हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक पूर्व छात्र ने इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. विजय रामदास मंडाला के खिलाफ एक औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। यह शिकायत प्रोफेसर द्वारा भेजे गए एक विवादित ईमेल को लेकर की गई है, जिसमें उन्होंने छात्र को 'दलित अछूत बेवकूफ' कहकर अपमानित किया। इसके साथ ही ईमेल में बिहार और झारखंड के छात्रों को 'थर्ड-रेट' और 'गरीबी से ग्रस्त बेवकूफ' बताया गया है।
पीड़ित छात्र की पहचान सुबोध कुमार के रूप में हुई है, जिन्होंने साल 2017 से 2019 के बीच विश्वविद्यालय से इतिहास में एमए किया था। सुबोध वर्तमान में ब्रिटेन की नॉटिंघम यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर रहे हैं। उन्होंने 31 अक्टूबर 2026 को विश्वविद्यालय के कुलपति, आरसी सेल और छात्र संघ को पत्र लिखकर प्रोफेसर के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की है।
शिकायत के अनुसार, इस साल की शुरुआत में सुबोध और विश्वविद्यालय के कुछ अन्य पूर्व छात्र डॉ. मंडाला के साथ एक किताब के संपादन प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। इसी दौरान, जब एक सहयोगी ने भारत में फील्डवर्क के लिए ब्रिटिश विश्वविद्यालयों के नियमों की जानकारी प्रोफेसर को दी, तो उन्होंने बिना किसी स्पष्ट कारण के हाशिए के समुदायों से आने वाले छात्रों के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल शुरू कर दिया। सुबोध का कहना है कि यह विवादित ईमेल 16 अप्रैल 2026 को भेजा गया था।
यह ईमेल डॉ. मंडाला के आधिकारिक खाते से भेजा गया था, जिसके अंत में उनके पद और मैनचेस्टर विश्वविद्यालय से पीएचडी होने का विवरण दर्ज था। संदेश में प्रोफेसर ने लिखा कि एक अछूत दलित पृष्ठभूमि से आने वाले जर्मन पीएचडी शोधार्थी ने भी उनसे भारतीय अभिलेखागार के बारे में ऐसी ही बात कही थी। इसके बाद उन्होंने प्राप्तकर्ता को झारखंड जैसे राज्य से होने का ताना मारते हुए इसे सभ्यता, राजनीति और आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ क्षेत्र करार दिया।
प्रोफेसर ने अपने ईमेल में आगे लिखा कि भारत की एक बड़ी आबादी गैर-आर्यन और गरीब है। उन्होंने बिहार और झारखंड की तुलना अफ्रीकी देशों से करते हुए बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। इसी ईमेल में उन्होंने नॉटिंघम में पढ़ रहे एक अन्य छात्र को 'दलित अछूत बेवकूफ' कहते हुए तंज कसा कि वह ब्रिटेन से पीएचडी करने के बाद वहां एक होटल में पार्ट-टाइम नौकरी कर रहा है।
अपनी भड़ास निकालते हुए डॉ. मंडाला ने लिखा कि गरीबी से आने वाले ये छात्र पाकिस्तानी जैसी सोच विकसित कर लेते हैं। उन्होंने दावा किया कि यूरोपियन लोग भारत के इंडो-आर्यन लोगों से हर मायने में कमतर हैं। प्रोफेसर ने ब्रिटेन को एक वैश्विक मजाक बताते हुए कहा कि वहां अब पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और श्रीलंकाई जैसे अल्पसंख्यक समुदाय फैसले ले रहे हैं और वह अब एंग्लो-सैक्सन देश नहीं रह गया है।
छात्र के शोध अध्याय को खारिज करते हुए प्रोफेसर ने धमकी दी कि वह देशभर के संकाय सदस्यों को ऐसे राष्ट्रविरोधी लोगों से दूर रहने की चेतावनी देंगे। उन्होंने छात्र की तुलना 'चालाक लोमड़ी' से करते हुए कहा कि वह अपने निचले स्तर की जड़ों और मजदूर वर्ग की परवरिश के साथ ही जिएगा। ईमेल के अंत में उन्होंने स्पष्ट किया कि वह आगे से बिहार और झारखंड के इन गरीबी से ग्रस्त बेवकूफों को कोई अकादमिक समर्थन नहीं देंगे।
