MP: पोस्टर में ‘हरिजन’ शब्द से भड़का विवाद! SC संगठनों का आरोप, जानकारी के बावजूद प्रतिबंधित शब्द का इस्तेमाल TM Exclusive

सामाजिक संगठनों का यह भी कहना है कि “हरिजन” शब्द को लंबे समय से दलित समाज द्वारा अस्वीकार किया जा चुका है।
MP: पोस्टर में ‘हरिजन’ शब्द से भड़का विवाद! SC संगठनों का आरोप, जानकारी के बावजूद प्रतिबंधित शब्द का इस्तेमाल TM Exclusive
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भोपाल। मध्यप्रदेश के सतना जिले के मैहर क्षेत्र के ग्राम भेड़ा में आयोजित होने वाले एक कार्यक्रम के पोस्टर में “हरिजन” शब्द के इस्तेमाल को लेकर शुरू हुआ विवाद अब और गहराता जा रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने न सिर्फ वर्तमान आयोजकों पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पिछले साल मार्च 2025 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह द्वारा इसी शब्द के उपयोग से जुड़े विवाद को भी फिर से चर्चा में ला दिया है। सामाजिक और अनुसूचित जाति संगठनों का कहना है कि बार-बार ऐसे मामलों का सामने आना यह दिखाता है कि संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक संवेदनशीलता को लेकर अब भी गंभीरता की कमी है।

दरअसल, ग्राम भेड़ा में 20 अप्रैल 2026 को प्रस्तावित “श्री रामचरित मानस एवं शिव प्राण प्रतिष्ठा” और “लोकतंत्र बचाओ महासम्मेलन” कार्यक्रम के पोस्टर में “पंच, सरपंच, हरिजन, आदिवासी, किसान, मजदूर” जैसे शब्दों का उल्लेख किया गया है। पोस्टर में “हरिजन” शब्द स्पष्ट रूप से लिखा गया है, जबकि केंद्र सरकार और संवैधानिक संस्थाएं इस शब्द के उपयोग पर पहले ही रोक लगा चुकी हैं। इस पोस्टर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है और कई संगठनों ने इसे सीधे तौर पर संविधान विरोधी बताया है।

पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने मंच पर किया था हरिजन शब्द का उपयोग

इस नए विवाद के साथ ही मार्च 2025 की वह घटना भी फिर से सामने आ गई है, जब सतना जिले में एक कार्यक्रम के दौरान अजय सिंह ने अपने भाषण में “हरिजन” शब्द का उपयोग किया था। इतना ही नहीं, उन्होंने सोशल मीडिया पर भी इस शब्द का प्रयोग किया था, जिसके बाद अनुसूचित जाति संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश फैल गया था। भीम आर्मी सहित कई संगठनों ने उस समय अजय सिंह के खिलाफ SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम (एट्रोसिटी एक्ट) के तहत मामला दर्ज करने की मांग की थी। संगठनों का कहना था कि एक वरिष्ठ और जिम्मेदार राजनीतिक नेता द्वारा इस तरह के शब्द का इस्तेमाल करना न सिर्फ गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि यह दलित समाज के सम्मान पर सीधा आघात है।

सामाजिक संगठनों का यह भी कहना है कि “हरिजन” शब्द को लंबे समय से दलित समाज द्वारा अस्वीकार किया जा चुका है। डॉ. भीमराव अंबेडकर और अन्य दलित चिंतकों ने इसे वास्तविक सामाजिक भेदभाव को ढंकने वाला शब्द बताया था। उनका मानना था कि यह शब्द दलितों की पीड़ा और संघर्ष को कमतर करके दिखाता है। इसी वजह से समय के साथ इस शब्द को अपमानजनक और असंवैधानिक मानते हुए इसके उपयोग को हतोत्साहित किया गया।

आजाद समाज पार्टी ने कहा- भूल या साजिश?

द मूकनायक से बातचीत में आजाद समाज पार्टी के नेता सुनील अस्तेय ने इस मामले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि यह महज एक भूल है या फिर सुनियोजित साजिश, क्योंकि जानकारी होने के बावजूद अनुसूचित जाति वर्ग को ‘हरिजन’ शब्द कहकर अपमानित किया जा रहा है। उनके अनुसार यह सिर्फ भाषाई चूक नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी है।

उन्होंने आगे कहा कि ऐसे मामलों में आयोजकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। यदि कोई भी संस्था या नेता सार्वजनिक रूप से इस शब्द का उपयोग करता है, तो प्रशासन को तुरंत अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज करना चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाई जा सके।

