साहित्य, सिनेमा और स्त्री-विमर्श: विश्व पुस्तक मेले में गूंजी 'आल्हकथा' और 'उम्मीदों के गीत'

विश्व पुस्तक मेला: राजकमल स्टॉल पर ‘आल्हकथा’ और ‘शैलेन्द्र’ समेत 3 नई किताबों का लोकार्पण, लेखकों ने साझा किए अपने अनुभव
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साहित्य, सिनेमा और स्त्री-विमर्श: विश्व पुस्तक मेले में गूंजी 'आल्हकथा' और 'उम्मीदों के गीत'Pic- राजकमल प्रकाशन
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नई दिल्ली। विश्व पुस्तक मेले के चौथे दिन राजकमल प्रकाशन समूह के स्टॉल पर आयोजित कार्यक्रम में तीन नई किताबों― महेश कटारे के उपन्यास ‘आल्हकथा’, नंद भारद्वाज की किताब ‘कृष्णा सोबती की कथा यात्रा’, रुचिरा गुप्ता के अनूदित उपन्यास ‘मैं लड़ी और उड़ी’ का लोकार्पण हुआ और ‘लेखक से मिलिए’ शृंखला में ‘उम्मीदों के गीतकार : शैलेन्द्र’ किताब के लेखक यूनुस खान, ‘सरकफंदा’ उपन्यास की लेखक वन्दना राग, ‘कहानी से संवाद’ किताब की लेखक रश्मि रावत और ‘कामनाओं की मुंडेर पर’ कहानी-संग्रह की लेखक गीताश्री ने पाठकों से मुलाक़ात और बातचीत की।

कार्यक्रम के पहले सत्र में नंद भारद्वाज की किताब ‘कृष्णा सोबती की कथा यात्रा’ का लोकार्पण हुआ। यह किताब कृष्णा सोबती के लेखन की व्यापकता को रेखांकित करती है और बताती है कि उनके लेखन को किसी एक दौर, जगह या कुछ चुने हुए विषयों तक बाँधकर नहीं देखा जा सकता। किताब पर बातचीत के क्रम में लेखक नंद भारद्वाज ने कहा, मैं कृष्णा सोबती को अपने विद्यार्थी जीवन से पढ़ता रहा हूँ। कृष्णा सोबती को समझे बग़ैर हिन्दी के एक बड़े पक्ष को समझना असंभव होगा। सांप्रदायिक समस्याओं को जिस तरह वे अपनी लेखनी में सहेजती रही हैं, वह अतुलनीय है। कृष्णा सोबती की रचनाओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उनके लेखन ने भाषा को स्त्री और पुरुष की भाषा से अधिक मनुष्य की भाषा पर लाकर भाषाई ढांचे को तोड़ा है, बेशक वे उसकी स्वतंत्रता की बड़ी पैरोकार हैं लेकिन उसकी मुक्ति को सामाजिक विकास की प्रक्रिया के साथ देखती हैं। कृष्णा सोबती की लेखनी हमेशा लोक से जुड़ी हुई रही है, इसलिए उनका लेखन सार्थक रहा।

दूसरे सत्र में यूनुस ख़ान की किताब ‘उम्मीदों के गीतकार : शैलेन्द्र’ पर चर्चा आयोजित की गई। इस किताब में शैलेन्द्र के गानों, फ़िल्म की पटकथा और किरदारों का विश्लेषण उस समय और समाज की रोशनी में किया गया है। किताब पर चर्चा करते हुए यूनुस खान ने कहा, इस किताब में शैलेन्द्र के सिनेमा के सफ़र और गानों के बनने की दिलचस्प कहानियों के बारे में बताया गया है। फ़िल्मी गानों के अपने दायरे, अपनी सीमा-रेखा होती है। उन्हें फ़िल्म की स्क्रिप्ट और किरदारों की उँगली पकड़कर चलना पड़ता है, धुन के खाँचे में फ़िट होना पड़ता है। इस किताब में चैप्टर दर चैप्टर यही लिखा गया है कि गीतकार, संगीतकार, कहानीकार, पटकथा लेखक, निर्देशक, गायक, प्रोडक्शन टीम किस तरीके से डिस्कशन करके गाने को बनाते थे। इस किताब का उद्देश्य है शैलेन्द्र के गीतों को सेलिब्रेट करना। किताब के बारे में गीताश्री ने कहा कि इसे पढ़ते हुए पाठक का नज़रिया बदल जाता है। जब किताब में गानों का ज़िक्र आता है तो उन्हें सुनने का मन करता है, और फ़िल्मों का नाम आते ही उन्हें देखने का। इस तरह किताब आपको बार-बार रोकती है, और यही इसकी सबसे बड़ी ख़ूबसूरती है।

तीसरे सत्र में रुचिरा गुप्ता के अनूदित उपन्यास ‘मैं लड़ी और उड़ी’ का लोकार्पण हुआ। अंग्रेज़ी से इस उपन्यास का अनुवाद प्रणव शर्मा ने किया है। उपन्यास के संदर्भ में अनुवादक से बातचीत के क्रम में रुचिरा गुप्ता ने बताया कि यह कृति देह व्यापार को कम करने की दिशा में एक साहित्यिक प्रयास है। यह बिहार के फारबिसगंज स्थित एक नट समुदाय की कहानी है, जिसकी मुख्य पात्र हीरा है। कर्ज चुकाने के लिए उसके पिता द्वारा उसे सेक्स ट्रेड में बेचने का फैसला किया जाता है। उपन्यास हीरा के इसी संघर्ष और प्रतिरोध की मार्मिक कथा प्रस्तुत करता है।