इसके बाद 27 अप्रैल 2026 को डॉ. मंडाला ने सुबोध कुमार को एक अलग ईमेल भेजा। इसमें उन्होंने कहा कि उनके पुस्तक प्रोजेक्ट के लिए पर्याप्त लेखक हो चुके हैं, इसलिए वे उनका अध्याय स्वीकार नहीं कर सकते। प्रोफेसर ने सुबोध को भविष्य में किसी भी अकादमिक संदर्भ या संचार में उनका नाम इस्तेमाल न करने की हिदायत दी। इस ईमेल के अंत में एक डिस्क्लेमर भी था कि ये विचार विश्वविद्यालय के नहीं, बल्कि व्यक्तिगत क्षमता में उनके अपने हैं।
इस दुर्व्यवहार के बाद सुबोध ने इतिहास विभाग के प्रमुख से शिकायत की, लेकिन उन्हें केवल एक औपचारिक माफीनामा मिला। विभाग की ओर से 10 मई 2026 को विभागाध्यक्ष प्रो. वाई. स्वरूपा आर. शंकर ने सुबोध को बताया कि उन्होंने आरोपी संकाय सदस्य से बात की है। विभागाध्यक्ष ने आश्वासन दिया कि प्रोफेसर उनकी फेलोशिप और सिफारिश पत्र में कोई बाधा नहीं डालेंगे और उन्होंने एक माफीनामा भी दे दिया है। विभाग ने इस आधार पर मामले को सुलझा हुआ मान लिया।
हालांकि, सुबोध कुमार ने 13 मई को इस समझौते को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि नस्लवाद, वर्गवाद और जाति-आधारित भेदभाव के इतने गंभीर मामले को महज एक माफीनामे या आश्वासन के आधार पर रफा-दफा नहीं किया जा सकता। सुबोध ने रोहित वेमुला की दुखद मौत का जिक्र करते हुए कहा कि इस विश्वविद्यालय ने पहले भी अकादमिक स्थानों में जातिगत भेदभाव की वास्तविकता देखी है, इसलिए ऐसे मामलों को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।
सुबोध ने अपनी 31 अक्टूबर की शिकायत में कहा कि प्रोफेसर हाशिए के छात्रों की मदद करने के बहाने केवल अपना अकादमिक रसूख बढ़ा रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन ने जल्द कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो वह इस मामले को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय और राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग जैसी वैधानिक संस्थाओं के सामने ले जाएंगे। उन्होंने सबूत के तौर पर 16 अप्रैल के ईमेल की कॉपी भी संलग्न की है।
इस बीच, छात्र संगठनों ने भी आरोपी प्रोफेसर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। फ्रेटरनिटी मूवमेंट की हैदराबाद विश्वविद्यालय इकाई ने प्रोफेसर की जातिगत और भेदभावपूर्ण टिप्पणियों के खिलाफ जवाबदेही की मांग की है। संगठन ने हाशिए के दलित-बहुजन छात्रों के लिए एक सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करने पर जोर दिया है।
वहीं, 26 अक्टूबर 2026 को जारी एक बयान में स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया की यूनाइटेड किंगडम इकाई (एसएफआई-यूके) ने भी डॉ. मंडाला द्वारा पूर्व छात्रों के प्रति किए गए इस जातिवादी और वर्गवादी दुर्व्यवहार की कड़ी निंदा की है। संगठन ने ब्रिटेन और भारत के व्यापक अकादमिक समुदाय से डॉ. मंडाला को उनके कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराने का आह्वान किया है।
द मूकनायक की प्रीमियम और चुनिंदा खबरें अब द मूकनायक के न्यूज़ एप्प पर पढ़ें। Google Play Store से न्यूज़ एप्प इंस्टाल करने के लिए यहां क्लिक करें.
'द मूकनायक' जनवादी पत्रकारिता करता है. यह संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय पर चलने वाला मीडिया समूह है। अगर आप भी चाहते हैं कि 'द मूकनायक' हमेशा हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज बुलंद करता रहे, बेजुबानों की पीड़ा दिखाते रहें तो सब्सक्राइब करें।
यहां सब्सक्राइब करें