नई दिल्ली। भारत मंडपम में जारी विश्व पुस्तक मेले के पाँचवाँ दिन युवा कवियों के नए कविता-संग्रहों के नाम रहा। बुधवार को राजकमल प्रकाशन समूह के स्टॉल पर चार कवियों के नए कविता संग्रह― केतन यादव का ‘एक चरवाहे का गीत’, रूपम मिश्र का ‘हँसी और देस’, अनुपम सिंह का ‘साँवली इबारतें’ और अदनान कफ़ील दरवेश का संग्रह ‘लानत का प्याला’ का लोकार्पण हुआ। साथ ही ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी की आत्मकथा ‘दियासलाई’, संतोष चौबे के कहानी-संग्रह ‘ग़रीबनवाज़’, राघव प्रकाश और सविता पाईवाल की किताब ‘सर्जनात्मक शिक्षा’, स्त्री वर्ष में प्रकाशित प्रत्यक्षा के उपन्यास ‘शीशाघर’ पर चर्चा हुई।
कार्यक्रम के पहले सत्र में केतन यादव के कविता-संग्रह ‘एक चरवाहे का गीत’ का लोकार्पण हुआ। संग्रह पर बातचीत के क्रम में केतन यादव ने कहा कि लिखने की शुरुआत पढ़ने के साथ ही हो जाती है। बचपन से ही कला की दुनिया, संगीत, साहित्य, कविताओं को पाठ्यक्रम में पढ़ना होता था। मैंने पहली बार कविता स्कूल के दिनों में लिखी थी तब से लेकर आज तक लगातार यह सिलसिला चल रहा है। स्कूल, कॉलेज की पत्रिकाओं में मेरी कविताएं प्रकाशित होने से मुझे लिखने का बल मिला और लिखना ही इस यात्रा सुख का है। इस दौरान केतन यादव ने संग्रह से कुछ कविताओं का पाठ भी किया।
दूसरे सत्र में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित लेखक कैलाश सत्यार्थी की आत्मकथा ‘दियासलाई’ पर चर्चा हुई। बातचीत के क्रम में कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि इस किताब में मैंने अपने सत्तर सालों के जीवन के बारे में लिखा है। बहुत छोटी उम्र से ही मुझमें लिखने का शौक़ रहा है। इंजीनियरिंग करने के बाद भी मन हिन्दी में लगा रहा। इस आत्मकथा के नाम के पीछे दो बातें हैं― पहली विदिशा, जहाँ मैं पल बढ़ा। उस समय हमारे घर में बिजली नहीं होती थी, कई बार हम छोटी-सी ढिबरी जलाकर पढ़ते थे। उसे जलाने के लिए हमें दियासलाई की ज़रूरत होती थी। दियासलाई देखने में तो छोटी होती है पर रौशनी बहुत करती है। दियासलाई के अंदर रौशनी नज़र नहीं आती पर आप उससे दुनिया को रौशन कर सकते हैं। दूसरा कारण यह है कि दियासलाई ख़ुद को नष्ट करके रौशनी फैलाते हुए अपने अस्तित्व को ख़त्म कर देती है। हमारे देश में गांधी, भगत सिंह, अशफ़ाक उल्ला खां आदि जितने महापुरुष हुए हैं। यह सब लोग दियासलाई थे। ये सब लोग ख़ुद को जलाकर देश को आज़ादी दे गए।
उन्होंने आगे कहा कि एक समय था जब बच्चे पत्थरों तोड़ते हुए, ईंटों के भट्ठों में काम करते हुए मर जाते थे लेकिन लोग बच्चों के बारे बात नहीं करते थे। बच्चों के लिए मैंने जो ये काम किए थे उसके लिए मेरे मन में तड़प थी, करुणा और दया भाव था। करुणा एक ताक़तवर भाव है यह आपको काम करने के लिए प्रेरित करती है। इससे जो गुस्सा और साहस पैदा होता है वहीं दूसरों की सहायता करने के लिए आपको प्रेरित करता है। हर व्यक्ति महान है, हम सब में महानता छुपी हुई है, सबमें समाज कल्याण की प्रतिभा है उसे देश के लिए इस्तेमाल कीजिए।
जिन बच्चों के साथ हमारा समय गुज़रा, उनका वर्णन भी इस किताब में मिलेगा। यह आंदोलन हमने उन बच्चों के लिए खड़ा किया जिनके घरवाले यह उम्मीद छोड़ चुके थे कि वे अपने बच्चों को देख भी पायेंगे। मैं मानता हूँ कि यह किताब आपके भीतर की करुणा और महत्ता को जगाने आपकी मदद करेगी।
