भोपाल में चंद्रशेखर आज़ाद का एलान: कहा- संविधान पर हमला जारी रहा तो सड़कों से संसद तक संघर्ष होगा

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारें संख्या के दबाव में पिछड़ा वर्ग का मुख्यमंत्री तो बनाती हैं, लेकिन सम्मान नहीं देतीं।
सांसद व आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद
सांसद व आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद
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भोपाल। नगीना सांसद और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ने भोपाल के सिंधु भवन में आयोजित कार्यकर्ता बैठक में सरकारों की नीतियों पर करारा हमला बोला। उन्होंने कहा कि आज देश में सत्ता का इस्तेमाल संविधान की मूल भावना समानता, न्याय और बंधुत्व के विरुद्ध किया जा रहा है। यदि वंचित समाज ने अपनी सामूहिक ताकत नहीं बनाई, तो अपमानजनक भाषा, भेदभाव और मुकदमों की दौड़ खत्म नहीं होगी।

आजाद समाज पार्टी और भीम आर्मी के संयुक्त कार्यक्रम में उन्होंने स्पष्ट कहा कि लड़ाई केवल सत्ता बदलने की नहीं, बल्कि सोच बदलने की है। “जब तक समाज अपनी संख्या और अधिकारों को नहीं पहचानेगा, तब तक अन्याय सामान्य बना दिया जाएगा,” उन्होंने चेताया।

जातिगत जनगणना से डर क्यों?

चंद्रशेखर आजाद ने सरकार को खुली चुनौती देते हुए कहा कि जातिगत जनगणना से सत्ता इसलिए घबराती है क्योंकि सच्चाई सामने आ गई तो एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक आबादी 90 प्रतिशत के आसपास निकल सकती है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब चुनाव आयोग एक महीने में करोड़ों मतदाताओं की एसआईआर कर सकता है, तो 11-12 वर्षों में जातिगत जनगणना क्यों नहीं? “कभी बजट, कभी समय- ये सिर्फ बहाने हैं,” उन्होंने कहा।

1931 से मंडल तक: पिछड़ों के साथ ऐतिहासिक अन्याय

आजाद ने इतिहास का हवाला देते हुए बताया कि 1931 की जातिगत जनगणना में मध्यप्रदेश में पिछड़ा वर्ग 52 प्रतिशत था। इसके बाद काका कालेलकर आयोग की रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। मंडल आयोग लागू होने के समय राजनीतिक समर्थन वापस ले लिया गया और आज भी उसकी 38 सिफारिशें लंबित हैं। “इन सिफारिशों के लागू होते ही सामाजिक-आर्थिक संतुलन बदलेगा, इसी डर से इन्हें रोका जा रहा है,”

पिछड़ा मुख्यमंत्री, लेकिन सम्मान नहीं

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारें संख्या के दबाव में पिछड़ा वर्ग का मुख्यमंत्री तो बनाती हैं, लेकिन सम्मान नहीं देतीं। शिवराज सिंह चौहान के दौर का उल्लेख करते हुए आजाद ने कहा कि संगठन विशेष द्वारा अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल हुआ। वर्तमान मुख्यमंत्री मोहन यादव के संदर्भ में उन्होंने कहा कि 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण की बात उठते ही जातिगत गालियां और हटाने की कोशिशें शुरू हो गईं, यह बताता है कि असली सम्मान किसे मिलता है और किसे नहीं।

कांशीराम आंदोलन की विरासत

सांसद आजाद ने कांशीराम साहब के आंदोलन की याद दिलाते हुए कहा कि जब वंचित समाज एकजुट हुआ, तो मध्यप्रदेश से तीन निर्दलीय सांसद चुने गए, सुखलाल कुशवाह, बुद्धसेन पटेल और भीमसेन पटेल। “इतिहास गवाह है एकता ही परिवर्तन की चाबी है,”

एसआईआर के नाम पर वोट कटौती का आरोप

उन्होंने आरोप लगाया कि एसआईआर के जरिए 2.98 करोड़ वोट काटे गए। तुलना करते हुए कहा कि ऑस्ट्रेलिया की पूरी आबादी इससे कम है, जबकि उत्तर प्रदेश में इससे अधिक वोट हटाए गए वह भी तब, जब हाल ही में इन्हीं सूचियों पर चुनाव हुए थे। “यह कमजोर वर्गों के मताधिकार पर योजनाबद्ध हमला है,” आजाद ने कहा।

ईडब्ल्यूएस और आरक्षण पर पाखंड

आजाद ने कहा कि बाबा साहब आंबेडकर के आरक्षण का विरोध वही लोग कर रहे हैं, जो खुद पिछले वर्षों से ईडब्ल्यूएस का लाभ ले रहे हैं। “यह संविधान और सामाजिक न्याय के साथ सीधा पाखंड है,” उन्होंने आरोप लगाया।

आदिवासी आईएएस की अनसुनी आवाज

एक आदिवासी आईएएस अधिकारी का नाम लिए बिना आजाद ने कहा कि जब एक संवैधानिक पद पर बैठे अधिकारी की बात नहीं सुनी जाती, तो गरीब आदिवासी या मजदूर की आवाज कौन सुनेगा? “यह व्यवस्था की दिशा बताने के लिए काफी है,”

ईसाई समाज पर हमलों का जिक्र करते हुए आजाद ने कहा कि क्रिसमस जैसे त्योहार पर कहीं मारपीट, कहीं धमकी यह संविधान के अनुच्छेद 25 की खुली अवहेलना है। उन्होंने कहा कि ईसाई समाज आज सुरक्षा और न्याय की उम्मीद में हमारी ओर देख रहा है।

मुस्लिम समाज को लेकर उन्होंने कहा कि खुलेआम नफरत फैलाई जा रही है, हथियारों का प्रदर्शन हो रहा है और उकसाने वाले नारे लग रहे हैं। “आम आदमी पर कानून तुरंत चलता है, लेकिन ताकतवर बेखौफ हैं, यह दोहरा मापदंड क्यों?” उन्होंने पूछा।

कानून सबके लिए बराबर क्यों नहीं?

आजाद ने कहा कि अगर आम नागरिक ऐसा कृत्य करे, तो उसी दिन मुकदमा और एनएसए लग जाती है, लेकिन कुछ लोगों को टीवी इंटरव्यू तक मिलते हैं। “यह अन्याय किसकी शह पर हो रहा है, देश को यह सोचना होगा,” उन्होंने कहा।

संविधान का मजाक और सत्ता की कुर्सी

उन्होंने कहा कि संविधान का मजाक उड़ाया जा रहा है, गार्ड ऑफ ऑनर जैसे प्रतीकात्मक सम्मान गलत हाथों में जा रहे हैं और सवाल उठाने पर ही जांच शुरू होती है। “अन्याय पर चुप्पी उसे सामान्य बना देती है,” आजाद ने चेताया।

समापन में आजाद ने कहा कि कुर्सी की अहमियत वही समझता है जो अपनी ताकत पहचानता है। “गुलाम मानसिकता खड़े रहने में संतोष ढूंढती है, स्वाभिमानी समाज सत्ता की कुर्सी पर बैठने का हक समझता है,” उन्होंने कहा।

उन्होंने कार्यकर्ताओं से संविधान की मूल भावना को गांव-गांव तक ले जाने और संगठन को मजबूत करने का आह्वान किया।

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