
अहमदाबाद/गांधीनगर- जब 'बुद्ध की धरती' का दावा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर गूंजता है, तो घर की चौखट पर क्यों ठिठक जाता है? गुजरात के दलित बौद्ध समुदाय ने राज्य सरकार की उस नीति पर सवाल उठाया है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'भारत ने दिया बुद्ध, युद्ध नहीं' वाले संदेशों के ठीक उलट, बुद्ध पूर्णिमा को गजेटेड छुट्टी का दर्जा देने से कतराती है।
क्या यह सिर्फ सरकारी फाइलों की उपेक्षा है या गहरी सांस्कृतिक असमानता का आईना? आइए, इस विवाद की परतें खोलें, जहां शांति का संदेश तो वैश्विक पटल पर चमकता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर छुट्टी का एक दिन भी नसीब नहीं होता।
गुजरात में दलित बौद्ध समुदाय के सदस्यों ने राज्य सरकार द्वारा बुद्ध पूर्णिमा को गजेटेड छुट्टी के रूप में घोषित न करने की परम्परा पर कड़ी आपत्ति जताई है। 2025 में भी 12 मई को मनाई गई बुद्ध पूर्णिमा पर गुजरात सरकार ने इसे केवल वैकल्पिक अवकाश (ऑप्शनल restricted हॉलिडे) के रूप में सूचीबद्ध किया, जबकि केंद्र सरकार और कई अन्य राज्यों में इसे अनिवार्य सार्वजनिक अवकाश का दर्जा प्राप्त है। वर्ष 2026 में बुद्ध पूर्णिमा (1 मई) को होगी लेकिन गुजरात सरकार ने वह दिन ऑप्शनल होलिडेज की सूची में रखा है।
समुदाय का कहना है कि यह निर्णय बौद्ध विरासत के प्रति राज्य की उदासीनता को दर्शाता है, खासकर तब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार भारत को 'बुद्ध की धरती' बताते हुए विश्व को शांति का संदेश देते हैं। हाल के वर्षों में गुजरात में दलित समुदाय द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने की घटनाएं बढ़ी हैं, लेकिन सरकारी नीतियां इस धार्मिक पहचान को पर्याप्त मान्यता नहीं दे रही हैं, जिससे समुदाय में असंतोष व्याप्त है।
भारत में बुद्ध पूर्णिमा पर अंडमान और निकोबार, अरुणाचल प्रदेश, त्रिपुरा, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मिज़ोरम, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में अवकाश होता है। बुद्ध पूर्णिमा के लिए सार्वजनिक अवकाश की शुरुआत डॉ. भीमराव अंबेडकर ने की थी, जब वे विधि एवं न्याय मंत्री थे।
गुजरात सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा 27 नवंबर को जारी अधिसूचना संख्या जीएस/22/2025/एसआर/2025/509/जीएच के अनुसार, वर्ष 2026 के लिए राज्य सरकार के कार्यालयों में सार्वजनिक अवकाश निम्नलिखित तिथियों पर घोषित किए गए हैं: 14 जनवरी को मकर संक्रांति (बुधवार), 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस (सोमवार), 4 मार्च को होली दूसरा दिन-ढुलेटी (बुधवार), 19 मार्च को चेटिचंद (गुरुवार), 21 मार्च को रमजान ईद (ईद-उल-फित्र) प्रथम शाव्वाल (शनिवार), 26 मार्च को श्री राम नवमी (गुरुवार), 31 मार्च को महावीर जन्म कल्याणक (मंगलवार), 3 अप्रैल को गुड फ्राइडे (शुक्रवार), 14 अप्रैल को डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का जन्मदिन (मंगलवार), 27 मई को बकरी ईद (ईद-उल-अजा) (बुधवार), 26 जून को मुहर्रम (शुक्रवार), 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस एवं पारसी नव वर्ष दिवस-पटेटी (शनिवार), 26 अगस्त को ईद-ए-मिलादुन्नबी (बारा वफात) (बुधवार), 28 अगस्त को रक्षा बंधन (शुक्रवार), 4 सितंबर को जन्माष्टमी (श्रावण वाद-8) (शुक्रवार), 15 सितंबर को संवत्सरी/गणेश चतुर्थी (सोमवार), 2 अक्टूबर को महात्मा गांधी का जन्मदिन (शुक्रवार), 20 अक्टूबर को दशहरा (विजय दशमी) (मंगलवार), 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्मदिन (शनिवार), 8 नवंबर को दीपावली (रविवार), 10 नवंबर को विक्रम संवत् नव वर्ष दिवस (सोमवार), 11 नवंबर को भाई बीज (बुधवार), 24 नवंबर को गुरु नानक जयंती (मंगलवार), तथा 25 दिसंबर को क्रिसमस (शुक्रवार)
महाशिवरात्रि (15 फरवरी), परशुराम जयंती (19 अप्रैल) एवं दीपावली (8 नवंबर) रविवार को पड़ने के कारण अतिरिक्त अवकाश का लाभ नहीं मिलेगा, जबकि बुद्ध पूर्णिमा (1 मई) को गजेटेड अवकाश के रूप में शामिल नहीं किया गया है, इसे ऑप्शनल होलिडेज की सूची में शामिल किया गया है ।
बुद्ध पूर्णिमा का महत्व बौद्ध धर्म के अनुयायियों और अंबेडकरवदियों के लिए अत्यंत गहन और बहुआयामी है। यह पर्व वैशाख मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, जो गौतम बुद्ध के जन्म, ज्ञान प्राप्ति (बोधि) और महापरिनिर्वाण (निर्वाण) की त्रयी घटनाओं का प्रतीक है। लगभग 2500 वर्ष पूर्व लुम्बिनी (नेपाल) में जन्मे सिद्धार्थ गौतम ने 35 वर्ष की आयु में बोधगया (बिहार) में पीपल वृक्ष के नीचे कठोर तपस्या के बाद बुद्धत्व प्राप्त किया, जिसके माध्यम से उन्होंने अष्टांगिक मार्ग, चार आर्य सत्य और अहिंसा-करुणा जैसे सिद्धांतों का प्रतिपादन किया।
