जैन से भोपाल तक घोड़े पर कूच का ऐलान इस मुद्दे को राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर बड़ा रूप दे सकता है। उनका कहना है कि जब तक सरकार ठोस कदम नहीं उठाती, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने मांग की कि ऐसे मामलों में तुरंत गिरफ्तारी, कड़ी सजा और पीड़ितों को सुरक्षा प्रदान की जाए।
द मूकनायक से बातचीत में आजाद समाज पार्टी के नेता सुनील अस्तेय ने उज्जैन से भोपाल तक घोड़े पर कूच करने का ऐलान किया है। उनका कहना है कि यह आंदोलन केवल एक प्रतीकात्मक विरोध नहीं, बल्कि दलित समाज के सम्मान और अधिकारों की लड़ाई को मजबूत करने की पहल है, जो इस मुद्दे को राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर बड़ा रूप दे सकता है।
अस्तेय ने साफ कहा कि जब तक सरकार इस तरह की घटनाओं पर ठोस और सख्त कदम नहीं उठाती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने मांग की कि दलित दूल्हों के साथ भेदभाव और हिंसा करने वालों की तुरंत गिरफ्तारी हो, राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) का मामला दर्ज हो, उन्हें कड़ी सजा दी जाए और पीड़ित परिवारों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
द मूकनायक से बातचीत करते हुए अधिवक्ता एवं विधि विशेषज्ञ मयंक सिंह ने कहा कि जब भी इस प्रकार की घटनाएं सामने आती हैं, तो प्रशासन द्वारा दलित दूल्हों की बारात को पुलिस सुरक्षा में निकाला जाता है। उन्होंने बताया कि कई मामलों में ऊंची जाति के कुछ लोग बारात को रोकने या दूल्हे को घोड़ी पर बैठने से रोकने की कोशिश करते हैं, ऐसे में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस की मौजूदगी जरूरी हो जाती है।
उन्होंने आगे कहा कि इस तरह की घटनाएं केवल सामाजिक विवाद नहीं, बल्कि गंभीर आपराधिक कृत्य हैं। यदि किसी दलित दूल्हे या उसके परिवार के साथ मारपीट, अभद्रता या भेदभाव होता है, तो आरोपियों के खिलाफ अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत एट्रोसिटी का मामला दर्ज किया जाता है, जिसमें सख्त कानूनी प्रावधान और दंड का प्रावधान
लगातार सामने आ रही इन घटनाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या मध्य प्रदेश में दलितों को अब भी अपने बुनियादी सामाजिक अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ेगा?
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