तीसरे सत्र में संतोष चौबे के कहानी संग्रह ‘ग़रीबनवाज़’ पर चर्चा हुई। बातचीत के क्रम में कहानीकार संतोष चौबे ने कहा कि मेरी कहानियों में दृश्य बनते जाते हैं उसी में मैं कहानी कहता हूँ यह लंबी कहानियों का संग्रह है। कहानी का दृश्य या परिदृश्य लंबा होता है इसलिए लंबी कहानी लिखी जाती है, इसमें भीतर और कहानी होती हैं। मेरी पहली लंबी कहानी कृतिम बुध्दिमत्ता के बारे में तीस चालीस साल पहले ही अनुमान लगा चुकी है। मेरी कहानी में सपनों का ज़्यादा महत्व है, मेरी कहानी भविष्य का पूर्वानुमान भी लगाती है।
अगले सत्र में राघव प्रकाश और सविता पाईवाल की किताब ‘सर्जनात्मक शिक्षा’ पर चर्चा हुई। किताब पर बातचीत के दौरान राघव प्रकाश ने कहा कि सभी सत्ताएँ शिक्षा के विरुद्ध होती हैं, सत्ताएँ चाहती हैं किसी भी तरह से उसकी जनता के बीच शिक्षा नहीं पहुँचे ताकि वह उस समाज का तार्किक विश्लेषण करने में असमर्थ रहे और सत्ता से सवाल न कर पाए। गुरुकुल राजनीति से दूर थे इसलिए शिक्षा को उच्च स्तर पर ले गए। प्लेटो, अरस्तू आदि लोगों ने राजनीति से दूर रहकर शिक्षा को बनाया। सर्जनात्मक दृष्टि के आधार पर मनुष्य इतना आगे आ पाया है उसका कारण शिक्षा है। शिक्षा मनुष्य की सबसे मूल्यवान वस्तु है, शिक्षा का विकास राजनीति से दूर रहकर किया जाना चाहिए।
आगे उन्होंने कहा कि शिक्षा का संबंध सभी से है, हर अभिभावक सर्जनात्मक शिक्षा का पाठक है। हर शिक्षक को यह किताब पढ़नी चाहिए। हमें विद्यार्थियों की आवश्यकताओं को समझते हुए शिक्षा पद्धति विकसित करनी होगी। शिक्षा पर बहुत सारी किताबें पढ़ने और विश्व भर की गोष्ठियों में भाग लेने के बाद मैंने इस किताब को लिखा है। आज जब हमारे देश में पाश्चात्य शिक्षा पद्धति की नकल चल रही है ऐसे में यह पुस्तक इस समस्या का समाधान प्रदान करेगी।
अगले सत्र में प्रत्यक्षा के उपन्यास ‘शीशाघर’ पर चर्चा हुई। इस उपन्यास के केन्द्र में एक परिवार है जो सन् सैंतालिस में बिखरना शुरू होता है और बिखरता ही जाता है। विभाजन और बिखराव की त्रासदी से ज़्यादा यह उपन्यास उस अन्दरूनी इनसानी एकता के बारे में है जो इसके चरित्रों को बिखरकर भी बिखरने नहीं देती है। एक-दूसरे से हज़ारों किलोमीटर दूर, दूसरे देशों में अपना रोज़मर्रा का जीवन जीते हुए भी वे एक-दूसरे से गहरे तौर पर जुड़े हुए हैं। चर्चा के दौरान संचालक मनोज कुमार पाण्डेय ने कहा कि यह उपन्यास ‘शीशाघर’ राजकमल प्रकाशन के ‘स्त्री वर्ष’ के तहत प्रकाशित हुआ है। इन उपन्यासों को पढ़ते हुए देखा जा सकता हैआज तरीके से विभाजन केंद्रीय भूमिका में रहा है।
बातचीत के क्रम में उपन्यासकार प्रत्यक्षा ने कहा, स्त्री वर्ष के तहत प्रकाशित उपन्यासों की विषयवस्तु देखकर लगता है कि सभी लेखक कॉन्शियस हैं। लेखकों में संयोगवश आई यह सामूहिक चेतना दर्शाती है कि हम किस तरह के समय और समाज में जी रहे हैं, यह दर्ज़ करना ज़रूरी है। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है हम किस तरह की दुनिया में रहना चाहते हैं। इस उपन्यास में भी सभी पात्र कुछ न कुछ खोज रहे हैं, एक बेहतर दुनिया की तलाश में हैं।
इसके बाद रूपम मिश्र के नए कविता-संग्रह ‘हँसी और देस’, अनुपम सिंह के नए कविता-संग्रह ‘साँवली इबारतें’ और अदनान कफ़ील दरवेश के नए कविता-संग्रह ‘लानत का प्याला’ का लोकार्पण हुआ। इस दौरान कवियों ने अपने संग्रहों से चुनिंदा कविताओं का पाठ किया।
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