बुद्ध पूर्णिमा न केवल धार्मिक उत्सव है, बल्कि सामाजिक समानता, नैतिकता और शांति का संदेश देता है, जो आधुनिक विश्व की समस्याओं जैसे हिंसा, असमानता और पर्यावरण संकट से जूझने में प्रासंगिक है। भारत में डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा 1956 में लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म अपनाने के बाद यह पर्व दलित बौद्ध समुदाय के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गया है, जो जातिगत भेदभाव के विरुद्ध एक सांस्कृतिक प्रतिरोध का प्रतीक बन चुका है। इस वर्ष भी देशभर में लाखों अनुयायियों ने ध्यान, प्रार्थना सभाएं और बौद्ध ग्रंथों का पाठ कर इसकी सार्थकता को चरितार्थ किया।
केंद्र सरकार की छुट्टियों की सूची में बुद्ध पूर्णिमा को गजेटेड छुट्टी के रूप में शामिल किया गया है, जिसके तहत केंद्रीय कार्यालय, बैंक और सार्वजनिक संस्थान बंद रहते हैं।दूसरी ओर कई अन्य राज्यों में बुद्ध पूर्णिमा को गजेटेड सार्वजनिक छुट्टी का दर्जा प्राप्त है, जो बौद्ध आबादी और सांस्कृतिक महत्व को ध्यान में रखते हुए घोषित की जाती है।
महाराष्ट्र सरकार ने 12 मई को पूर्ण रूप से स्कूल-कॉलेज और सरकारी कार्यालय बंद रखे, जबकि झारखंड और जम्मू-कश्मीर में भी इसे अनिवार्य छुट्टी घोषित किया गया। उत्तर प्रदेश, जहां बौद्ध तीर्थस्थलों की प्रचुरता है, ने भी इसे सार्वजनिक छुट्टी के रूप में मान्यता दी। ये राज्य बौद्ध समुदाय की मांगों को सम्मान देते हुए इस पर्व को राष्ट्रीय एकता का हिस्सा मानते हैं, जबकि गुजरात जैसे राज्यों में इसकी अनुपस्थिति असमानता का प्रतीक बन गई है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को 'बुद्ध की धरती' बताते हुए कहा है कि 'भारत ने विश्व को बुद्ध दिया है, युद्ध नहीं'। सितंबर 28, 2019 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा- दुनिया को युद्ध नहीं बुद्ध दिए हैं, शांति का संदेश दिया है।"
इसी प्रकार अप्रैल 2023 में ग्लोबल बौद्ध समिट में उन्होंने बुद्ध की शिक्षाओं को आधुनिक समस्याओं का समाधान बताते हुए कहा, "भारत ने विश्व को बुद्ध का संदेश दिया, न कि युद्ध का।" जुलाई 2024 में ऑस्ट्रिया यात्रा के दौरान वियना में भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए भी उन्होंने यही बात दोहराई।
ये बयान भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूत करने के लिए दिए जाते हैं, लेकिन गुजरात सरकार (जो भाजपा शासित है) द्वारा बुद्ध पूर्णिमा को गजेटेड छुट्टी न घोषित करना एक विरोधाभास पैदा करता है। गुजरात, जहां मोदी का गृह राज्य होने के नाते बौद्ध विरासत को बढ़ावा देने की अपेक्षा की जाती है, वहां सरकारी स्तर पर इसकी उपेक्षा समुदाय को निराश कर रही है।
अमरावती (महाराष्ट्र) के भन्तेजी आनंद (बौद्ध भिक्षु ) काफी समय से गुजरात के कई गांव कस्बों में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। भन्तेजी आनंद के मुताबिक महाराष्ट्र में बाबा साहब द्वारा बौद्ध धर्म 1956 में अंगीकार करने के बाद लाखों की संख्या में लोगों ने हिन्दू धर्म का परित्याग किया । महाराष्ट्र में 95 फीसदी दलित बौद्ध धर्म अपना चुके हैं और सशक्त बन चुके हैं। भंते आनंद कहते हैं कि बौद्ध धर्म अपनाने वालों के जीवन में करिश्माई परिवर्तन हुए हैं, इनका जीवन स्तर, रहन सहन और शिक्षा का स्तर सुधरा है, दलित अत्याचारों के मामले कम हुए हैं, भेदभाव से विमुक्त हो गए हैं। वे कहते हैं कि बीते कुछ वर्षों में गुजरात में बौद्ध धर्मावलंबियों की संख्या तेजी से बढ़ी है क्योंकि प्रांत में दलित समुदाय जागरूक है।
वर्ष 2006 में राजकोट में 50 समान विचारधारा वाले दलित सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा स्थापित स्वयं सैनिक दल (एसएसडी) प्रदेश में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार में सबसे आगे है। स्वयं सैनिक दल के सदस्य संजय बौद्ध कहते हैं कि बौद्ध धर्मावलम्बियों से भी कम आबादीवाले समुदाय के लिए भी सरकार अवकाश देती है लेकिन हमारे SC कम्युनिटी के सदस्य जो गुजरात की सत्ताधारी पार्टी में हैं उन्होंने भी इस गैरबराबरी वाले सिस्टम के सामने यह सवाल नहीं उठाये हैं जो दुखद है ।
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