चौथे सत्र में वन्दना राग के उपन्यास ‘सरकफंदा’ पर चर्चा हुई। यह उपन्यास विभाजन की डरावनी निरन्तरता के बारे में है, जहाँ लोग देश से प्यार का दम तो भरते हैं लेकिन आपसी बन्धुत्व की भावना को ख़त्म करने में लगे हैं। मनोज कुमार पाण्डेय से बातचीत के क्रम में उपन्यासकार वंदना राग ने कहा कि बिल्ली इस उपन्यास की एक महत्वपूर्ण पात्र है। उसको दरकिनार करके इस उपन्यास को नहीं पढ़ा जा सकता है। इस उपन्यास में बिल्ली एक लाइब्रेरियन है, वह एक मेटॉफर भी है। लाइब्रेरियन ही वह आदमी है जो हमें विविध प्रकार के ज्ञान व किताबों से परिचित कराते हैं। जब तक हमारे जीवन में किताबें हैं तभी तक हम मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। मैं कभी-कभी सोचती हूँ कि जब लाइब्रेरियन नहीं रहेगा, किताबें ख़त्म हो जाएंगी तब जीवन कैसे जिया जाएगा। इसमें बिल्ली के माध्यम से एक गुहार है एक पुकार है जो कोमल भावनाओं को बचाए रखना चाहती है।

पाँचवें सत्र में महेश कटारे के उपन्यास ‘आल्हकथा’ का लोकार्पण हुआ। यह उपन्यास इतिहास और लोक-स्मृतियों को आधार बनाकर महोबा के महान योद्धाओं आल्हा ऊदल और उनके ऐतिहासिक व सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को एक रचनात्मक आकार देने का प्रयास करता है। बातचीत के क्रम में महेश कटारे ने कहा आज के समय में सभी लोगों में आगे बढ़ने की होड़ लगी हुई है। इस आगे बढ़ने के क्रम में वे प्रवाह में बहे चले जा रहे हैं, उन्हें अपनी संस्कृति और इतिहास की जानकारी नहीं है। उन्हें नहीं मालूम कि किस तरह उनका उत्थान हुआ, किस तरह उनका पतन हुआ। वे कौन से कलाकार, रचनाकार हुए जिन्होंने भारतीयता को समृद्ध किया। हम जानते हैं कि उत्तर भारत में रामायण, महाभारत के बाद सर्वाधिक लोकव्याप्ति आल्हा की ही रही है। इन ग्रंथों, गाथाओं की जानकारी नई पीढ़ी से ग़ायब होती जा रही है इसलिए मुझे लगा कि बुंदेलखंड के इन गीतों को सामने लाना चाहिए।

अगले सत्र में रश्मि रावत की आलोचनात्मक किताब ‘कहानी से संवाद’ पर चर्चा हुई। इस दौरान लेखक ने कहानी विधा, पाठक-लेखक संवाद और समकालीन कथा साहित्य के बदलते स्वरूप पर अपने विचार साझा किए। बातचीत के दौरान उन्होंने कहा, आलोचना शब्द का अर्थ आज के समय में नकारात्मक रूप में प्रयोग किया जा रहा है, यह किताब आलोचना की उस परिपाटी से आगे जाती है जो दी गई कसौटियों पर कहानी या किसी रचना को विश्लेषित कर अपने काम को पूरा मान लेते हैं। हमारे पूरे समाज से ही आलोचनात्मक गुण गायब हो गया है। अभिव्यक्ति को सिकोड़ने की कोशिश की जा रही है। आलोचना भी एक बेहद गंभीर विधा है जो साहित्य की अलग विधाओं को रचने के समान समय की मांग करती है। प्रचलित राय पर अधिक समय देने के बाद भी अंतत: महसूस होने के बाद ही आलोचना बनती है।

अंतिम सत्र में गीताश्री के कहानी-संग्रह ‘कामनाओं की मुंडेर पर’ पर चर्चा के दौरान लेखक ने कहा, मैं बहुत सारी बंदिशें, बहुत सारे बंधन झेलकर आई हूँ। मैंने उन तमाम स्त्रियों को देखा है जिनमें आकांक्षाएं हैं, सपने हैं, महत्वाकांक्षाएं हैं, जो कामनाओं की मुंडेर पर खड़ी हैं। आज हमने अपना रास्ता खोज लिया है, लेकिन आज भी ऐसी बहुत सी स्त्रियाँ हैं जिनके सपने अपने ही घर के भीतर दफ़्न हैं। उनके लिए उनका विवाह ही जेल है।

उन्होंने कहा, मैं लड़ाका हूँ, थोड़े अच्छे शब्दों में कहें तो योद्धा हूँ। मैं उन स्त्रियों के लिए लड़ती हूँ जिनसे उनका हक़ छीन लिया गया या जिन्हें पता ही नहीं है कि यह उनका हक़ है। अपने हक़ के लिए लड़ना ही पड़ता है, बिना लड़ाई कुछ नहीं मिलता है।

इस दौरान पाठकों ने लेखक गीताश्री से बातचीत की और लेखक ने कहानी-संग्रह से कहानी ‘अफ़सानाबाज़’ का अंशपाठ किया।

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