
नागपुर- बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की जयंती समारोह के दौरान 'संविधान स्क्वायर' पर हुए अत्यधिक शोरगुल, जोरदार नारेबाजी और पटाखे फोड़ने को लेकर आपत्ति जताई है। अदालत ने कहा है कि इस तरह का उत्सव डॉ. आंबेडकर के विचारों का उल्लंघन है, जिनके लिए 'स्वतंत्रता कभी भी लाइसेंस नहीं बन सकती'।
जस्टिस उर्मिला जोशी-फाल्के और जस्टिस निवेदिता पी. मेहता की खंडपीठ ने यह टिप्पणी जनहित याचिकाओं और स्वतः संज्ञान लिए गए मामले (सुओ मोटू) की सुनवाई के दौरान की।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि तेज आवाज, देर रात तक होने वाले शोर और पटाखों से न सिर्फ मरीजों और बुजुर्गों की सेहत को नुकसान पहुंचता है, बल्कि पक्षियों का बसेरा भी उजड़ जाता है। अदालत ने साफ कहा कि अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) और शोरगुल नियमों के अनुसार रात 10 बजे से सुबह 6 बजे के बीच शोर करना पूरी तरह अवैध है।
कोर्ट ने टिप्पणी की, " भारत में राष्ट्रीय नायकों की जयंती उनके योगदान को सम्मानित करने और नागरिकों में नैतिक मूल्यों को सुदृढ़ करने के लिए मनाई जाती है। ये उत्सव नई पीढ़ी को आदर्शों और बलिदानों से जोड़ने का काम करते हैं। हर साल भारतीय संविधान के जनक और प्रमुख निर्माता डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर की जयंती मनाई जाती है। यह दिन न केवल जीवन का उत्सव है, बल्कि दूरदर्शी नेता और समाज सुधारक की विरासत को श्रद्धांजलि भी है। उनके जीवन, दर्शन और लेखन के आधार पर, डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर संभवतः औपचारिक उत्सवों के बजाय बौद्धिक विकास, सामाजिक सुधार और सशक्तिकरण पर केंद्रित जयंती को प्राथमिकता देते। वे निश्चित रूप से दलितों के उत्थान, महिला सशक्तिकरण और जाति आधारित भेदभाव के उन्मूलन पर ध्यान केंद्रित करते।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि डॉ. आंबेडकर स्वयं होते तो वे अपनी जयंती को ‘अनुष्ठानिक उत्सव’ (ritualistic festivities) के बजाय बौद्धिक विकास, सामाजिक सुधार और सशक्तिकरण के रूप में मनाना पसंद करते।
पीठ ने अपनी टिप्पणी में संविधान निर्माता के सिद्धांतों को दोहराते हुए कहा, "हर किसी को अपने घर में शांति और आराम का अधिकार है। आपकी आजादी वहीं खत्म होती है, जहां दूसरे की नाक शुरू होती है।"
अदालत ने आगे कहा, " उनकी जयंती मनाना केवल उनके शब्दों को याद करना ही नहीं है, बल्कि उस दूरदृष्टि को भी याद करना है जिसने आधुनिक भारत में समानता, न्याय और प्रगति की नींव रखी, और उनके विचारों ने एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण किया और उनके विचारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाया।"
कोर्ट ने आयोजकों से सवाल किया है कि क्या वे डॉ. आंबेडकर के वास्तविक विचारों को फैला रहे हैं, और उन्हें नोटिस जारी करने का आदेश दिया है। यह नोटिस नागपुर पुलिस आयुक्त के माध्यम से भेजा जाएगा।
साथ ही, कोर्ट ने पुलिस आयुक्त, नागपुर से भी जवाब मांगा है कि संविधान स्क्वायर पर आम नागरिकों के अनुच्छेद 21 के उल्लंघन को रोकने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए। मामले में अगली सुनवाई 9 जून को होगी।
न्यायालय की टिप्पणी और कदम से बहुजन और दलित संगठनों में निराशा है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि डॉ. आंबेडकर की जयंती पर जोरदार नारेबाजी और ढोल-नगाड़े परंपरा का हिस्सा हैं।
एंटी कास्ट एक्टिविस्ट रेहना रवीन्द्रन कहती हैं, " क्या गणेश चतुर्थी के शोरगुल भरे समारोहों को लेकर कोई शिकायत है? यदि नहीं, तो अंबेडकर जयंती समारोह को निशाना बनाना जातिवादी मानसिकता का प्रतीक है। यदि शोरगुल चिंता का विषय है, तो यह सभी त्योहारों पर लागू होना चाहिए। यदि अंबेडकर जयंती चिंता का विषय है, तो जातिवादी मानसिकता को बदलना होगा।"
एक वरिष्ठ बहुजन नेता ने कहा, "अंबेडकर जयंती समारोह के दौरान, मनुवादी हिंदू तत्वों ने डीजे के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर कर इसे "ध्वनि प्रदूषण" का नाम दे दिया। जैसे-जैसे बाबासाहेब अंबेडकर की विरासत राष्ट्रव्यापी स्तर पर उभर रही है, उनकी बेचैनी को छुपाना असंभव होता जा रहा है।"
उनका कहना है कि कोर्ट ने 'लोकतंत्र के हुंकार' (आवाज) को ‘शोरगुल’ का तमगा देकर सामाजिक अभिव्यक्ति पर रोक लगाने की कोशिश की है। कुछ कार्यकर्ताओं तो इसे "सवर्णवादी सोच" का परिणाम बताया।
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