
तमिलनाडु: चेन्नई के एक कॉलेज में कार्यरत दलित समुदाय के 54 वर्षीय एसोसिएट प्रोफेसर ने मद्रास विश्वविद्यालय (UoM) में रजिस्ट्रार पद के लिए अपनाई गई चयन प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि जून 2025 में हुए इस इंटरव्यू में कई स्तरों पर अनियमितताएं बरती गईं।
यह प्रोफेसर खुद इस पद के उम्मीदवारों में से एक थे। उन्होंने इस बात पर हैरानी जताई कि नौ में से पांच उम्मीदवार दलित होने के बावजूद पूरी चयन समिति में इस समुदाय का एक भी प्रतिनिधि शामिल नहीं था।
इस मामले को लेकर प्रोफेसर ने पिछले साल दिसंबर में मद्रास उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने अदालत से गुहार लगाई है कि वह विश्वविद्यालय को एक वैध और सही समिति के साथ निष्पक्ष चयन प्रक्रिया आयोजित करने का निर्देश दे। साथ ही, उन्होंने अपनी उम्मीदवारी पर भी विचार करते हुए पूरी तरह से योग्यता के आधार पर नियुक्ति करने की मांग की है।
रजिस्ट्रार पद के लिए पिछले साल मई में आवेदन मांगे गए थे, क्योंकि तत्कालीन रजिस्ट्रार एस. एलुमलाई जून में अपने पद से इस्तीफा देने वाले थे। शुरुआत में कुल 15 लोगों ने आवेदन किया था, जिनमें से चार अयोग्य घोषित कर दिए गए और दो उम्मीदवार इंटरव्यू में शामिल ही नहीं हुए। इस तरह 24 जून को कुल नौ उम्मीदवारों ने साक्षात्कार दिया।
शिक्षण और शोध क्षेत्र में 24 साल से ज्यादा का अनुभव रखने वाले इस एसोसिएट प्रोफेसर ने एक साक्षात्कार में बताया कि ज्यादातर उम्मीदवारों को यह प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं लगी। उनका कहना था कि सभी को समान अवसर नहीं मिले और यह पूरी कवायद महज आंखों में धूल झोंकने जैसी थी। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो चयन समिति ने वर्तमान रजिस्ट्रार रीता जॉन को इस पद के लिए पहले ही तय कर रखा था।
इंटरव्यू देने वाले मद्रास विश्वविद्यालय के ही एक 55 वर्षीय प्रोफेसर ने समय के बंटवारे को लेकर भी सवाल खड़े किए। उन्होंने बताया कि बाकी सभी उम्मीदवारों को केवल 10 से 15 मिनट का समय दिया गया, जबकि वर्तमान रजिस्ट्रार को पूरे 46 मिनट तक परखा गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि रीता जॉन की समिति के कई सदस्यों से पहले से ही अच्छी जान-पहचान थी।
नियमों के मुताबिक, इस इंटरव्यू की अध्यक्षता कुलपति (VC) को करनी चाहिए थी। उनकी अनुपस्थिति में यह जिम्मेदारी उच्च शिक्षा विभाग के सचिव के अधीन गठित सिंडिकेट समिति की होती है। लेकिन, इस मामले में तकनीकी शिक्षा निदेशालय (DoTE) की तत्कालीन आयुक्त जे. इनोसेंट दिव्या को यह जिम्मेदारी सौंप दी गई, जो प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगाता है।
विभागीय सूत्रों के अनुसार, दिव्या को पूर्व उच्च शिक्षा सचिव सी. समयमूर्ति ने नियुक्त किया था। समयमूर्ति का 23 जून को तबादला हो गया था और ठीक अगले दिन 24 जून को इंटरव्यू रखे गए थे। उम्मीदवार अब यह सवाल उठा रहे हैं कि नए सचिव पी. शंकर के कार्यभार संभालने से पहले इतनी जल्दबाजी में इंटरव्यू क्यों कराए गए?
प्रोफेसर ने आगे सवाल किया कि जब चयन समिति के सदस्यों की ओर से किसी और के काम करने का कोई प्रावधान ही नहीं है, तो नए सचिव शंकर के आने तक प्रक्रिया को क्यों नहीं रोका गया। गौरतलब है कि पूर्व सचिव समयमूर्ति खुद मद्रास विश्वविद्यालय के इंटरव्यू से ठीक एक हफ्ते पहले भारथिअर विश्वविद्यालय में रजिस्ट्रार पद के लिए इंटरव्यू में शामिल हुए थे।
उम्मीदवारों ने समिति में दलित प्रतिनिधित्व की कमी पर भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि यूजीसी (UGC) के नियमों के अनुसार समिति में दलित समुदाय का प्रतिनिधित्व होना अनिवार्य है और इससे किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जा सकता।
इसी को लेकर एक सदस्य ने एससी/एसटी (SC/ST) आयोग में गड़बड़ी की शिकायत दर्ज कराई है। इसके बाद आयोग ने उच्च शिक्षा विभाग को कड़ा निर्देश देते हुए अप्रैल के पहले सप्ताह तक इस पूरे इंटरव्यू प्रक्रिया की रिपोर्ट सौंपने को कहा है।
इन सभी आरोपों पर मद्रास विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने अपना पक्ष रखा है। उन्होंने कहा कि साक्षात्कार पूरी तरह से निष्पक्ष तरीके से आयोजित किए गए और यह पद पूरी तरह से योग्यता के आधार पर दिया गया है। अधिकारी ने स्पष्ट किया कि इस नियुक्ति में किसी भी तरह की रिश्वत, दबाव या गड़बड़ी शामिल नहीं है।
अधिकारी ने यह भी जानकारी दी कि रजिस्ट्रार का पद संभालने के बाद से रीता जॉन ने सिंडिकेट सदस्य और सैद्धांतिक भौतिकी (Theoretical Physics) विभाग के प्रमुख (HoD) का अपना पिछला पद छोड़ दिया है।
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