
नई दिल्ली- जेएनयू (जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय) एक बार फिर चर्चा का विषय बन चुका है. एक कथित वायरल वीडियो के अनुसार छात्रावास के बाहर कुछ छात्र-छात्राएं नारेबाजी करते हुए दिख रहें हैं, जिसमें वे ‘अंबानी राज की कब्र खुदेगी-जेएनयू की धरती पर’, ‘अडानी राज की कब्र खुदेगी-जेएनयू की धरती पर’ और ‘मोदीशाह की कब्र खुदेगी-जेएनयू की धरती पर’ जैसे नारे लगते दिख रहे हैं. विवादास्पद वायरल वीडियो को लेकर सोशल मीडिया पर जमकर बवाल मचा हुआ है. जेएनयू छात्रसंघ के वक्तव्य की माने तो 5 जनवरी 2020 को जेएनयू के साबरमती छात्रावास में नक़ाबपोश लोगों द्वारा शिक्षकों और छात्रों पर हुए हिंसक हमले के 6 साल पूरे होने पर एक कैंडल मार्च का आयोजन किया गया था. इस कैंडल मार्च के आयोजन का उद्देश्य 6 साल पहले जेएनयू के साबरमती छात्रावास में हुए हमले को याद करना था.
जेएनयू छात्रसंघ द्वारा जारी किए वक्तव्य में लिखा गया है कि 5 जनवरी 2020 को हुए हमले की योजना अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े लोगों द्वारा की गई थी. जिसमें चिह्नित करके छात्रों व शिक्षकों पर हमला हुआ था जो शांतिपूर्वक फ़ीस वृद्धि का विरोध कर रहे थे." जबकि जेएनयू की एबीवीपी यूनिट के अध्यक्ष मयंक पांचाल ने इस मामले पर कहा कि वे साबरमती छात्रावास में 6 वर्ष पहले हुए हमले के संदर्भ में निष्पक्ष जांच की मांग करते हैं. जब उनसे सवाल किया गया कि 6 साल बाद भी दिल्ली पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही ना होने को क्या वे दिल्ली पुलिस की असफलता मानते हैं ? तो वे इस पर कोई स्पष्ट जवाब नहीं देते हैं.
5 जनवरी 2020 के हमले के समय तत्कालीन जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष और हमले की शिकार रहीं आइशी घोष का कहना है कि “हम जेएनयू के लोग 2020 के बाद से हर 5 जनवरी को उस हमले को याद करते हैं कि कैसे पहली बार इस तरह का हमला जेएनयू परिसर में होता है. इस घटना के 6 साल बाद भी मेरे व मेरे साथियों पर हुए हमले के संदर्भ में आज तक न्याय नहीं मिला है.” आगे वो जोड़ती हैं कि “आरएसएस के लोग बाहर से कैंपस में घुसते हैं और मारपीट करते हैं. आरएसएस के प्रोफेसरों के यहाँ लाठियां और हथियार रखे जाते हैं.”
आइशी आगे विश्वविद्यालय प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाती हुई कहती हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन भी उस हमले में संलिप्त था. इस मामले के अगले ही दिन जेएनयू छात्रसंघ की तत्कालीन अध्यक्ष अइशी घोष ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी और जेएनयू में एक पब्लिक मीटिंग को भी संबोधित किया था. इस पब्लिक मीटिंग में बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण, राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव और पूर्व जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार भी सम्मिलित हुए थे. अइशी घोष का कहना है कि इस मामले की एक बार भी निष्पक्ष जांच नहीं हुई.
बताते चलें जिस दिन कैंडल मार्च आयोजित किया गया था यानी सोमवार को; उसी दिन उच्चतम न्यायालय ने साल 2020 के दिल्ली दंगों के 5 अभियुक्तों की जमानत मंजूर कर दी थी. जबकि उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की जमानत को ना सिर्फ नामंज़ूर किया गया बल्कि उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा है कि अब उमर ख़ालिद और शरजील इमाम उच्चतम न्यायालय में अगले एक साल तक जमानत की याचिका भी नहीं कर सकते हैं.
