गुजरात: घोड़ी चढ़ने की 'सजा' - दलित दूल्हे पर तलवारों से हमला, शादी की खुशियां खौफ में बदलीं

पाटन के चंद्रूमाना गाँव में जातिवादी मानसिकता का क्रूर चेहरा; SC/ST एक्ट के बावजूद 'घोड़ी चढ़ने' को लेकर नहीं थम रही गुंडागर्दी।
Dalit Groom Attack
Gujarat के Patan में जातिवाद का खौफनाक सच! घोड़ी चढ़ने पर दलित दूल्हे पर तलवारों से हमला।
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पाटन: एक तरफ जहाँ भारत खुद को दुनिया के सामने एक तकनीकी महाशक्ति और प्रगतिशील देश के रूप में पेश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ गुजरात के पाटन जिले के एक गाँव ने हमें यह कड़वी याद दिलाई है कि देश के अंदरूनी हिस्सों में जातिवाद की जड़ें आज भी कितनी गहरी हैं।

सोमवार का दिन विशाल चावड़ा के लिए उनकी जिंदगी का सबसे खुशनुमा दिन होना चाहिए था, लेकिन समाज की दकियानूसी सोच ने उसे दहशत में बदल दिया। दलित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले विशाल जैसे ही चंद्रूमाना गाँव की गलियों से अपनी बारात (वरघोड़ा) निकालने के लिए घोड़ी पर सवार हुए, शादी की शहनाइयों की गूंज नंगी तलवारों की खनक में दब गई।

समानता का 'अपराध'

स्थानीय चश्मदीदों के मुताबिक, जैसे ही बारात आगे बढ़ी, वर्चस्वशाली समुदाय के लोगों के एक समूह ने उनका रास्ता रोक लिया। आरोप है कि ये लोग इस बात से भड़के हुए थे कि एक "निचली जाति" का दूल्हा उस परंपरा को निभाने की हिम्मत कैसे कर रहा है, जिसे वे अपना विशेषाधिकार मानते हैं—यानी घोड़ी पर चढ़ना।

हमलावरों ने चिल्लाते हुए कहा, "इस गाँव में एक दलित की घोड़ी पर चढ़ने की हिम्मत कैसे हुई?" देखते ही देखते स्थिति हिंसक हो गई। हाथों में तलवारें लिए इस भीड़ ने कथित तौर पर गुंडागर्दी शुरू कर दी। उन्होंने न केवल दूल्हे को धमकाया, बल्कि बारात में शामिल लोगों के साथ मारपीट भी की। उनके लिए एक दलित का घोड़ी पर बैठना शादी का जश्न नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देने जैसा था।

कानून होने के बावजूद दहशत का माहौल

यह घटना कोई अकेला मामला नहीं है, बल्कि गुजरात में बार-बार दोहराई जाने वाली एक शर्मनाक कहानी का हिस्सा है। गांधीनगर से लेकर बनासकांठा तक, दलित दूल्हे द्वारा घोड़ी चढ़ने की साधारण सी रस्म अक्सर हिंसा का कारण बनती रही है। एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम जैसे कड़े कानून होने के बावजूद, "घोड़ी चढ़ने पर पाबंदी" को ऊँची जातियाँ आज भी सामाजिक नियंत्रण के एक हिंसक हथियार के रूप में इस्तेमाल करती हैं, ताकि वंचित तबके को "उनकी औकात" में रखा जा सके।

हालाँकि, स्थानीय प्रशासन ने मुस्तैदी दिखाते हुए एफआईआर दर्ज कर ली है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल तैनात कर दिया है। लेकिन, विशाल और उनके परिवार के मन पर जो घाव लगे हैं, उन्हें भरने में लंबा वक्त लगेगा।

पहले भी हुए हैं ऐसे हमले

आंकड़े बताते हैं कि यह नफरत नई नहीं है। इसी साल फरवरी 2024 में, गांधीनगर के चड़ासना गाँव में विकास चावड़ा नामक एक अन्य दलित दूल्हे को घोड़ी से नीचे खींच लिया गया था और चार लोगों ने उन्हें थप्पड़ मारे थे।

इससे पहले 2020 में, देश की रक्षा करने वाले एक आर्मी जवान की बारात पर भी सिर्फ इसलिए पथराव किया गया था क्योंकि वह घोड़ी पर सवार थे। ये घटनाएं सवाल खड़ा करती हैं कि क्या हम वाकई एक आधुनिक समाज की ओर बढ़ रहे हैं?

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