नई दिल्ली- कर्नाटक हाई कोर्ट ने सोमवार को राज्य सरकार को बड़ा झटका देते हुए अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के आरक्षण को 50 प्रतिशत की सीमा से आगे बढ़ाने वाले कानून को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि यह बढ़ोतरी "संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य" है।
मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और जस्टिस के.एस. हेमलेखा की खंडपीठ ने कर्नाटक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण और राज्य के अधीन सेवाओं में नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) अधिनियम, 2022 की धारा 3 और धारा 4 को संविधान के विरुद्ध (अल्ट्रा वायरस) घोषित करते हुए रद्द कर दिया।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 1992 में 'इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ' मामले में फ़ैसला सुनाते हुए 50 प्रतिशत की सीमा तय की थी और बाद के फ़ैसलों में भी इसे बरकरार रखा गया।
कर्नाटक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (शैक्षणिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण और राज्य के अधीन सेवाओं में नियुक्तियों या पदों का आरक्षण) अधिनियम, 2022 कर्नाटक सरकार द्वारा बनाया गया एक कानून था, जिसका उद्देश्य राज्य में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण का प्रतिशत बढ़ाना था। यह कानून पूर्व भाजपा सरकार के कार्यकाल में, बसवराज बोम्मई के नेतृत्व में बनाया गया था।
धारा 3: शैक्षणिक संस्थानों में सीटों का आरक्षण:
इस धारा के तहत, राज्य के शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए अनुसूचित जाति (SC) का आरक्षण 15% से बढ़ाकर 17% और अनुसूचित जनजाति (ST) का आरक्षण 3% से बढ़ाकर 7% किया गया था।
धारा 4: राज्य के अधीन सेवाओं (सरकारी नौकरियों) में नियुक्तियों या पदों का आरक्षण
इस धारा के तहत, राज्य सरकार की सेवाओं और सरकारी नौकरियों में भी SC आरक्षण को 15% से 17% और ST आरक्षण को 3% से 7% किया गया था।
कुल प्रभाव: इस बढ़ोतरी के बाद कर्नाटक में एससी (17%), एसटी (7%) और अन्य पिछड़ा वर्ग/OBC (32%) को मिलाकर कुल आरक्षण 50% से बढ़कर 56% हो गया था।
अदालत ने कहा कि यह बढ़ोतरी संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 का उल्लंघन करती है, जो कानून के समक्ष समानता की गारंटी देते हैं और भेदभाव पर रोक लगाते हैं। सरकारी सेवाओं में बढ़े हुए आरक्षण से जुड़े प्रावधान को भी रद्द किया गया। इसके लिए अदालत ने अनुच्छेद 16 का हवाला दिया, जो सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता का प्रावधान करता है।
अदालत ने माना कि कुल आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा एक बाध्यकारी संवैधानिक सिद्धांत है। यह सीमा सुप्रीम कोर्ट ने 1992 के इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ फैसले में तय की थी और बाद के फैसलों में भी इसे बरकरार रखा गया है।
राज्य सरकार ने SC/ST के प्रतिनिधित्व से जुड़ी रिपोर्टों और सिफारिशों के आधार पर बढ़ोतरी को सही ठहराया था। लेकिन हाई कोर्ट ने कहा कि अपर्याप्त प्रतिनिधित्व की चिंता अपने आप में तय सीमा को लांघने का आधार नहीं हो सकती।
कानून की संवैधानिक वैधता को याचिकाओं के जरिए चुनौती दी गई थी।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीनियर आईआरएस अफसर नेत्रपाल ने x पोस्ट पर लिखा, " कर्नाटक में SC/ST आरक्षण में 6% की बढ़ोतरी, जिससे कुल आरक्षण 50% से बढ़कर 56% हो गया था, उसे कर्नाटक हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया है। नौवीं अनुसूची में शामिल किए बिना 50% आरक्षण की सीमा का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। इस तर्क के आधार पर, तमिलनाडु के 69% आरक्षण के बने रहने की संभावना बहुत कम है। कई लोग तो यह भी कहते हैं कि वह भी टिकने लायक नहीं है। इसलिए, उन नेताओं की बातों पर भरोसा न करें जो आकर कहते हैं कि वे आरक्षण को 50% से ज़्यादा बढ़ा देंगे। फिलहाल ऐसा करना मुमकिन नहीं है।"
राज्य सरकार ने संकेत दिया है कि वह कानूनी विकल्पों पर विचार करेगी, जिनमें सुप्रीम कोर्ट में अपील भी शामिल है।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने केंद्र सरकार से 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा की समीक्षा करने और बढ़े हुए कोटे को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने के कर्नाटक के अनुरोध पर पुनर्विचार करने की अपील की। उन्होंने पिछली सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि उसने प्रस्तावित संवैधानिक सुरक्षा हासिल किए बिना ही कानून बना दिया। केंद्र ने मामला हाई कोर्ट में लंबित होने के कारण नौवीं अनुसूची में शामिल करने का कर्नाटक का अनुरोध टाल दिया था।
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