एबीवीपी की जेएनयू यूनिट के उपाध्यक्ष मनीष चौधरी ने एएनआई से कहा, “कल एबीवीपी और आरएसएस की कब्र खुदेगी जैसे नारे लगे हैं. ये वही एबीवीपी है जिसके 60 लाख से अधिक सदस्य हैं, क्या वो उन 60 लाख लोगों की क़ब्र खोदने की माँग कर रहे हैं.” हमने इस पर एबीवीपी के जेएनयू यूनिट के अध्यक्ष मयंक पांचाल का पक्ष जानना चाहा कि जब एबीवीपी के लोग अपने नारेबाजी में “वामपंथ की क़ब्र खुदेगी-जेएनयू की धरती पर” जैसा नारा लगाते हैं तो क्या उस नारे की मंशा में यह उद्देश्य शामिल होता है कि ‘वामपंथी विचार को मानने वाले लोगों की’ कब्र खोदने की माँग कर रहें हैं ? तब वे इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब नहीं देते हैं.
जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष अदिति मिश्रा ने बताया कि, “विरोध प्रदर्शन में लगाए गए सभी नारे वैचारिक नारे थे और किसी पर व्यक्तिगत रूप से हमला नहीं करते थे. वे किसी को निशाना बना कर नहीं लगाए गए.”
वहीं जेएनयू के कुलसचिव ने एक वक्तव्य जारी किया है जिसमें यह लिखा गया है कि "जेएनयू प्रशासन ने सबरमती परिसर में कल हुए प्रदर्शन के वीडियो का बहुत गंभीरता से संज्ञान लिया है. इन वीडियोज़ में जेएनयू स्टूडेंट यूनियन के कुछ स्टूडेंट्स ने बेहद आपत्तिजनक, उकसाने वाले और भड़काऊ नारे लगाए हैं. इस घटना को सक्षम प्राधिकारी ने गंभीरता से नोट किया है और सुरक्षा शाखा को पुलिस की जाँच में सहयोग करने के लिए कहा है."
"ऐसे नारे लगाना जेएनयू की आचार-संहिता का उल्लंघन है, और इससे सार्वजनिक व्यवस्था, कैंपस का माहौल और विश्वविद्यालय और राष्ट्र की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है.”
7 जनवरी 2025 को जेएनयू शिक्षक संघ ने इसी मामले पर एक वक्तव्य जारी करते छात्रों के प्रति प्रशासन के दमनात्मक रवैये और जेएनयू के छात्रों के ख़िलाफ़ मुख्य धारा की मीडिया ट्रायल की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि,"जेएनयू प्रशासन ने अपने मुख्य सुरक्षा अधिकारी के माध्यम से एक हास्यास्पद कदम उठाते हुए दिल्ली पुलिस से जेएनयूएसयू द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में मात्र नारे लगाने के लिए एफआईआर दर्ज करने को कहा है। यह कार्यक्रम 5 जनवरी 2020 को जेएनयू पर हुए हमले की छठी बरसी पर आयोजित किया गया था। जेएनयू प्रशासन और दिल्ली पुलिस वही संस्थाएं हैं जो छह साल पहले हिंसा की इस निर्विवाद रूप से आपराधिक घटना को रोकने में विफल रहीं और फिर दोषियों की पहचान करने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने में असमर्थ साबित हुईं।” आगे इस वक्तव्य में लिखा गया है कि, "2016 की तरह ही, सच्चाई को दरकिनार कर दिया गया है, क्योंकि इस नाटक का असली उद्देश्य केवल सभी विरोध प्रदर्शनों को कुचलने की वैधता प्रदान करना और विश्वविद्यालय के लोकतांत्रिक महौल को नष्ट करना है.”
हमने पूरे प्रकरण को लेकर वसंत कुंज थाने के SHO और विश्वविद्यालय प्रशासन से बात करने का प्रयास किया लेकिन ख़बर लिखे जाने तक उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं मिला।
6 साल पूर्व नकाबपोश लोगों का जत्था जेएनयू परिसर में घुस कर 3 छात्रावासों के छात्रों पर लाठियों, पत्थरों और लोहे की रॉड से हमला किया था। जिसमें लगभग 30 छात्रों को गंभीर चोटें आई थी। उस समय जेएनयू छात्रसंघ के नेताओं ने दिल्ली पुलिस पर परिसर में दंगा मचा रही भीड़ को सुरक्षा और शह देने का आरोप लगाया था।
- लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली के परास्नातक (परफॉमेंस स्टडीज) के छात्र हैं।
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