आजक्स ने की निंदा

अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी कर्मचारी संघ (आजक्स) के प्रांतीय प्रवक्ता विजय शंकर श्रवण ने इस मामले पर कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि इस तरह के शब्दों का उपयोग असंवैधानिक और असंसदीय है, और यह न सिर्फ सामाजिक रूप से आपत्तिजनक है बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं का भी उल्लंघन करता है।

उन्होंने आगे कहा कि आयोजकों को विशेष रूप से सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से कानूनी परिणाम भी सामने आ सकते हैं। यदि कोई व्यक्ति या संस्था सार्वजनिक रूप से इस तरह की भाषा का प्रयोग करती है, तो कानून के तहत उनके खिलाफ आपराधिक मामला भी दर्ज किया जा सकता है।

हरिजन शब्द कब हुआ प्रतिबंधित

सरकारी स्तर पर भी इस संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जा चुके हैं। 1980 में अनुसूचित जाति आयोग ने “हरिजन” शब्द को अपमानजनक करार दिया था। इसके बाद केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट और नेशनल कमीशन फॉर शेड्यूल्ड कास्ट्स (NCSC) ने कई बार निर्देश जारी कर सरकारी दस्तावेजों, भाषणों और सार्वजनिक मंचों पर इस शब्द के उपयोग से बचने को कहा है। इसके बावजूद बार-बार ऐसे मामलों का सामने आना प्रशासनिक और सामाजिक जागरूकता पर सवाल खड़े करता है।

कानूनी दृष्टि से भी यह मामला गंभीर है। SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 की धारा 3(1)(u) के तहत अनुसूचित जाति या जनजाति के किसी व्यक्ति के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करना दंडनीय अपराध है। इस प्रावधान के तहत दोषी पाए जाने पर पांच साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। ऐसे में पोस्टर में इस शब्द का उपयोग करने वाले आयोजकों पर भी कानूनी कार्रवाई की मांग उठने लगी है।

SC आयोग लिख चुका है सीएम को पत्र

मध्यप्रदेश राज्य अनुसूचित जाति आयोग के तत्कालीन सदस्य प्रदीप अहिरवार ने ‘हरिजन’ शब्द के उपयोग को लेकर अगस्त 2020 में मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई थी। उन्होंने अपने पत्र में उल्लेख किया था कि सार्वजनिक और शासकीय अभिलेखों में इस शब्द का उपयोग भारत सरकार द्वारा प्रतिबंधित किया जा चुका है, इसके बावजूद कई स्थानों पर इसका प्रयोग जारी है, जो न सिर्फ असंवैधानिक है बल्कि अनुसूचित जाति वर्ग की भावनाओं को भी आहत करता है।

आयोग के सदस्य अहिरवार ने मुख्यमंत्री से मांग की थी कि इस संबंध में स्पष्ट और सख्त निर्देश जारी किए जाएं, ताकि राज्य में कहीं भी ‘हरिजन’ शब्द का उपयोग न हो। उन्होंने यह भी कहा था कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों के अनुरूप राज्य स्तर पर प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, जिससे अनुसूचित जाति वर्ग के सम्मान और अधिकारों की रक्षा हो सके।

आयोजकों पर हो सकती है कार्रवाई

द मूकनायक से बातचीत में विधि विशेषज्ञ एवं अधिवक्ता मयंक सिंह ने कहा कि अनुसूचित जाति वर्ग के लिए अपमानजनक या प्रतिबंधित शब्दों का सार्वजनिक उपयोग कानूनन अपराध की श्रेणी में आ सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया 'हरिजन' शब्द भी यदि किसी व्यक्ति, संस्था या आयोजक द्वारा प्रयोग किया जाता है, जिससे किसी वर्ग की गरिमा को ठेस पहुंचे, तो यह अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दंडनीय हो सकता है।

उन्होंने आगे बताया कि इस तरह के मामलों में पुलिस को शिकायत का इंतजार करना जरूरी नहीं है, बल्कि वह स्वतः संज्ञान लेकर कार्रवाई कर सकती है। यदि प्रथम दृष्टया मामला बनता है, तो संबंधित व्यक्तियों या आयोजकों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जा सकता है, जिसमें गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई भी शामिल हो सकती है।

वर्तमान विवाद को लेकर स्थानीय और राज्य स्तर के कई संगठनों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि यह केवल एक शब्द का मामला नहीं है, बल्कि यह संविधान द्वारा दिए गए सम्मान और समानता के अधिकार का सवाल है। यदि सार्वजनिक कार्यक्रमों और राजनीतिक मंचों पर ही इस तरह के शब्दों का उपयोग होगा, तो समाज में गलत संदेश जाएगा और भेदभाव की मानसिकता को बढ़ावा मिलेगा।

फिलहाल इस पूरे मामले में आयोजकों की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, द मूकनायक ने इस संबंध में आयोजक उषा उरमालिया से बात करने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो सकी।

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